गोर्की के 150 वर्ष और ’मां’ के 112 वर्ष पर विशेष -तुहिन

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06.06.2018

यह वर्ष सोवियत साहित्य के पितामह महान लेखक मैक्सिम गोर्की के जन्म की सार्ध शताब्दी (150 वर्ष) का वर्ष है। यह वर्ष उनके द्वारा लिखित कालजयी ’मां’ उपन्यास के 112 वर्ष पूरे होने के कारण भी उल्लेखनीय है। विश्व विख्यात रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की को संसार के अन्य देशों की भांति भारत में भी पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त है। उनके ’मां’ उपन्यास को तो लगभग सभी शिक्षित लोगो ने पढ़ा होगा। समालोचक मुमताज हुसैन ने ’’गोर्की- जीवन और साहित्य’’ नामक एक लेख में ठीक ही कहा है कि वे अपने देश से बाहर दुनिया के किन लेखकों को जानते हैं, तो शेक्सपीयर के बाद उनकी अधिकांश संख्या गोर्की ही का नाम लेगी।

प्रसिद्ध लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास ने बड़े दिलचस्प तरीके से गोर्की की लोकप्रियता और पाठकों पर उनके प्रभाव को व्यक्त किया। 1968 में ’सोवेत्स्काया कुल्तूरा’ (सोवियत संस्कृति) पत्र में छपे लेख में उन्होंने लिखा था ’’दुनिया के किन किन तीन लेखकों ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है। ऐसा प्रश्न पूछने पर आपको शायद यह उत्तर मिलेगा।-
मैक्सिम गोर्की, थामस मन और बर्नार्ड शॉ।
अथवा यह –
लेव तोलस्तोय, हेर्बर्ट वेल्स और मैक्सिम गोर्की अथवा वह –
चार्ल्स डिकेन्स, एर्नस्ट हेमिंगवे और मैक्सिम गोर्की।
अथवा वह- गोल्सवर्दी, फ्रान्स काफका और मैक्सिम गोर्की।

हर बार तीन में से एक नाम अवश्य ही मैक्सिम गोर्की का होगा। स्वयं प्रेमचंद ने गोर्की के निधन पर अपनी पत्नी से उनकी चर्चा करते हुए यह कहा था- ’’जब घर -घर शिक्षा का प्रचार हो जाएगा, तो क्या गोर्की का प्रभाव घर -घर न हो जायेगा। वे भी तुलसी-सूर की तरह चारों ओर पूजे जायेंगे।’’

मां महज एक उपन्यास नही है बल्कि यह सोवियत साहित्य की बुनियाद का पहला पत्थर था। यह पूरी दुनिया की समूची मेहनतकश और मुक्तिकामी जनता के लिए लिखा गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यास है जिसने मेरे जैसे असंख्य लोगों की चेतना को झकझोरा था और जिन्हें इस उपन्यास को पढ़ने के बाद प्रगतिशील एवं वामपंथी आंदोलन से जुड़ने की प्रेरणा मिली।

सन् 1906 में लिखे गए गोर्की के ’मां’ उपन्यास में क्रांतिकारी मानवतावाद की बहुआयामी झलक देखने को मिलती हैं इस उपन्यास में क्रांतिपूर्व परिस्थिति में मजदूर वर्ग का जीवन, निरकुंश राजतंत्र और पंूजीपति (बुर्जुआ) वर्ग के खिलाफ उनका संघर्ष, उनकी क्रांतिकारी चेतना में वृद्धि तथा उसमें से आगे आये हुए पथ- प्रदर्शकों एवं क्रांतिकारी नेताओं को चित्रित किया गया है। सच्ची घटनाओं के ताने बाने से बुना है गोर्की ने अपने इस बहुचर्चित उपन्यास ’मां’ को। इस उपन्यास को रूस के परंपरागत साहित्य और समाजवादी आंदोलन से प्रेरित नवसाहित्य का सेतु कहा जा सकता है।

