दस्तावेज़ : जंगे आज़ादी में अँग्रेज़ॊं के सबसे बड़े दुश्मन मौलवी अहम्दुल्लाह शाह : जगदीश्वर चतुर्वेदी 

10.06.2018

मतलबपरस्ती की इस दुनिया में किसी भी जननायक को भुला देने के लिए 158 साल कम नहीं होते। जब हमारे ही लोग उस गौरवशाली विरासत की शानदार धरोहर को सहेज कर न रख पा रहे हों तो सत्ता को कोसने का क्या मतलब?

दरअसल, इतिहास की भी दो किस्में है — एक तो राजा, रजवाड़े, रियासतों, तालुकेदारों, नवाबों, बादशाहों, शहंशाहों का और दूसरा जनता का। सत्ता का चरित्र होता है कि वह अपने फरेब, साजिशों और दमन के सहारे हमें बार-बार आभास कराती है कि जनता बुजदिल, कायर होती है और जनता के बलिदानों का कोई इतिहास नहीं है। हमारे लाेग भी जाने- अनजाने एेसी साजिशों का हिस्सा बन जाते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर हम सब कुछ भूलने पर ही उतारू हो जाएँ तो भला याद क्या और किसे रखेंगे?

एक ऐसा स्वतंत्रता सेनानी जिसे इतिहास के पन्नो में दफ्न कर दिया गया — 1857 में जब पूरा हिंदुस्तान अंग्रेजों के जुल्मों सितम से परेशान था और बगावत के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं बचा था ऐसे वक्त में एक ऐसा
शख्स भी था जिसने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था, दम भी इतना कि
अंग्रेजों ने उन्हें ज़िन्दा या मुर्दा पकड़कर लाने वाले को 50,000 रुपए इनाम के तौर पर देने का ऐलान कर दिया। फिर भी अंग्रेजी हुकूमत उन्हें कभी ज़िन्दा नहीं पकड़ पाई।

 

पहली जंग-ए-आजादी के सबसे काबिल पैरोकार एक सूफी-फकीर थे। जब आज़ादी की कहीं चर्चा भी नहीं थी उस वक्त फिरंगियों की बर्बरता के विरुद्ध उन्होंने पर्चे लिखे, रिसाले निकाले और देश में घूम-घूम कर अपने
तरीके से लोगों को संगठित किया। वे मौलवी हाफिज अहमद उल्लाह शाह,
सिकंदर शाह, नक्कार शाह, डंका शाह आदि नामों से मशहूर थे। जैसे उनके कई नाम थे ठीक वैसे ही उनकी शख्सियत के कई आयाम भी थे।

1857 की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि अंग्रेजों की ‘डिवाइड एण्ड रूल’ नीति को धता बताकर हिन्दू-मुसलमान कदम से कदम मिलाकर साथ-साथ लड़े थे। हर मोर्चे पर हालात यह थे कि इंच-इंच भर जमीन
अंग्रेजों को गँवानी पड़ी या देशवासियों के लाशों के ऊपर से गुजरना पड़ा. सवाल उठता है कि फिर हम हार क्यों गए? वजह साफ है कि ऐसे नाजुक दौर में हवा का रुख देखकर आजादी में शामिल हुए नायक ‘खलनायक’ बन गए और ऐन मौके पर अपनी गद्दारी की कीमत वसूलने दुश्मनों से जा मिले। इसी विश्वासघात की वजह से जंगे आजादी के सबसे बहादुर सिपहसालार मौलवी को शहादत देनी पड़ी। 1857 का सबसे बड़ा सबक यह है कि ‘आप बिकेंगे तो हर मोर्चे पर हारेंगे।’

 

