🏵 कलादास की 10 कवितायें : वंचितों मजदूरों किसानों , आदिवासियों और महिलाओं की आवाज़ .10 दिन की सीरीज़ .

6 जून 2018 

कलादास डेहरिया मूलतः मजदूरों में लगातार काम करने वाले मजदूर नेता हैं ,विभिन्न ट्रेडयूनियन में सक्रिय छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा मजदूर कार्यकार्यकर्ता समिति के स्थापना सदस्यों में से एक कलादास जी छतीसगढी में लिखने वाले आशु कवि के साथ लोक कला के बडे कलाकार हैं ,राष्ट्रीय स्तर पर गठित रैला कलेक्टिव ( विभिन्न भषाओं मे नाटक गीत समूह ) मे वे प्रमुख कलाकार हैं ,वे खुद और उनके पुत्र पुत्री भी कला के लिए समर्पित हैं ,.
कलादास जी जनसंघर्षों के कवि है और रैली ,आमसभा तथा आंदोलनों में गीत और कवितायेँ गाते हुये आपको मिल जायेंगे .अभी पिछले दिनों उन्होंने प्रतिदिन एक कविता लिखी .आज उन्हीं की कविताये प्रस्तुत हैं .

काली अउ लिखहुँ
आज बर अतके
बिलाई ताके मुसवा
भांडी ले सपट के

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जिन बच्चों के मा बाप को मारा जा रहा है चाहे तूतीकोरिन का हो, बस्तर का हो मंदसौर के किसानों को हो आंदोलन कारी महिलाओं को हो आंगनबाड़ी, मितानिन,दलितों, आदिवासियों को हो इन सब के बच्चों के आखों में आग है वह क्या कह रहा है?
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एक  

ऐ कातिलों सुन लो आज
हम बच्चों का है एलान
आने वाला कल के दिन
आयेगा एक तूफान
हम बच्चों के आँखों से
बरसेगा ऎसा अंगार
उस अंगार के सामने
जल जाएंगे सब हैवान
बिरसा मुंडा ,विरनरायन सिंह
भगत सिंह, सत्य भामा
नियोगी के हत्यारे हो
बेईमानों के प्यारे हो
दौलत कब तक काम आयेगा
कल फिर सुबह से हारे हो
क़्योंकि जनता के हत्यारे हो
ऐ हत्यारों सुन लो आज
तुम लोग बहुत पछताओगे
अपने किये के कर्म से
खुद जलकर मर जाओगे
कल के दिन तैयार रहेगा
हम बच्चों का फ़ौज
फिर लोकतांत्रिक
जनता के अदालत में होगी
कातिलों को सजाए मौत

लिखे हावव अतके
बिलाई ताके मुसवा
भांडी ले सपट के

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दो

मैं विकास बोल रहा हूं
मेरे कांधे पर
बंदूक रख कर क़्यो चला रहे हो
जंगल कटे तो
बांध के नाम पर
गांव उजड़े तो
गरीबों के झोफडीयो पर
बुलडोजर चले तो
मेरा ही नाम
क़्यो लगा रहे हो
दलितो को मार रहे हो तो
आदिवासियों को
मार रहे हो तो
इनकाउंटर कर रहे हो तो
बलात्कार कर
घटना को दबा रहे हो तो
मेरा नाम क़्यो लगा रहे हो
मेरे कांधे पर
बंदूक रख कर क़्यो चला रहे हो
छात्रों, किसानों
महिलाओं, मजदूरो
कर्मचारियों
आंदोलन को
कुचल रहे हो तो
पर्यावरण को
प्रदूषित कर रहे हो तो
पतथरगड़ी से लेकर
अपनी संस्कृति को
कायम रखने वालों को
दबा रहे हो तो
मुझे क़्यो घसीट रहे हो
संविधान में छेड़छाड़
कर रहे हो तो
सार्वजनिक उपकर्मो को
बेच रहे हो तो
श्रम कानून में संशोधन
कर रहे हो तो
मैं विकास बोल रहा हूं
मेरा नाम क़्यो ले रहे हो
शिक्छा और स्वास्थ्य को
बाजारी करण, निजी करण
कर रहे हो तो
मेरा ही नाम क़्यो ले रहे हो
मैं विकास हु
मेरे नाम से
गंदी राजनीति करना
आवाम की हत्या
लोकतंत्र की हत्या
करना बंद करो
मैं विकाश
दुनिया के आवाम के लिए हु
मेरे नाम से सत्ता में
काबिज रहने
गुस्ताखी क़्यो कर रहे हो

काली अउ लिखहुँ
आज बर अतके
बिलाई ताके मुसवा
भांडी ले सपट के
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(1 जुलाई 1992 भिलाई गोलीकांड के पहले1 महीने का4200 मजदूरो का पड़ाव चला था उसी पड़ाव में12 जून को लिखा था कविता)_