’मंा’ उपन्यास के नायकों के गाढ़े समय में गोर्की अपने पाठकों से विदा ले लेते हैं। उनके उपन्यास का नायक पावेल (यह क्रांतिकारी रूसी साहित्य का एक लोकप्रिय नाम है, इस उपन्यास से प्रभावित होकर दुनिया के कई देशों में पालकों ने अपने बच्चों का नाम पावेल रखा है) ब्लासोव हजारों किलोमीटर की दूरी पर सदा के लिए साइबेरिया में निर्वासित किया जाने वाला है। उसकी मां पेलागेया निलोवना (उपन्यास की केंद्रीय पात्र) उस सूटकेस के साथ, जिसमें मुकदमे के समय उसके पुत्र पावेल के भाषण के छपे हुए गैरकानूनी परचे भरे थे, राजनैतिक पुलिस वालों के हत्थे चढ़ जाती है। वे उसका अपमान करते हैं, मारते पीटते हैं, मगर वह इर्द -गिर्द जमा लोगों को जीवन की सच्चाई बताने का मौका हाथ से नहीं जाने देती………वह चिल्लाकर अत्याचारी पुलिस अधिकारियों से कहती है- ’’ सच्चाई को तो खून की नदियों में भी नहीं डुबोया जा सकता……..बेवकूफों, तुम जितना अत्याचार करोगे, हमारी नफरत उतनी ही बढ़ेगी।’’
मां कोई काल्पनिक उपन्यास नहीं है बल्कि गोर्की ने इसे क्रांतिपूर्व रूस के झंझावाती दौर के जीते- जागते पात्रों से सजाया था। उनके उपन्यास का ’पावेल’ महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति के तपेतपाये सैनिक प्योत्र जालोमोव थे और ’पेलागेया निलोवना’ उनकी मां आन्ना किरील्लोवना थीं। प्योत्र जालोमोव पेशेवर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी थे जो रूसी सामाजिक जनवादी श्रमिक पार्टी ख्उस समय रूस की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) का यही नाम था, के सक्रिय कार्यकर्ता थे। जारशाही अदालत ने उन्हें साइबेरिया मे निर्वासन की सजा दी थी। गोर्की की मदद से जालोमोव साइबेरिया से भाग निकले थे।

प्योत्र जालोमोव, पीटर्सबर्ग में गुप्त बोल्शेविक संगठन में काम करने लगे और 1905 की क्रंाति के समय उन्होंने मास्को के हथियारबंद मजदूर दस्तों के संगठन में भाग लिया। भावी उपन्यास के लेखक और भावी पावेल ब्लासोव के मूल रूप कई साल से एक -दूसरे को जानते थे, मगर केवल पत्रों द्वारा ही । गोर्की के साथ प्योत्र जालोमोव की पहली मुलाकात 1905 की गरमी में पीटर्सबर्ग के निकट कुओक्काला में गोर्की के देहाती बंगले पर हुई। सख्त और जानलेवा बीमारी और डॉक्टरों की मनाही के बावजूद प्योत्र जालोमोव काम करते रहे। उन्होंने अपने क्रांतिकारी जवानी और गोर्की से मुलाकातों के संस्मरण लिखे, गोर्की की ’मां’ उपन्यास के पाठकों के साथ बड़ा पत्र व्यवहार करते रहे।

प्योत्र जालोमोव बहुत साल तक जिन्दा रहे और 1955 में 78 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हुई। उनकी मां आन्ना किरील्लोवना ने भी काफी लंबी उम्र पाई। उनके बारे में गोर्की ने लिखा है- सोर्मोवो में पहली मई के जुलूस के लिए 1902 में सजा पाने वाले प्योत्र जालोमोव की मां का ही रूप पेलागेया निलोवना थीं। वे गुप्त संगठन में काम करती थीं और भिक्षुणी के भेस में साहित्य ले जाती थीं…..। ’’आन्ना किरील्लोवना का जन्म 1849 में एक मोची के घर में हुआ। उनकी जिंदगी कठिन रही। पति की मृत्यु के बाद तो उन्हें खासतौर पर बहुत बुरा वक्त देखना पड़ा -उनके सात बच्चे थे……. वे ’विधवा घर’ के अंधेरे और ठंडे तहखाने में अपने बच्चों के साथ रहती थीं। मां की दृढ़ता और श्रमप्रियता ने ही परिवार को बचाया। बच्चे धीरे – धीरे बड़े होते गए- कुछ काम करने लगे, कुछ पढ़ते रहे। प्योत्र क्रांतिकारी मंडल में शामिल हो गए जल्द ही पूरा जालोमोव परिवार क्रांतिकारी आंदोलनों में हिस्सा लेने लगा।