मौलवी को कलम और तलवार में महारत हासिल होने के साथ ही आम जनता के बीच बेहद लोकप्रियता प्राप्त थी। इस योद्धा ने 1857 की शौर्य गाथा की ऐसी इबारत लिखी जिसको आज तक कोई छू भी नहीं पाया। पूरे अवध में नवंबर 1856 से घूम-घूम कर इस विद्रोही ने आजादी की मशाल को जलाए रखा, जिसकी वजह से फरवरी 1857 में उनके सशस्त्र जमावड़े की बढ़ती ताकत को देखकर फिरंगियों ने कई लालच दिए, अपने लोगों से हथियार डलवा देने के लिए कहा तो उन्होंने साफ मना कर दिया। इस गुस्ताखी में फिरंगी आकाओं ने उनकी गिरफ्तारी का फरमान जारी कर दिया। मौलवी की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अवध की पुलिस ने मौलवी को गिरफ्तार करने से मना कर दिया। 19 फरवरी 1857 को अंग्रेजी फौजों और मौलवी में कड़ी टक्कर के बाद उन्हें पकड़ लिया गया। बागियों का मनोबल तोड़ने के लिए घायल मौलवी को सिर से पाँव तक ज़ंजीरों में जकड़कर पूरे फ़ैज़ाबाद शहर में घुमाया ही नहीं गया बल्कि फाँसी की सज़ा सुनाकर फ़ैज़ाबाद जेल में डाल दिया गया। क्रांति का जो पौधा उन्होंने रोपा था उसका असर यह हुआ कि 8 जून 1857 को सूबेदार दिलीप सिंह के नेतृत्व में बंगाल रेजीमेंट में बगावत का झण्डा फहरा कर फ़ैज़ाबाद की बहादुर जनता ने भी बगावत कर दी। हज़ारों हज़ार बागियों ने फ़ैज़ाबाद जेल का फाटक तोड़कर अपने प्रिय मौलवी और साथियों को आज़ाद कराया। पूरे फ़ैज़ाबाद से अंग्रेज डरकर भाग खड़े हुए।

फ़ैज़ाबाद आजाद हो गया।

मौलवी की रिहाई का जश्न मनाया गया और उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई। फिर तो मौलवी ने सिर्फ फ़ैज़ाबाद तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखा बल्कि पूरे अवध-आगरा में जमकर अपनी युद्धनीति का करिश्मा दिखाया। फ़रारी के दिनों में मौलवी को सुनने कई हज़ार की भीड़ जमा हो जाती थी। प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारत में अंगरेजी राज’ के लेखक पंडित  सुन्दरलाल लिखते हैं कि ‘वास्तव में बगावत की उतनी तैयारी कहीं भी नहीं थी जितनी अवध में। हज़ारों मौलवी और हजारों पंडित एक-एक बैरक और
एक-एक गाँव में स्वाधीनता युद्ध के लिए लोगों को तैयार करते फिरते थे।’ इतिहासकार होम्स ने उत्तर भारत में अंग्रेजों का सबसे जबदस्त दुश्मन मौलवी अहमदुल्लाह शाह को बताया है।

 

ताल्लुकेदार घर में पैदा हुए मौलाना अहमदुल्लाह शाह हैदराबाद से पढाई पूरी करके बहुत कम उम्र में ही लेखक और धार्मिक उपदेशक बन गए।
अंग्रेजों के हाथों से अवध को आजाद कराने के लिए लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ भड़काने के कारण उनका अपहरण कर लिया गया जिससे आहत होकर मौलाना साहब ने देश पर अपना सब कुछ अपनी जान के साथ लुटाने की कसम खा ली, वे मौलवी बन गए और पूरे हिंदुस्तान को जगाने के लिए निकल पड़े। लोगों का मानना था कि उनके एक हाथ में तलवार तो दूसरे में कलम है।

