बोड़सरा का सच :  बोड़सरा इतिहास और विवाद के परतों को कुरदते हुए सच्चाई पर आधारित गहन पड़ताल.: उत्तम कुमार : संपादक दक्षिण कौशल 

बोड़सरा का सच :  बोड़सरा इतिहास और विवाद के परतों को कुरदते हुए सच्चाई पर आधारित गहन पड़ताल.: उत्तम कुमार : संपादक दक्षिण कौशल 

5.06.2018

बोड़सरा का एक गौरवशाली इतिहास है। इस पूरे इतिहास को देखते हुए बोड़सरा पर वास्तव में सतनामी समाज का ही हक बनता है जो सतनामियों के साथ पूरे पीडि़त समाज का ऐतिहासिक धरोहर है लेकिन उस पर कब्जा को लेकर जो विवाद उत्पन्न किया गया है उसे हल करने की कोशिश नहीं हो रही है बल्कि बोड़सरा के नाम पर सतनामी समाज का राजनैतिक धु्रवीकरण हो रहा है।

 

पूरे प्रकरण के जांच पड़ताल में पूरे सात माह लग गए। जिसमें इतिहास, पुरातात्विक अध्ययन, कानूनी दांवपेज के साथ सभी वर्गों से विचार-विमर्श कर एक निचोड़ में पहुंचना था। इस रिपोर्ट में जानकारियां हासिल करने में जहां एक ओर अपनी सीमित संसाधनों के कारण कई कठिनाइयां आई वहीं एक के बाद एक कई सज्जन पुरूषों का सहयोग भी मिला। पिछले लंबे समय से छत्तीसगढ़ अखबार में लगातार ज्वलंत विषयों पर पत्रकारिता करने के बाद भी यह तथ्यान्वेषण रपट छत्तीसगढ़ अखबार में प्रकाशित नहीं हो पाई। उसके बाद डॉ. आरके सुखदेवे व सुखऊ निषाद का मैं आभारी हूं कि उन्होंने लगातार मेरे हौंसले को बढ़ाते हुए इस रिपोर्ट को प्रकाशन के लायक समझा। मैं दिलीप साहू व प्रफुल्ल ठाकुर का जो अब नामी पत्रकार हैं का भी आभारी हूं कि उन सभी ने इस मसले को गंभीरता से लिया। मैं उन तमाम पीडि़त सतनामियों का आभारी हूं, जिन्होंने बेबाग ढंग से अपनी बातों को पुलिस के पहरे में हमें निर्भीकता के साथ बयान किया। मैं वीरेन्द्र कुर्रे व संतराम का भी आभारी हूं कि वे बरसात के दिनों में भींगते हुए साइकिल से हमारे साथ बोड़सरा की सच्चाइयों को जानने में हमें मदद की। मैं उन आशावान लोगों को एक बार फिर आशा दिलाता हूं की बोड़सरा सतनामियों का है और यह बालकदास का राजमहल उन्हें अवश्य वापस मिलेगा।

यह रिपोर्ट एक कोशिश है, बोड़सरा विवाद को हल करने में। लंबे समय से ही सतनामी समाज अपने आस्था से जुड़ें एक खंडहर-सा राजमहल को न्यायसंगत ढंग से हासिल करने के लिए पूरे 5 वर्षों से संघर्षरत है। कोर्ट ने कब्जाधारी बाजपेयी परिवार के द्वारा दायर याचिका जानमाल की सुरक्षा के मांग पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दे दिया है। सरकार अपने प्रयासों में सफल नहीं हुआ है। पूरे सतनामी समाज के साथ सर्वसमाज के लोग बोड़सरा को सतनामियों को सौंपने के पक्षधर हैं। बाड़ा की जमीन पर मालिकाना हक की वास्तविकता उजागर करना एक श्रमसाध्य व ऐतिहासिक खोज व पुरातात्विक सर्वेक्षण की मांग करती है।

एक पत्रकार के रूप में बोड़सरा के इतिहास और उसकी सच्चाइयों पर गहन पड़ताल किया गया है। कइयों साहित्य, ऐतिहासक ग्रंथों, पत्र-पत्रिकाओं, बोड़सरा व उसके आसपास के लोगों से रूबरू होकर, विभिन्न वर्गों से चर्चा व जांच-पड़ताल कर इस पूरे प्रकरण में प्रकाश डाला गया है। यह कोशिश जहां एक खोजी व मेहनती पत्रकार के रूप में कार्य को प्रदर्शित करने की चुनौती देती है वहीं सतनामी समाज व बोड़सरा से जुड़े सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक व वैज्ञानिक जानकारियों को टटोलते हुए यह कार्य इतिहास के विद्यार्थी के रूप में इस पूरे विवाद को हल करने की दिशा में सच्चाइयों को उजागर करता दिखता है। आशा है यह तथ्यान्वेषण सतनामी समाज के लिए मील का पत्थर साबित होगा। इतिहास पर आधारित तथ्यान्वेषण की मदद से यह रपट समाज, न्यायालय व सरकार को इस विवाद का न्यायसंगत हल खोजने में मदद पहुंचाएगी।