यह सच है कि रूस के गोर्की (1868-1936) भारत के प्रेमचंद (1880-1936) तथा चीन के लू शून (1881-1936)- तीनों लेखकों ने ’कला कला के लिए’ सिद्धांत को अस्वीकार किया। गोर्की लेखन- कार्य को लेखक का निजी मामला मानने को हरगिज तैयार नही थे। जीवन से अलग रहने, तटस्थ्ता या पलायन की प्रेरणा देने वाली कला अथवा साहित्य गोर्की को किसी रूप में भी स्वीकार्य नहीं था। यही कारण है, केवल शब्दों में ही मानवता की दुहाई देने वाले लोगों के ढोंग का भी उन्होंने पूरे जोर से झंडाफोड़ किया। उन्होंने साफ शब्दों में और सीधे -सीधे पूछा ’’किसके साथ हैं आप कला के धनी’’ (ठीक उसी तरह जैसे मुक्तिबोध पूछते हैं पाटर्नर तुम किस ओर हो? )
गोर्की साहित्यकारों के रूबरू होकर कहते हैं ’’संस्कृति के महारथियों ’’ आप किसके साथ है क्या आप संस्कृति की रचना करने वाले आम मेहनतकश लोगों के साथ हैं और जीवन के नये रूपों का निमार्ण करने के पक्ष में हैं। या आप इन लोगों के विरूद्ध हैं और गैर जिम्मेदार लुटेरों की जात – ऐसी जात को बचाये रखने के पक्ष में हैं जो उपर से नीचे तक सड़ गयी है और बस मरण के ही जोर में हरकत कर रही है?