तीन 

पड़ाव दर पड़ाव
काफ़िला अपना चला
बच्चे बूढ़े सियान जवान
उतरे है मैदान में सीना तान
उद्घयोगपतियो का
तोड़ेंगे अभिमान
पड़ाव…..
बच्चे बूढ़े किशोर बाला
उतरे है मैदान में
कुर्बानी देने वाला
अंधा सरकार का होगा मुँह काला
पड़ाव…..
एक तरफ मेहनत
दूसरे तरफ तोहमत
एक तरफ हैवानियत
दूसरे तरफ इंसानियत
जीतेगा साथियों
कुर्बानी देने वाला
पड़ाव…….
आज लड़ेंगे साथियों
अपने कल के लिए
शहीदों ने लड़ा था
हमारे आज के लिए
उठाओ आवाज
दुश्मनों के खात्मा के लिए
पड़ाव दर पड़ाव
काफ़िला अपना चला

काली अउ लिखहुँ
आज अब बर अतके
बिलाई ताके मुसवा
भांडी ले सपट के
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चार

लबरा मन के लबारी में
जनता थर्रावत हे
सिधवा मन ड़र्रावत हे
लबरा मन गुर्रावत हे
लबरा मन ल
मस मोटी छाहे
सिधवा मन के टोटा सुखाहे
लबरा मन कांछे काँछ के
ऐसी बंगला में आराम फरमाहे
सिधवा मन गिल्ला
कथरी बरोबर घाम में सुखायहे
लबरा मन के टी वी में
समाचार भराहे
सिधवा मन कोनो
जेल में धराय हे
कोनो के मुहू सीलाय हे

लबरा मन दुनिया भर
घूम घूम के बदरा ओसाय हे
चेला मन ल लबारी पोसाय हे
सिधवा मन दाना बर
गोहार लगाय हे
लबरा मन 1 रुपया के चाउर
अउ फोकट के नून में फ़साय हे
सिधवा मन ल कुसियार पेरे Bकस
वोट के मशीन बनाय हे
लबरा मन के
जम्मो लबारी नित हे
सिधवा मन के
जम्मो सच ह अनित हे
लबरा मन छत्तीसगढ़िया
सबले बढ़िया कहिके भरमाय हे
अपन जाल में फ़साय हे
सिधवा मन आवव
लबरा मन ल सबक सिखावव
मोला अउ कुछु सोचन देवव
मोरे डिमांक ल झन खावव
जम्मो झन डीमाक लगावव

आज सर अतके
काली अउ लिखहु
बिलाई ताके मुसवा
भांडी ले सपट के
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पांच

कदम दर कदम आगे बढूंगा

मैं खदान में काम करने वाला मजदूर हूँ
लोहा पत्थर तोड़ने वाला मजदूर हूँ
दिनभर खून पसीना बहाकर सिर में कफन बांधकर
मेहनत करता हूँ
मैं परेशान हो जाता हूँ
आवाज उठाता हूं
खून पसीना बहाने के बाद भी मैं भूखा मरता हूं
मैं कारखाना में काम करने वाला
भट्ठी के गर्म ताप में तपने वाला मजदूर हूं मेहनत करता हूं
कई घंटे कड़ी मेहनत के बाद परिवार का मुश्किल से पेट भरता हूं
मुझे डराया जाता है धमकाया जाता है
मेहनत के बदले कुछ मांगू तो सीधा काम से भगाया जाता है
इस परिस्थिति से कैसे निपटूं
सोचता रहता हूं
रोटी की तलाश में
भटकने वालों की लाइन में
अपने आप को पाया करता हूं
मैं समझ रहा हूं
इस परिस्थिति के खिलाफ
लड़ना पड़ेगा लड़ूंगा
कुछ भी हो इस क्रूर व्यवस्था से नहीं डरूंगा
मेहनतकशों का राज लाने
कदम दर कदम आगे बढूंगा
कदम दर कदम आगे बढूंगा

काली अउ लिखहुँ
आज बर अतके
बिलाई ताके मुसवा
भांडी ले सपट के

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छ:

 

मेरे एक दोस्त ने पूछा
क्या गा रहे हो?
किसके बारे में गा रहे हो?
किसको सुना रहे हो?
मैंने कहा मुझे गाने दो
शहीदों के
विचारों के गीत को
मेरी स्वतंत्रता पर
क़्यो टांग अड़ा रहे हो?
पूरी रात नही सोया हूँ
यह सब अवाम के साथ
क्या हो रहा है?
उसी में खोया हूँ
जो कुछ हो रहा है
वो मुझे बताने दो
क़्यो टांग अड़ा रहे हो
मुझे गाने दो
बजाने दो

काली अउ लिखहुँ
आज बर अतके
बिलाई ताके मुसवा
भांडी ले सपट के

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सात

चुनाव आथे
नेता मन भूंकथे
एक दुसर के ऊपर
ओसरी पारी थूंकथे
मिलजुर के
जनता ल चुसथे
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आठ