बोड़सरा की ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले व बाद सतनामियों पर किसी न किसी रूप में हमले होते रहे हैं। अब उनके आस्था का केंद्र बोड़सरा को लेकर विवाद खड़ा कर दिया गया है। बोड़सरा बाड़ा संबंधी घटनाक्रम ने समाज के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। इन सवालों से पर्दा उठाना एक कष्टकारी कार्य है, लेकिन असंभव नहीं। मीडिया ने बोड़सरा प्रकरण में 10 से 12 अप्रैल 2008 की घटना को दर्शाया है। जिसमें सतनामी समाज को बलात् एक बाड़ा को कब्जा करते दिखाया गया। उसके बाद पुलिस पर हमला, गाडिय़ों को जलाया जाना जैसे घटनाओं को तुल दिया गया है। किन परिस्थितियों में समाज बोड़सरा बाड़ा प्राप्त करना चाहता है, उसे कहीं नहीं बताया गया।
घटना सतनामी ध्वज फहराने के बाद प्रारंभ हुआ। धारा 144 के लागू करने के बाद पुलिस व शासन ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए गांव पर किस तरह कहर बरपाया व लूटपाट मचाया, उस पर कुछ नहीं कहा गया। प्यारी बाई की हत्या कर दी गई। शव को गायब कर दिया गया। रामाधीन महिलांगे की जेल में संदिग्ध अवस्था में मौत हो गई। गुरू बालदास सहित 36 सतनामियों को जेल में ठूंस दिया गया। उसके बाद पूरे प्रदेश में सतनामियों ने विरोध प्रदर्शन किया। शासन-प्रशासन ने उन पर हमले किए लेकिन सतनामियों ने अपनी एकजुटता व संघर्ष का परिचय दिया। बोड़सरा पूरे तौर पर राजनैतिज्ञों के लिए पहलवानी का अखाड़ा बन गया।

बाजपेयी परिवार के साथ बैठकर बाड़ा का संतोषजनक हल ढूंढने की कोशिश अब तक नहीं हुआ है। पूरे बाड़ा को पुलिस कब्जा करके बैठी हुई है। पुलिस की गाडिय़ा प्रतिदिन गांव में दहशत फैलाने के कार्य को अंजाम दे रही है। पूरा गांव मौत, लूटपाट, बलात्कार, पलायन व खौफ के साए में अपना दिन काट रहा है।

ऐतिहासिक दृष्टि में बोड़सरा

ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से देखा जाए तो बोड़सरा का गौरवशाली इतिहास है। जिन्हें शिक्षा की सुविधा प्राप्त थी वे सत्ता के मजबूत गढ़ों पर अधिकार कर बैठे। इस प्रकार ब्राह्मण जिन्हें राजनीतिक, आर्थिक व प्रशासनिक ताकत मिली हुई थी वे वंशावलियों व आस्था के केंद्रो पर काबिज हो गए। बाद में वे ऐसे प्रतीकों के अनुरक्षक बन गए। शोषण के मशीन में भू-आबंटन व मालिकाना अधिकार को इतना जटिल बना दिया गया कि वह आज समस्या का रूप ले लिया है। बोड़सरा का इतिहास सिख धर्म में खालसा पंथ के इतिहास के समकालिन है। ठीक लगभग 300 वर्षों का सतनामी पंथ का लड़ाकू व संगठित इतिहास है। यह इतिहास गुरूघासीदास के द्वितीय पुत्र बालकदास के इतिहास को उठाकर देखने की जरूरत बताती है। विलियम ग्रांट के अनुसार बालक दास का जन्म 17 फरवरी 1786 को ग्राम गिरौदपुरी में हुआ। उनकी मृत्यु 1878 को हुई। जबकि चीशम के अनुसार उनकी मृत्यु 1868 से 1860 के मध्य का है। कुछ इतिहासकार उनका जन्म तैलासी में होना बताते हैं। गुरू बालक दास का विवाह सन् 1822 में हुआ था उन्होंने आर्थिक, राजनैतिक व सैनिक स्थिति को सुदृढ़ करने के उपाए सुझाए थे। सामाजिक नियमों का उल्लंघन करने व नहीं मानने वालों को पंथ, भंडारी व महंत के सम्मुख छड़ीदार बुलाकर लाता उन्हें दंड सुनाया जाता था अंतिम निर्णय गुरू गद्दी भंडारपुरी का आदेश व दंड सर्वमान्य होता था। भंडारपुरी में गुरू जगमोहन दास के हिस्से के घर पर न्यायालय बने कोर्ट का नमूना आज भी देखा जा सकता है। बाबा बालकदास जहां-जहां गए वहां-वहां सतनाम चेतना का प्रचार करते गए। मूर्तिपूजा का विरोध किया एवं सत्य को ही श्रेष्ठ माना।