मां उपन्यास की शुरूआत तत्कालीन रूस के मजदूर वर्ग और आमजनता की नारकीय स्थिति के वर्णन से शुरू होती है- ’’मजदूरों की बस्ती के धुएं और बदबूदार हवा में हर रोज फैक्टरी के भोंपू का कांपता हुआ ककर्श स्वर गंूज उठता या और उसके आवाहन पर छोटे -छोटे मटमैले घरों से उदास लोग सहमे हुए तिलचटों की तरह निकलकर भाग खडे़ होते हैं…….. और वे फिर पुतलों की भांति सड़क पर चल पड़ते गंदे, चेहरों पर कालिख, भूखे दंात चमकते हुए और शरीर से मशीन के तेल की दुर्गंध छोडते हुए। अपने पति के जीवन के ढर्रे से, शराब और मौजमस्ती से अलहदा बेटे पावेल के गंभीर पढ़ाकू और सलीकेदार व्यक्तित्व से चिंतित मां पूछती है, ’’पावेल किसलिए तुम ऐसा करते हो’’ उसने चेहरा उठाकर मां की ओर देखा, फिर बडे़ ही शान्त भाव से बोला ’’क्योंकि मैं सच्चाई जानना चाहता हूं’’। ’मां’ के समझते देर न लगी कि उसके बेटे ने जन्म भर के लिए अपने आपको किसी बेहद गुप्त और खतरनाक काम के लिए समर्पित कर दिया है। ’’तो तुम करना क्या चाहते हो’’ अचानक मां ने उसकी बात काटकर पूछा। ’’पहले खुद पढंूगा और फिर दूसरों को पढ़ाउंगा। हम मजदूरों को पढ़ना चाहिए। हमें इस बात कि तह तक पहुंचना चाहिए और इसे भली- भांति समझ लेना चाहिए कि हमारी जिंदगी में इतनी मुश्किलें क्यों हैं।’’
’’सच्चाई की तलाश ने ही पावेल जैसे लाखों मजदूरों, किसानो,ं गरीब गुर्बांे को जारशाही रूस के शोषकों, जमीदारों पंूजीपतियों कुलकों के खिलाफ क्रांतिकारी संघर्षो में हिस्सा लेने और एक नये समाज- मेहनतकशों के राज्य की स्थापना के लिए महान क्रांतिकारी लेनिन की अगुआई वाले रूसी कम्युनिस्ट पार्टी( बोल्शेविक) से दृढ़ता से जुड़ने को बाध्य कर दिया। वह यातना, जेलखाना तथा गोलियों की बौछारों का दौर ही था जब अन्याय के खिलाफ न्याय के लिए संघर्ष में मां पेलागेया, बेटे पावेल के अधूरे काम को पूरा करने में जुट गई थी। मई दिवस के अवसर पर संगीनों के साये में निकाले गए मजदूरों के जुलुस को संबोधित करते हुए पावेल ने कहा – ’’लोग कहते है कि इस पृथ्वी पर भांति- भांति के लोग रहते हैं- यहूदी और जर्मन, अंग्रेज और तातार। मगर मैं इस बात को नहीं मानता। इस पृथ्वी पर बस दो तरह के लोग रहते हैं, दो इस तरह के लोग जिनका एक -दूसरे से कोई मेल नहीं हो सकता – एक अमीर और दूसरे गरीब।’’ अमीर और गरीब शोषक और शोषितों के बीच आदिकाल से चले आ रहे वर्ग संघर्ष को तेज करने के पीछे पावेल जैसे क्रांतिकारियों का उद्देश्य क्या था इसे अपने मुकदमें की सुनवाई के समय पावेल ने कुछ यूं व्यक्त किया था- ’’हम समाजवादी हैं। इसका मतलब हे कि हम निजी सम्पति के खिलाफ हैं।

 

हम मजदूर हैं। हम वे लोग हैं जिनकी मेहनत से बच्चों के खिलौनों से लेकर बड़ी-बड़ी मशीनों तक दुनिया की हर चीज तैयार होती है। फिर भी हमें ही अपनी मानवोचित प्रतिष्ठा की रक्षा करने के अधिकार से वंचित रखा जाता है। कोई भी अपने निजी स्वार्थ के लिए हमारा शोषण कर सकता है। इस समय हम कम से कम इतनी आजादी हासिल कर लेना चाहते हैं कि आगे चलकर हम सारी सत्ता अपने हाथों में ले सकें।’’

यहां 1906 में गोर्की द्वारा लिखित ’मां’ उपन्यास की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक होगा। 1905 में जारशाही रूस में व्याप्त अमानवीय स्थिति और वर्गीय शोषण के खिलाफ रूस के मजदूर वर्ग ने पहली क्रांति की थी। लेकिन वह क्रांति असफल सिद्ध हुई। लेकिन रूसी जनता अब वह नहीं रही जो 1905 से पहले थी।

1905 की असफल क्रांति के बाद लेनिन ने ’क्रांति के सबक’ में गर्व से उन महान दिनों को याद किया जब मजदूरों ने अपने उत्पीड़कों के खिलाफ संघर्ष करने को लाखों लाख मेहनतकशों को जगाया था। क्रांति ने निरंकुश सत्ता को जो करारा धक्का दिया, उससे जारशाही को मजबूर होकर जनता को अनेक रियायतें देनी पड़ी। क्रांति जब उभार पर थी, तब जारशाही ने रियायतें दी। जहां उभार कम हुआ, उसने उन्हें वापस लेना शुरू किया। आम जनता की हालत बदतर हो गई। लेनिन ने कहा कि आम जनता का क्रांतिकारी संघर्ष ही उसकी हालत सुधार सकता है। जारशाही कायम है, उसके साथ बडे़ जमींदार कायम हैं। इनकी सत्ता को ध्वस्त करना जरूरी है। इस सत्ता के विरूद्ध संघर्ष में सबसे आगे मजदूर बढ़े। वे जानते थे कि जारशाही से निपटे बिना वे पंूजीवादी शोषण से मुक्ति नहीं पा सकते। किसानों का संघर्ष कमजोर था। लेनिन ने खेत मजदूरों और मुफलिस किसानों की बढ़ती हुई संख्या की ओर ध्यान दिलाया, वे शहरी मजदूरों के साथ मिलकर संघर्ष चलाएं इस पर जोर दिया।