वे क्रन्तिकारी पम्पलेट लिखते जिसमें वे अवाम से अंग्रेज़ों के खिलाफ जिहाद करने की अपील करते और उसे खुद गाँव-गाँव जाकर बांटते। 1857 के जंग-ए-आज़ादी की एक बेशकीमती दस्तावेज़ के तौर पर एक ऐलान नामा
“फतहुल इस्लाम” के नाम से मिला। इस पत्रिका को निकालने वाले का नाम तो नहीं मिला पर उस पत्रिका के मौजू (विषय) और विवरण से ये अंदाजा लगा कि उसे मौलाना अहमदुल्लाह शाह जो कि एक मौलवी के नाम से मशहूर थे, उन्होंने ही लिखा था।

 

इस पत्रिका में अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान लिखने के बाद अवाम से जिहाद करने के लिए दरख्वास्त की गई थी। पत्रिका में अवाम को जंग के तौर- तरीके और नेतृत्व के बारे में समझाने की कोशिश भी की गई है जो
दिलचस्प है। आगे उस पत्रिका में गैर मुस्लिमों को मुखातिब करते हुए लिखा गया है कि वही हिन्दू अब भी है और अभी भी वही मुसलमान। वे अपने दीन पर कायम रहें और हम हमारे दीन पर, अगर हम उनकी हिफाजत करेंगे तो वे भी हमारी हिफाजत करेंगे। ईसाइयों ने हिन्दू और मुसलमानों को ईसाई बनाना चाहा पर अल्लाह ने हमे बचा लिया, उलटे वे खुद ही खराब हो गये। इस पत्रिका के अंत में अंग्रेजों से किसी भी तरह का सम्बन्ध रखने से मना किया गया है और गुजारिश की गयी है कि कोई भी हिंदुस्तानी अंग्रेजों के पास नौकरी ना करे।

 

मौलाना साहब खुद अपने लिखे हुए क्रांतिकारी पर्चे को गाँव-गाँव जाकर पहुँचाते। 1856 में मौलाना साहब जब लखनऊ पहुँचे तो पुलिस ने उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों को रोक दिया। प्रतिबन्ध के बावजूद जब उन्होंने लोगों को आज़ादी की लड़ाई के लिए उकसाना बंद नहीं किया तो 1857 में उन्हें फ़ैज़ाबाद में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

 

जेल से छूटने के बाद उन्होंने लखनऊ और शाहजहाँपुर में लोगों को फिर से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए जगाना शुरू कर दिया । जंग ए आज़ादी के दौरान मौलाना साहब को विद्रोही स्वतंत्रता सेनानियों की उस 22वीं इन्फेण्ट्री का प्रमुख बनाया गया जिसने चिनहट की प्रसिद्ध लड़ाई में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना से एक बहुत ही जबरदस्त जंग लड़ी।

इस जंग में ब्रिटिश सेना को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। जंग के बाद उन्हें जीते जी ब्रिटिश इंटेलिजेंस और पुलिस नहीं पकड़ पाई और वे जीते जी अवाम के हर दिल अजीज बन गए। लोगों का मानना था की मौलाना साहब में कोई जादुई शक्ति या ईश्वरीय शक्ति है जिसके कारण अंग्रेजों को उन्हें पकड़ना या मारना नामुमकिन
था। हर मोर्चे पर फिरंगियों को भागना पड़ रहा था, तब 12 अप्रैल 1858 को गवर्नर जनरल कैनिंग ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए 50, 000 रुपये इनाम
का एलान किया जिस पर भारत के सचिव जी० एफ० ऐडमोंस्टन के दस्तखत थे। इसी इनाम के लालच में पुवायां के अंग्रेज परस्त राजा जगन्नाथ सिंह ने उन्हें आमंत्रित कर 15 जून 1858 को धोखे से गोली मार कर शहीद कर दिया। चूँकि मौलवी से पुवायां का राजा जगन्नाथ अपनी दोस्ती का दम भरता था। मौलवी राजा से मदद माँगने जब पुवायां पहुँचे तो उन्हें दाल में कुछ काला लगा लेकिन इस बहादुर ने वापस लौटना अपनी शान के खिलाफ समझा। पैसों और रियासत की लालच में धोखे से मौलवी को शहीद कर दिया गया। उनके सिर को काटकर राजा ने अंग्रेज जिला कलक्टर को सौंपा और मुँहमांगी रकम वसूल की। इस विश्वासघात से देश के लोग रो पड़े। फिरंगियों ने अवाम में दहशत फैलाने की नीयत से मौलवी का सिर पूरे शहर में घुमाया और शाहजहांपुर की कोतवाली के नीम के पेड़ पर लटका दिया। यह अलग बात है कि कुछ जुनूनियों ने रात में सिर को उतारकर लोधीपुर गाँव के नजदीक खेतों के बीच दफना दिया जहाँ आज भी मौलवी का स्मारक मौजूद है। मौलाना साहब पर लिखते हुए ब्रिटिश अधिकारी थॉमस सीटन ने लिखा था — a man of great abilities of undaunted courage of stern determination and by far the best soldier among the rebels