 


उस समय उनके द्वारा प्रशासनिक ढांचा भी बना लिया गया था। गुरू घासीदास घूमते हुए कुमदा गांव गए वहां से बोड़सरा में जाकर रहने लगे। गुरू बालकदास का बचपन घोर कष्ट, कठिनाइयों में गुजरा। वहां उन्हें 9 गांव दान में मिले बोडसरा खुडिय़ाडीह, कुंआ, झाल, बुंदेला, दुर्गडीह, पिरैया, नगाराडीह व कनेरी। यह दान की प्रथा राजपूत शासन से लेकर मुगलकाल तक जारी रहा। मठ संगठन के बाद गोसाई पंथों को भी मिलने लगे। जो बाद में मालगुजार व भूस्वामियों के हाथ में आकर राजनीतिक दांवपेज में बदल गया। इस दान के साथ गुरू घासीदास ने रावटी प्रथा को प्रारंभ किया।

 

बोड़सरा गांव जिला बिलासपुर से 27 किलोमीटर दूर बोड़सरा बिल्हा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। जिसकी आबादी लगभग ढाई हजार के आसपास है। सन् 1821 ईस्वी के आसपास बोड़सरा राजमहल का निर्माण गुरू घासीदास के मार्गदर्शन में गुरू बालकदास के द्वारा हुआ। वे अपने पिता के समान ज्ञानी और बलशाली थे। उन्होंने अपने पिता के बताए हुए सतनाम रावटी प्रथा को आगे बढ़ाया। वे सोनाखान के बिंझवार नरेश रामराय के सुपुत्र वीरनारायण सिंह के अच्छे मित्र थे। दोनों ने ही मिलकर अंग्रेजों के समय अकाल भूख व जमींदारी प्रथा के खिलाफ संघर्ष किया था। यही कारण है कि वे अंत तक ब्रिटिश सरकार, जमींदारों व साहूकार-ठाकुरों के आंखों के किरकिरी बने रहे। दोनों ने मिलकर सतनाम आंदोलन को गति दी। सांप्रदायिक, सामंतवाद व साम्राज्यवाद को धूल चटाने दोनों कंधे से कंधा मिलाकर लड़े बाद में अन्याय अत्याचार के विरूद्ध संघर्ष कर अंधविश्वास और रूढि़वाद को जड़ से समाप्त करने की योजना बनाई।


रसेल तथा हीरालाल शुक्ल ने कहा कि यह वह काल था जब मराठों, अंग्रेजों, सामंतों व मालगुजारों के खिलाफ उठने वाला विद्रोह अंत में सभी स्वर्ण हिन्दुओं के पक्ष में हो गया। यदि ब्रिटिश शासन का अवरोधी प्रभाव न होता तो अब तक छत्तीसगढ़ में सतनाम आंदोलन एक सामाजिक युद्ध का रूप ले लेता। उन्होंने गांव-गांव घूमकर सतनाम आंदोलन को आगे बढ़ाया और युवावस्था से ही सतनाम सेना गठन कर रावटी द्वारा सतनाम पंथ का प्रचार-प्रसार करने लगे। उनका प्रभाव पूरे छत्तीसगढ़ में दलित शोषित समाज के ऊपर पडऩे लगा। वे समाज के लिए साहस अगुवाई के प्रतीक बन गए। उन्होंने अपनी सुरक्षा एवं आवागमन के लिए पर्याप्त अंगरक्षक, घोड़े व हाथी रखना प्रारंभ किया। अंग्रेजों के आगमन के समय वर्ष 1820 में उनकी ख्याति एक शक्तिशाली राजा के समान हो गई थी। वे हाथी पर सवार होकर सतनाम सेना के साथ रावटी करते थे। उनके प्रयत्न से सतनामी समाज एक सुसंगठित समाज में बदलने लगा था। इसके पूर्व उनकी केंद्रीय सत्ता छिन्न-भिन्न हो गई थी। वे अठगवा कमेटी गठन कर उसके संचालन के लिए विशाल संगठन का निर्माण किया। गुरू बालदास का यह आंदोलन साल 1830 से 1859 तक निरंतर चलता रहा। उनके राजा बनने के बाद भंडार, तैलासी, खपरी व खडुआ आदि जगहों पर दशहरा त्योहार के दूसरे दिन गुरूदर्शन मेला भरना प्रारंभ हुआ। इसलिए आज भी गुरूवंशज राजशी वेशभूषा में दर्शन देने निकलते है।