1905 की रूसी क्रांति असफल हुई किंतु वह इतिहास की एक विभाजक रेखा बन गई। उससे एक दौर समाप्त हुआ और दूसरा दौर आरंभ हुआ। 1905 की क्रांति ने वह जमीन तैयार की जिससे आधार पर 7 नंवबर 1917 को रूस के मेहनतकश वर्ग ने रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) के नेतृत्व में सफल समाजवादी क्रांति की। रूसी सर्वहारा वर्ग ने महान क्रांतिकारी लेनिन और स्टालिन के नेतृत्व में शोषकों के स्वर्ग पर चढ़ाई की, पेरिस कम्यून की विफलता से सबक लेकर दुनिया में पहली बार मेहनतकशों का राज कायम किया। जो पूरी दुनिया के सर्वहारा वर्ग के लिए प्रेरणा स्त्रोत बना।

न सिर्फ रूस के मेहनतकशों और कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों बल्कि पूरी दुनिया के क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े लोगों, प्रगतिशील और जनवादी तबकों के लोगों पर गोर्की की ’मां’ और निकोलाई ऑस्त्रोवस्की की ’अग्निदीक्षा’ उपन्यास (जिसके नायक का नाम भी पावेल है) ने अमिट छाप छोड़ी। मैक्सिम गोर्की, लेनिन से पूर्णतः प्रभावित थे तथा मार्क्सवादी विचारों से आकर्षित होने के बाद उनके घनिष्ठ मित्र बन गए। रूसी क्रांति में गोर्की जैसे महान लेखक की भूमिका को लेनिन ने शिद्दत से स्वीकारा है। ’मां’ गोर्की की एक ऐसी अतिविशिष्ट रचना है, जिसका विश्व की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ। कितने ही देशों में क्रांतिकारी आंदोलन के दरम्यान इस पुस्तक को शासकवर्ग ने प्रतिबंंिधत किया है। गोर्की ने जो भी लिखा, उसमें रूस की अवाम के दुख-दर्द उनकी टीसों, आहें, अभाव व भुखमरी का समावेश था। यही नहीं उनके लेखन में मजदूर वर्ग का विजयगान तथा एक नये समाज जिसमें सभी को समान अधिकार मिले का सपना संजोया गया था। उन्होंने जिस तरह के समाज की कल्पना की थी वह उनके जीवित रहते ही साकार हो गयी थी।
आज की दुनिया गवाह है कि पंूजीवादी साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था बेलगाम कहर ढा रही है। प्रतिरोध करने वाले समाजवादी देशों की अनुपस्थिति में अमरीकी साम्राज्यवाद के नेतृत्व में साम्राज्यवादी ताकतें, एशिया- अफ्रीकी एवं दक्षिणी अमेरिका में अपने देशीय दलाल शासक वर्गो के साथ शोषण, लूट अत्याचार और नयी गुलामी (नवउपनिवेशवाद के साये में नवउदारवाद) की विनाश लीला चला रही है। हमारे देश में साम्राज्यवादी ताकतों के पैरोकार संघी सांप्रदायिक फासिस्ट, कॉर्पोरेट गुलामी को जनता पर लाद रहें हैं। ऐसे संकटपूर्ण समय में शोषित, उत्पीड़ित और संघर्षशील जनता के वैचारिक संसाधन की शक्ल में गोर्की की ’मां’ आज भी एक संबल के रूप में विद्यमान है। उन्नीसवीं शताब्दी के पांचवे -छठे दशकों में जिस प्रकार रूसी क्रांतिकारी- जनवादियों ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की हिमायत की थी। उसी प्र्रकार उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त और बीसवीं शताब्दी के पहले दो दशकों में लेनिन जैसे महान क्रांतिकारी नेता ने अनेक बार भारत की आजादी की लड़ाई का समर्थन किया। उन्होंने 1857 के विद्रोह को भारत की आजादी की पहली लड़ाई की संज्ञा दी थी, जिसे कुछ पश्चिमी साहित्यकारों ने ’सिपाही विद्रोह’ कहकर उसका महत्व कम करना चाहा था।

