क्या सचमुच साहित्य के लिए दिमाग की जरुरत नहीं होती है?  : साहित्य के छद्म प्रगतिशील मठाधीश ;  संजीव खुदशाह

8.06.2018

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आपने इस बात को गौर किया होगा कि जब आप किसी whatsapp ग्रुप में कोई पोस्ट डालते हैं, तो आपको या तो उसमें सहमति मिलेगी या फिर आपत्ति मिलेगी ऐसा भी हो सकता है कि, आपके पोस्‍ट को इग्‍नोर कर दिया जाय। अक्सर ऐसा होता है कि ग्रुप का एडमिन पहल करके उसको उसके बारे में यदि वाह कोई आपत्तिजनक हो तो वो अपनी टिप्पणी देता है। *इसी प्रकार साहित्‍यीक ग्रुप में एक खास प्रकार की टिप्पणी हर बार दी जाती है*। यह बताना जरूरी है कि किसी भी whatsapp के ग्रुप और उसके मैसेज से मैं परहेज नहीं करता हूं। क्योंकि मेरी नजर में हर ग्रुप अपने आप में खास होता है।

मैं यहां पर whatsapp के खास प्रकार के ग्रुप की चर्चा इसलिए कर रहा हूं। क्योंकि विगत दिनों एक साहित्यीक नाम के ग्रुप से जुड़ा और उसमें अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित गोष्ठी का YouTube वीडियो पोस्‍ट करने पर ग्रुप एडमिन ने एक आपत्ति दर्ज की गई। उसका मजमून कुछ इस प्रकार था। *मित्र यह साहित्‍यीक ग्रुप है यहां टेंशन को रिलीस करने वाले मैसेज डाले जाते हैं कृपया दिमाग का प्रयोग करने वाले मैसेज डालने से परहेज करें।* मुझे इस ऐडमिन के आपत्ति पर दुख नहीं हुआ। बल्कि मै सोच में पड़ गया कि क्या सचमुच साहित्य के लिए दिमाग की जरुरत नहीं होती है। शायरी के लिए, कविताओं के लिए, कहानियों के लिए, विचार की जरुरत नहीं होती? दरअसल हमारा छद्म रूपी जो तथाकथित साहित्यकार वर्ग है। वह जानबूझकर वर्तमान परिस्थितियों से आंखें मूंदे हुए यथा स्थिति वाद का समर्थन करता है। ताकि वह अपनी रोटियां आसानी से सेक सके । ऐसा किसी खास क ग्रुप में होता है, ये सच नहीं है तमाम दूसरे साहित्य के नाम पर कला के नाम पर विश्व संवाद के नाम पर बने ग्रुप जो अपने आप को साहित्यकार का ग्रुप बताते हैं। मे भी ऐसा ही होता है।

इसके ऐडमिन साहित्‍यीक मठाधीश होते है जो *अपने आपको हिन्‍दी साहित्‍यकार तो बताते है लेकिन दरअसल वे होते है हिन्‍दू साहित्‍यकार*। इन साहित्‍यीक ग्रुपों में जिन बातों पर खासतौर पर परहेज बरता जाता है। वह *दलित साहित्य, महिलावादी साहित्‍य, वामपंथी साहित्य, समाजवादी, अंबेडकरवादी साहित्‍य एवम तमाम वे साहित्‍य तो यथास्थिति वाद का विरोध करते हैं*। गैर बराबरी का, सामंतवाद का, विरोध करते हैं। ऐसे तमाम मैसेज तथा इस प्रकार की रचनाओं को इन ग्रुप में डालने पर आपत्ति दर्ज कराई जाती है। दरअसल साहित्‍य में भी सामंति मानसिकता का ही कब्‍जा रहा है।

*ऐसा सिर्फ व्‍हाटसएप ग्रुप में नही होता है* इन तमाम साहित्यिक संगठनों में भी ऐसा ही होता रहता है। उनके कार्यक्रमों में भी ऐसा ही होता है। ऐसे संगठन सामंती मानसिकता से पोषित होते हैं। नाम से भले ही वे प्रगतीशील या जनवादी या शीलवादी लगे लेकिन इन साहित्‍यीक संस्‍थाओं का एक मात्र कार्य ब्राहमणवादी, सामंती लोगो का तुष्टीकरण करना हैं।

इसलिए आप समता समानता के नाम पर उनके बीच पंडित गजानंद माधव मुक्तिबोध को तो पाते हैं। लेकिन मुद्रा राक्षस उर्फ़ सुभाष चंद गुप्‍ता को नहीं। सामाजिक के संघर्ष के नाम पर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला तो मौजूद दिखते है लेकिन डॉक्टर अंबेडकर गायब रहते है। महात्मा ज्‍योतिबा फूले बेदखल कर दिए जाते हैं। 

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संजीव खुदशाह दलित विचारक और लेखक

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