इस प्रथा को बालकदास ने ही प्रारंभ किया था जिसमें आत्मरक्षा व सामाजिक सरंचना की रक्षा के लिए औजार धारण करके ये लोग निकलते हैं जो राजा बनने के बाद उन्हें अधिकार में मिला।

गुरू बालकदास रावटी करते-करते मुंगेली तहसील से 15 मील पहले दक्षिण की ओर औरा-बांधा नामक गांव पहंचे। जहां 28 मार्च 1860 को राजपूत-ठाकुरों ने अंग्रेजों के साथ षड्यंत्र कर निशस्त्र बालकदास की हत्या कर दी। कालांतर में सतनामियों ने इस हत्या का बदला लिया। उनके हत्या के बाद सतनामियों की सांगठनिक व सामाजिक प्रतिष्ठा धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। अंग्रजों ने भूमि बंदोबस्त कानन लागू कर दिया। भूख, अकाल, मौत से वंचित वर्ग सामना करने लगे। जो आज भूमि काननों में फेरबदल कर हमारी बेशकीमती जमीन को अधिग्रहण कर रहे हैं वे आज भी अंग्रेजों के बनाए गए भूमि अधिग्रहण कानून 1864 का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। जमीन की कीमत औने पौने दामों में चुकाया जाता है बाजार मूल्य से उनका कोई वास्ता नहीं है ऊपर से पुनर्वास की कोई गारंटी नहीं होती है।

जबकि सतनामियों के राजमहल व बाड़ा को अधिग्रहण के लिए कानून आड़े आ रही है आज स्थिति यह है कि 1882 की संपत्ति अंतरण अधिग्रहण लागू कर वे जमीन व संपत्ति को अधिग्रहण व कब्जा कर रहे हैं। भूमि रिकॉर्ड छल-कपट के साथ उलझे हुए है जिनमें वो तमाम महत्वपूर्ण नाम दर्ज ही नहीं हंै जो दशकों से जमीन में किसानी व महल में काबिज थे। जिनके नाम भूमि दर्ज हैं उन्हें नाममात्र का मुआवजा व आनन-फानन में उजाड़ दिया गया है। उस समय कानून उनका था, शासन व्यवस्था उनकी थी। साहूकारी उनकी थी। अब कागजाद भी उनके नाम है, फिर कोर्ट किसको न्याय देगी?


ग्राम पंचायत के प्रस्ताव का उल्लंघन

यह एक बहुत ही जटिल दस्तावेजी व्यवस्था है जिसको कारण बताकर बोड़सरा पर सतनामियों का हक छिना जा रहा है। अब बोड़सरा सतनामियों के लिए आस्था का केंद्र बन गया है। 1931 के करीब गांधी ने कहा था कि-‘बिना किसी कारण के धनी वर्ग से निजी संपत्ति छीनने के किसी सुझाव में मैं सहयोगी नहीं बनूंगा यद्यपि जवाहरलाल नेहरू संपत्ति के राष्ट्रीकरण की बात करते हैं परंतु इससे आप लोगों को डरने की जरूरत नहीं है।’ (संपूर्ण गांधी वांड्मय-55, पृष्ठ 257-260) वंचित (सतनामी) भूमि से बेदखल होने लगे। गुरू बालकदास के अनुयायियों के कमजोरियां की वजह से बोड़सरा राजमहल वैष्णव, मानिकपुरियों व आदिवासियों के हाथ से अब उत्तरप्रदेश से आए गया प्रसाद बाजपेयी के हाथ में है। अब उसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश हो रही है। उसे घृणित राजनीति का खेल बना दिया गया है। ग्राम पंचायत के प्रस्ताव के खिलाफ सरकार व न्यायालय जमीन अधिग्रहण करने में चौरंगा में जुटी हुई है लेकिन ऐसा प्रयास बोड़सरा में सतनामियों के लिए जमीन अधिग्रहण करने क्यों नहीं करते? जबकि वह जमीन पुश्तैनी सतनामियों का है अब सतनामियों को अपनी संपत्ति की रक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय में अपना पक्ष रखना होगा, लेकिन अब न्याय का मामला घृणित राजनीतिके दलदल में फंस चुका है। सरकार अपने नफा-नुकसान के हिसाब से फैसला लेने में लगी हुई है। गुरू बालकदास के इतिहास से स्पष्ट है.