 

1907 में उन्होंने भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अत्याचारों के बारे मे लिखा। 1908 लोकमान्य तिलक की गिरफ्तारी के सिलसिले में बंबई ने जो हड़ताल की, लेनिन ने भारत में सर्वहारा की जागृति के रूप में उसका अभिनंदन किया। 1920 में उन्होंने साफ तौर पर लिखा था कि भारत विद्रोही एशिया का नेतृत्व कर रहा हैै। लेनिन की तरह गोर्की ने भी लिखा था कि ’’ भारत में इस बात का विश्वास दिलाने वाली आवाज अधिकाधिक जोर पकड़ती जा रही है कि भारत में अंग्रेजी राज के दिन पूरे हो गए हैं।’’

अंधकार के विरूद्ध प्रकाश, निराशा के विरूद्ध आशा तथा अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरूद्ध न्याय और समानता की लड़ाई में आज भी ’मां’ अपरिहार्य है। उपन्यास में अपनी गिरफ्तारी के समय जनता को संबोधित करते हुए ’मां’ ने जो कहा था उस समय के रूसी अवाम को जितनी जरूरत थी आज के भारतीय अवाम के लिए भी उतनी ही जरूरी है -’’हमारे बच्चे दुनिया में आगे बढ़ रहे हैं। मैं तो इसे इसी तरह से देखती हूं वे सारी दुनिया में फैल गए हैं और दुनिया के कोने- कोने से आकर वे एक ही लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहे है। जिन लोगों के हदय सबसे शुद्ध हैं जिनके मस्तिष्क सबसे श्रेष्ठ हैं। वे अत्याचार के खिलाफ बढ़ रहे हैं और झूठ को अपने ताकतवर पांवो तले कुचल रहे हैं। वे नौजवान हैं और स्वस्थ हैं उनकी सारी शक्ति एक ही लक्ष्य न्याय को प्राप्त करने के लिए खर्च हो रही है। वे मानव जाति के दुख को मिटाने के लिए इस धरती पर से दुख का नामोनिशान मिटा देने के लिए और कुरूपता पर विजय प्राप्त करने के लिए लिए मैदान में उतरे हैं। और मुझे पूरा विश्वास है कि उनकी विजय अवश्य होगी। जैसा कि किसी ने कहा कि वे एक नया सूर्य उगाने के लिए निकले हैं। और वे इस सूर्य को उगाकर रहेंगे। वे टूटे हुए दिलों को जोड़ने के लिए निकले हैं और वे उन्हे जोड़कर रहेंगे। ’’

इस मामले में हम पिछले कुछ सालों में देखते हैं कि देश में अंधकार के खिलाफ नया सूर्य उगाने वाले तर्कशील दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी, गौरी लंकेश, विद्यार्थी रोहित वेमुला, बंगाल के भंागड़ किसान आंदोलन के मोफिजुल- आलमगीर-हाफिजुल तथा तुतीकोरिन में स्टरलाईट कंपनी के खिलाफ आंदोलन में शहीद हुए लोगों समेत जल- जंगल-जमीन, रोजी -रोटी व जनवाद की लड़ाई के तमाम शहीद और ’मां’ उपन्यास के नायक पावेल देश- काल- परिस्थिति को दरकिनार कर एकाकार हो जाते हैं।

सदंर्भः 1. प्रेमचंद और गोर्की : दो अमर प्रतिभाएं – मदनलाल ’मधु’
2. ’मां’ – मैक्सिम गोर्की
3. नयी पीढ़ी के लिए गोर्की प्रेमचंद लू शून- राणा प्रताप

 


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