किसके साथ?
किसका विकास?
इसके ऊपर
किसका विस्वास?
ये किसके खास?
मजदूर तो है निराश
किसान निराश
छात्र निराश
कर्मचारी निराश
व्यपारी निराश
90 प्रतिशत जनता निराश
इसके मतलब
अडानी का विकास
अम्बानी का विकास
माल्या का विकास
नीरव का विकास
कारपोरेट घरानों का विकास
धर्म और जाति के
ठेकेदारों के विकास
भु माफियाओं
कोल माफियाओं
शराब माफियाओं
खनिज माफियाओं
महिला उत्पीड़न
करने वालों का विकास
लोकतंत्र के हत्यारे
संविधान के हत्यारे
जुमले बाजों का विकास
नदियों को
बेचने वालों का विकाश
दलितों की हत्या
आदिवासियों की हत्या
करने वालो का विकास
भीड़ में हत्या
करने वालो का विकास
जल ,जंगल,जमीन को
विदेशी कम्पनी वालो का
चारागाह बनाने वालों का विकास
अब आप ही बताये
दिमाग लगाये
किसके साथ?
किसका विकास?

काली अउ लिखहुँ
आज बर अतके
बिलाई ताके मुसवा
भांडी ले सपट के

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नौ 

मैं मिट्टी हूँ
मुझसे सब है
सबसे मैं नहीं
लोहा बड़ा इतराता है
लेकिन उसे ये पता नहीं
मेरे गर्भ से ही पैदा हुआ है
सोना, हिरा, पितल, तांबा
सब इतराते है
उसे पता नही की
मेरे गर्भ से पैदा हुआ है
बम, बारूद सब प्रयोग कर रहे है
फिर भी मै बर्दास्त किया हु
मुर्दे से लेकर कचरे के ढेर को
ढक लिया हूं
खाद और जीव, जन्तु के रूप मे रूपांतरित हो गया हूं
क्योंकि मैं विग्यान विज्ञान हूँ
मुझसे ही सुन्दर सुंदर मुर्ती
तथा कथित भगवान भी
बना लेते हैं
मुझमे ही मलमुत्र और थुकतें हैं
लोहे का घमंड जब चुर करता हूँ
जब मेरे अन्दर के पत्थर को
उजागर करता हूँ
थक जाता है लोहा
फिर अपना धार तेज कराता है
फिर आता है
मैं हारता नही
क्योंकि मै विज्ञान हूं पानी देता हूँ
पुरे दुनिया को जिवन देता हूँ
कोई बतादे बदले में कुछ
लेता हूँ ?
पहाड, नदिया, झरने, नाले
मुझमे टिका है
क्या ये किसी को दिखा है
मेरे अन्दर रूपांतरित होता है
क्योंकि मै विज्ञान हूं
हवा और मेरा गहरा नांता है
हमको ही तो प्राकृतिक
कहा जाता है
मै मिट्टी हूं
मुझसे सब है
सबसे मै नही

काली अउ लिखहु
आज बर अतके
बिलाई ताके मुसवा
भांडी ले सपट के
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दस 

संघर्ष, निर्माण का गीत गाता हूँ
अपनी दुख भरी कहानी
अपनी जुबानी सुनाता हूँ
अपने दुखों को
गीत माला बनाकर गाता हूँ
दो वक़्त के रोटी के तड़फन को
माला बना कर सजाता हूँ
मैं अपने खून पसीने को
दिन रात समझाता हूँ
पर मेरा हर सपना को
चकनाचूर होते हुए पाता हूँ
मैं अपने आप को हँसाता हूँ रुलाता हूँ
हँसी को कलम और
आँसू को स्याही बनाता हूँ
कभी कभी मन का
लड्डू खूब खाता हूँ
पर मेरी जीभ
तड़फ-तड़फ कर रोती है
क़्योंकि हाथ में
लड्डू नही पाता हूं
मेरे सपने मेरी कमाई को
लुटेरों को लूटते हुए पाता हूँ
मेरी खून और पसीना को
रो रो कर कहते हुए पाता हूँ
मैं पूरी दुनिया का
निर्माण करता हूं पर क़्यो?
दो वक़्त के रोटी के लिए
तरस जाता हूँ
आज की राजनीतिक व्यवस्था को
हत्यारा बनकर
मजदूर, किसान, छात्र, नवजवान
का हत्या करते हुए पाता हूँ
इसी से निजात पाने के लिये
शहीद नियोगी जी के राह पर
संघर्ष, निर्माण का गीत गाता हूँ
रोते हुए मन को, ओरों का दुख
सुनाकर चुप कराता हूँ
अपने मन में हर पल
हर दिन, रात
शहीदों के याद में
दिया जलाता हूँ
हम बनाएंगे नया पहचान
राज करेगा मजदूर किसान
यही लक्षय है
यही नारा लगाता हूँ
लाल सलाम कहते हुए
आगे कदम बढ़ता हूँ
संघर्ष निर्माण का गीत गाता हूँ


काली अउ लिखहुँ
आज बर अतके
बिलाई ताके मुसवा
भांडी ले सपट के

 

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