बोड़सरा बाड़ा सतनामियों का है।
राजमहंत नयनदास कुर्रे ने किया विरोध

नब्बे के दशक में राजमहंत नयनदास कुर्रे न गुरू घासीदास के जन्म, कर्म एवं तपोभूमि गिरौदपुरी चटुआ व बालकदास का दर्शन मेला कुंआ बोड़सरा को भव्य और आकर्षक बनाने की नई योजना व व्यवस्था पर काम हुआ था। मार्च 2006 में मासिक पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ की आवाज’ ने सतनामियों के नौ धामों में से एक कुंआ बोड़सरा पर वहां के बालकदास की गद्दी की तस्वीर सहित समाचार प्रकाशित की है। बाड़ा 4 एकड़ के परकोटे पर बना हुआ है जहां बालकदास के 178 एकड़ खेत भी है जो बाजपेयी के कब्जे में है। यह पड़त भूमि के रूप में तब्दील होते जा रही है। यहां पर अमृत कुंड जगजाहिर है। बाड़े से दस फीट की दूरी पर स्थित तालाब में जैतखाम का ठूंठ पाया गया है जो ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत करता है। उसके बाद अक्टूबर 2002 से बोड़सरा बाड़ा को हासिल करना सतनामी समाज का उद्देश्य बन गया है। इस स्थान में गुरू बालकदास के शासनकाल से अब तक लगातार मेला भरता आया है। पहली बार यहां तनाव की स्थिति 12 जनवरी 2003 को गुरू आशकरण दास की उस घोषणा से शुरू हो गई कि, ‘हम किसी भी स्थिति मेें बाड़ा को लेेकर रहेंगे।’

उस दिन क्या हुआ था बोड़सरा में?

बाजपेयी परिवार के अनुसार छह जनवरी 2003 को उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल करने के बाद बाड़ा में यथास्थिति बनाए रखने के बाद पुलिस बल लगा दिया गया है। इस वर्ष 12 अप्रैल को तलवार-लाठी से लैस सतनामियों ने मेला के रूप में जैतखंभ में ध्वज फहराने सैकड़ों की संख्या में बोड़सरा पहुंचने लगे। मेला के दिन सतनामियों की संख्या 50 हजार से भी अधिक थी। एक ओर सशस्त्र पुलिस दूसरी ओर पंरपरागत हथियारों से लैस सतनामी समाज का जन- सैलाब। इस बीच उत्पन्न होने वाली टकराहट को रोकने सरकार प्रशासन किसी ने भी कोशिश नहीं की। उस गरमा-गर्मी में सतनामियों के साथ स्वभाविक है पुलिस की झड़प उत्पन्न हो गई। अखबार, चैनल, शासन-प्रशासन ने सतनामियों के सिर बवाल का ठिकरा फोड़ दिया। उसके बाद जो कुछ घटा वह शासन-प्रशासन व न्यायव्यवस्था की बर्बर छबि को उजागर करता है जिसे हम गांव के जुबानी समझ सकते है। डॉ. वीके वैष्णव के अनुसार उस दिन किसी को गहरा चोट नहीं लगा। चोट जमीन व दीवार से लगने के कारण आए। प्यारी बाई का निधन बीमारी के कारण हुआ। स्कूल में भोजन बनाने वाला महंगू एवं उसकी पत्नी श्यामबाई को पुलिस ने मारा-पीटा। श्यामबाई ने बताया कि पुलिस वाले घर में घूसकर 40 हजार रुपए, थाली, बर्तन, सोना-चांदी ले उड़े। उनके पति महंगू को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया गया। वे 14 दिन जेल में रहे। पुलिस ने सतनामियों को मारा। स्कूल के विद्यार्थी सरिता, सत्यवती, मंजू, ममता, गोमती ने बताया कि पुलिस वाले उस दिन मारपीट कर रहे थे वे कहते हैं कि बाड़ा गुरू बालकदास का है। टेकराम निराला ने बताया कि पुलिस ने मारा, आंसू गैस की गोलियां चलाई, बिना चेतावनी फायरिंग शुरू कर दी गई। उनका कहना हैं कि बाजपेयी जबरन कब्जा कर बैठा हैं वे पुलिसिया ज्यादती देख गांव छोडक़र भाग गए थे।


गांव में पुलिस ने बलात्कार की घटना को अंजाम दिया है। अमृत कोसले ने बताया कि पुलिस मारपीट के कारण हम लोग कुंआ गांव चले गए थे। उन्होंने आगे बताया कि प्यारी बाई को पुलिस ने ही मारा है। महेन्द्रनाथ चौहान ने बताया कि बाड़ा का दो-तीन बार खरीदी बिक्री हो चुका है। पुलिस के गांव में होने से बच्चों में डर समाया हुआ है। शिक्षक जानकी प्रसाद कौशिक ने बताया कि बालकदास की औरा-बंाधा में हत्या हो गई थी उसके बाद बाजपेयी अपने नाम बाड़ा करवा लिया है। पुलिस घर के सभी सामान व मवेशी भी ले उड़े। पुलिस मारपीट में सभी को चोट लगी है पुलिस ने दौड़ा-दौड़ा कर मारा है अब तक किसी को मुआवजा नहीं मिला। अशोक कुमार कोशले ने बताया कि लडक़े का विवाह अप्रैल में था मैं उसके तैयारी में व्यस्त था पुलिस जबरदस्ती घर में घुसकर गाली-गलौच व मारपीट करने लगी। घर के सामानों को तोड़ा-फोड़ा जो विवाह से संबंधित था। इस पूरे घटनाक्रम में 65 हजार की क्षति हुई है। लोचनबाई ने बताया कि पुलिस घर में घुसी और मुझे व मेरी नातिन को पीटना प्रारंभ किया। मेरी नातिन व बहू घर छोडक़र भाग खड़े हुए।

पुलिस को नंगा-नाच करने अनुमति किसने दी?