अंग्रेजों का आधिकारिक इतिहास लिखने वाले क०. मालीसन ने लिखा —
‘‘मौलवी एक असाधारण आदमी थे। विद्रोह के दौरान उसकी सैन्य क्षमता
और रणकौशल का सबूत बार-बार मिलता है। उनके सिवाय कोई और यह दावा नहीं कर सकता कि उसने युद्धक्षेत्र में कैम्पबेल जैसे जंग में माहिर उस्ताद को दो-दो बार हराया और न जाने कितनी बार गफलत में डाला और उनके हमले को नाकाम किया। वह अपने देश के लिए जंग लड़ता है, तो कहना पड़ेगा कि मौलवी एक सच्चा राष्टंभक्त था। न तो उसने किसी की कपटपूर्ण हत्या कराई और न निर्दोषों और निहत्थों की हत्या कर अपनी तलवार को कलंकित किया बल्कि पूरी बहादुरी, आन, बान, शान से फिरंगियों से लड़ा, जिन्होंने उसका मुल्क छीन लिया था।’’ फ़ैज़ाबाद के स्वतंत्रता सेनानी रमानाथ मेहरोत्रा ने अपनी किताब ‘स्वतंत्रता संग्राम के सौ वर्ष’ में लिखा है कि फ़ैज़ाबाद की धरती का सपूत मौलवी अहमद उल्लाह शाह शाहजहांपुर में शहीद हुआ और उसके ख़ून से उस जनपद की धरती सींची गई तो बीसवी सदी के तीसरे दशक में शाहजहांपुर की धरती से एक सपूत अशफाक उल्ला खां का पवित्र ख़ून फ़ैज़ाबाद की धरती पर गिरा। इतिहास का यह विचित्र संयोग है एक फ़ैज़ाबाद से जाकर शाहजहांपुर में शहीद हुआ तो दूसरा शाहजहांपुर में जन्मा और फ़ैज़ाबाद में शहीद हुआ।’

शहीदे वतन अशफाक ने अपनी जेल डायरी में एक शेर दर्ज किया है,

‘शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।’

दिल पर हाथ रखकर आज अपने आप से खुद पूछें, इस अजूबे फकीर के वारिसों को शहादत पर याद करने की कितनी फुर्सत है? इस मुक्ति योद्धा की जिंदगी के ज्यादातर पन्ने अब भी रहस्य के गर्भ में हैं। पहली जंग-ए-आजादी के महानायक डंका शाह की शहादत भुला दी गई। शाह आलम इतिहास की क़ब्र को खोदकर आज़ादी के वीर सपूतों की रूहों को आज़ाद कराने के काम में बरसों से जुटे हैं। इस बार उन्होंने 1857 की पहली जंग-ए-आज़ादी के योद्धा सूफ़ी फकीर डंका शाह को खोज निकाला है, जिनकी क़ब्र उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में है। डंका शाह अपनों के ही विश्वासघात के कारण 15 जून 1858 को शहीद हुए थे।

प्रस्तुति : अनिल जनविजय

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