पुलिस वालों ने सभी को घर से निकालते हुए कह रहे थे कि अब बुलाओ तुम्हारे घासीदास को वही साला बचाएगा। चंद्रकुमार ने बताया कि सिर्फ सतनामियों के ऊपर हमला हुआ है घायलों का लापरवाही से इलाज किया गया। चैती ने बताया कि दरवाजा खुलवाकर पुलिस ने मारपीट की, सामानों को तोड़-फोड़ कर घर का खटिया कुलर सब पुलिस ले गए। वे आगे कहते है कि बालकदास की हत्या के बाद उनके अनुयायियों ने बाड़ा को बेच दिया। बिंदु ने बताया कि जैतखाम में ध्वजारोहण के बाद पुलिस वाले दंगा-फसाद में उतारू हो गए। दरवाजा को तोडक़र घर में घूसे और 20 हजार रुपए ले गए। उनका कहना था कि जब पुलिस व कलेक्टर ने गांव पर हमला बोला तब रिपोर्ट किससे करें? सबका कहना था, ‘मार खाएं, पूंजी लूट लिए, आंदोलन हुआ अब तो बाड़ा मिलना ही चाहिए।’ पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी बोले कि बाड़ा देंगे लेकिन अब तक नहीं मिला। कलक्टर आएं प्रेस वाले आए सांसद सियाराम कौशिक, पुन्नू लाल मोहले आया लेकिन मुआवजा नहीं मिला, मुख्यमंत्री के पास गए लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई। अमर बाई बताती है कि पुलिस घर में घुस-घुसकर मारा-पिटा, कपड़े ले गए, टीवी तोड़ दिए, लडक़े-बच्चे किसी को नहीं छोड़ा सबको मारा-पिटा, इन घटनाओं में महिला पुलिस भी शामिल थी। कपिल नारायण ने बताया कि मेला के दिन सभी गांव छोडक़र भाग गए, पुलिस के पास गोलाबारूद और आंसूगैस थे हमारे पास सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं था मार खाएं जेल काट आएं, बर्तन, लोटा, मोटर साइकिल सब तोड़ दिया।


पूजा करने से लगाया रोक

रामनारायण कुर्रे ने बताया कि हमारे पूर्वज के समय से हम बाड़ा में पूजा करने जाते थे कुर्रे ने बताया अब बाजपेयी परिवार ने पूजा करने से रोक लगा दिया है। पुलिस ने सबसे पहले मारपीट चालू किया। सबका कहना हैं कि बाड़ा में जैतखाम था बाबा का गद्दी था सब तोड़ कर नष्ट कर दिया। बालकदास चिकित्सक थे, वे कई बीमारियों का इलाज करते थे। जब गुरू बालदास झंडा फहराकर नीचे उतर रहे थे तब तक पुलिस ने डंडों-लाठी व आंसूगैस से फायरिंग शुरू कर दिया था बाड़ा हमारे पूर्वजों का है जो मिलना चाहिए। एक बच्ची की मां कहती है, मेरी लडक़ी पूर्णिमा पांच दिनों तक पुलिस के कब्जे में थी हफ्तेभर बच्चे डरते रहे, रात में डर के मारे नींद से जाग जाते हैं शासन क्षतिपर्ति दें और किसी भी हालत में बाड़ा को हमें सौंपे। पूर्णिमा कुर्रे ने बताया कि मैं 5 दिनों तक पुलिस के पास थी पुलिस घरों में घूस-घूसकर मारपीट कर रही थी तीन पुलिस वाले मुझे मारने आए तब एक ने कहा यह बच्ची है इसे मत मारो, एक वृद्ध महिला को पुलिस ने मेरे सामने मारा पुलिस के पास थी तो डर लगता था कि कब मारपीट कर देंगे। गोंदाबाई ने बताया कि खूब मारपीट हुई मेरे घर में 80 हजार रुपए चोरी कर पुलिस ले गई।

 

घनश्याम बघेल ने बताया कि ट्रैक्टर तोड़ दिया, उससे मेरा घर का गुजारा चलता था 80 हजार रुपए ले गए 10 साल सरपंच रहा आज मेरी स्थिति बदतर है। कविता जांगड़े ने बताया कि बलात्कार की घटना हुई है बेइज्जती हुई घर में शादी-ब्याह सब रूक गया घर उजड़ गया बाड़ा गुरू बालकदास का है जो समाज को मिलना चाहिए। भविष्य में जो बाड़ा हमें सौंपेगा हम वोट उसी पार्टी का देंगे। गेंदराम ने बताया कि बाड़ा हमारे पूर्वजों का है उस बाड़ा को डोजर लाकर खोदकर देखें उसके बाद सिद्ध होने पर हमें सौंपे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

जहां देखो वहां लूट ही लूट

नीता ने बताया कि 100 की संख्या में पुलिस पूरे गांव में लूटपाट करती रही। बुजुर्गों को मारा-पीटा घर में हमारे साथ बेइज्जती हुई। लोटा-बर्तन, 2 क्विंटल चावल, 7 बोरा धान, 10 हजार रुपए, 3 फड़ सोना ले गए। बिमलेश ने बताया कि टेबल पंखा, 10 बोरा धान पुलिस लूटकर ले गई। भूखन ने बताया, बोड़सरा बाड़ा सतनामी समाज का है वह गुरूद्वारा हमारा है हम किसके पास फरियाद लेकर जाएं घर में रखा हुआ मेरा 15 हजार व समाज का 25 हजार रुपए एक तोला सोना पुलिस ले गई। समयलाल ने बताया कि तीन अप्रैल की बैठक में कहा गया था कि बाड़ा समाज को देंगे उसके बाद टाल दिया गया हंगामा हुआ मुझे पुलिस पकडक़र ले गई थी बहुत पहले गया प्रसाद बाजपेयी ने बोला था कि 16 लाख मुआवजा पर वह बाड़ा छोड़ देगा बाद में बात दब गई। सोनू ने तल्खी के साथ बताया कि हमारे गुरू बालदास को जातिवाचक गालियां दी गई वह चोर है फलाना है उसे आप लोगों ने अखबार में क्यों नहीं छापा? घनश्याम ने बताया कि कुछ असामाजिक तत्वों ने हुल्लड़ किया पुलिस हमें मारा-पिटा कचहरी में उसकी कोई सुनवाई नहीं। सूरज ने बताया कि घर को तोड़-ताड़ दिया गया एक बोरा अलसी, 4 बोरा धान एक तोला सोना, 32 तोला चांदी, 36 हजार रुपए, 5 एकड़ 50 डिसमिल जमीन का पर्चा ले गए रिपोर्ट करने पर जेल में डाल दिया। दुकला बाई ने बताया कि मेरा बेटा हेमचंद अस्वस्थ था उसका पांव का आपरेशन हुआ था मार के बाद वह बेहोश हो गया था उसी हालत में उसे जेल में डाल दिया गया। घर का सारा सामान लूट कर पुलिस ले गई अब तो बाड़ा हमें दे दो।

जातिवाद को हवा दी गई

गिरिवर ने बताया कि आजादी के 61 वीं वर्षगांठ में हम गुलाम है हमारा समाज निर्धन है सवर्ण लोग बड़े पदों पर है बाड़ा का निरीक्षण कर हमें सौंप देना चाहिए। गांव में पुलिस की उपस्थिति के कारण घूटन लगती है। इंदिरा ने बताया कि सात हजार ले गए नाती बहू का सोना छिनकर ले गए पुलिस छेड़छाड़ कर रही थी चिल्लाएं तो छोड़े वे चावल का बोरी ले गए यहां तक मवेशी खत्म हो गया। सुनिता ने बताया कि पुलिस वाले लड़कियों को खींच कर घर से निकाल रहे थे पुलिस इज्जत लूट रही थी जमीन का पर्चा ले गए 40 हजार रुपए ले गए। पुलिस बाजपेयी की सेवा कर रही थी। झुमुकलाल ने बताया कि पुलिस ट्रेक्टर को तोड़ा साथ ही पांव से रगडक़र घासीदास के फोटो को तोड़ा। जुआं बाई ने बताया कि औरतों को घर में घूस-घूसकर मारा गया गले का हार लूट ले गए यहां तक कि 10 वीं 12 वीं का प्रमाण पत्र फाड़ दिया सवाल यह उठता है कि यदि बाड़ा बाजपेयी का है, तो सतनामियों को पूजा-अर्चना करने अनुमति क्यों दिया जाता था।

किसी को मत बताना कि पत्नी मर गई.

उत्तरा कौशिक ने बताया कि मेरी आंखें पुलिस के अंासू गैस से खराब हो गई है। सरकारी आदमी और समाज के बीच कहासुनी हुई सभी लोगों को बटालियन के लोग मार रहे थे। हमारा व सतनामियों के बीच संबंध अच्छा है। डर तो है, लोगों को बटालियन के लोग मार रहे थे हमारा व सतनामियों के बीच संबंध अच्छा है अफवाह फैलाया जा रहा है कि हिन्दुओं के कारण मारपीट व लूटपाट हुआ। रूपलाल ने बताया कि-‘मैं प्यारी बाई का पति हूं जब हंगामा हुआ मैं घर में बाल्टी ढंककर छूप गया जब पुलिस घर में घुसी मेरी पत्नी बीमार बिस्तर पर लेटी हुई थी पुलिस ने उसके ऊपर लाठी से वार किया। पुलिस के जाने के बाद डर से घर से भाग निकला। जब घर लौटा मेरी पत्नी नहीं थी पता चला सिम्स में ले गए फिर सिम्स गया। वहां पता चता मेकाहारा ले गए डॉक्टरों ने 100 रुपए दिए तब जाकर कहीं मेकाकारा पहुंचा।’ बहुत ऊपर नीचे दौड़-भाग किया दामाद के घर पता लगाया कहीं मेरी पत्नी नहीं थी बाद में बहुत विनती के बाद डॉक्टरों ने बताया कि-‘ तुम्हारी पत्नी का देहांत हो गया है’ लेकिन मृत शरीर का आज तक पता नहीं चला। पुलिस वाले मुझे धमकाते घूम रहे हैं कि किसी को मत बताना कि पत्नी मर गई। सोनी जोशी ने बताया कि बेइज्जती के बारे में कोई क्या बताए महिलाओं के साथ बदसलूकी हुई है मेरे स्वयं के 3 जोड़ी पायल, गले का हार, बर्तन, 6 हजार रुपए ले गए। हम लोग दो-तीन दिन घर से दूर छूपे रहें। पुरषोत्तम बंजारे ने बताया कि बाजपेयी परिवार में मुझसे मार-पीट कर 2 एकड़ जमीन को कब्जा कर लिया है। श्याम लाल ने बताया कि दुकान का सामान, 80 हजार रुपए बटालियन ले गई। उम्मेन ने बताया कि 17 दिन जेल में था जमानत में छूटा हूं बीमार था खाट से उठाकर पुलिस जबरन जेल में डाल दी।


पंचायती राज व्यवस्था का अपमान किया

गोवर्धन ने बताया कि 144 धारा लगी हुई थी पुलिस कौन बे घासीदास! मां बहन की गाली दे रहे थे चमारो! कहकर तिवरा, गेहंू सब जलाकर राख कर दिया। अगरमन जोगी (उपसरपंच) ने बताया कि बालकदास का बाड़ा है तैलासी के घटना के बाद बाजपेयी परिवार हम लोगों को बाड़ा में पूजा करने पर रोक लगा दिया है मुख्यमंत्री के पास गए उन्हें बताया कि आप लोगों ने सैटेलाइट से देखा हंै इसकी उच्चस्तरीय जांच करवाएं। गांव के सहयोग के लिए चावल भेजे तब जाकर 40 किलो चावल गांव पहुंचा। अधिग्रहण के संबंध में पर्यटन विभाग की जानकारी गलत है 50 थाना के पुलिस वालों के सामने हमारी पिटाई की गई। यह हमारा अपमान नहीं पूरी पंचायती राज व्यवस्था का अपमान हुआ है। पिरैया गांव के घासीदास ने बताया कि गलतफहमी में पुलिस वालों ने मारपीट किया सतनामियों के ऊपर यह कोई पहला हमला नहीं है हरदी का जैतखाम को किसने काटा कुरमीबसिया का जैतखाम किसने काटा? पिरैया के जैतखाम को कुल्हाड़ी से किसने काटा? इन सबके पीछे सवर्ण व्यवस्था जिम्मेदार है पुलिस वाले सतनामियों को जय श्रीराम, जय बूढ़ादेव बुलवा-बुलवा कर पिटाई कर रहे थे। महमंद के संतराम ने बताया कि बाजपेयी एक ब्राह्मण भिखारी था जो बालकदास के करूणा के कारण वहां रहने लगा। यह कब्जा तब संभव हुआ जब बालकदास की हत्या कर दी गई थी। बाजपेयी साहूकार बन गया उस समय उन लोगों का ही शासन था आज अगर उनके दस्तावेजों की जांच भी होगी तो कोई मतलब नहीं दस्तावेज उनके हाथों का बनाया हुआ है। इसके अलावा हरिराम, रेवती, अमरबाई, ललिता, अनिता, भूखन, आलोक, धनमत, सोन, धनसय, सूधारानी, सूरज, दुकलाबाई, बिमला, चडग़ू देवा, बनीता, इतवारा, सुनिता, बनसू, जनकबाई, लखन सिंह, हीरा, पुन्नी जोशी सहित सैकड़ों सतनामियों का कहना था कि उनके घर में रखे राशन, बर्तन, रुपए, जेवरात, पर्चा-पट्टा व इज्जत को बटालियन व पुलिस लूट ले गई।

पुलिस वर्दीधारी गुंडा है

सैकड़ों की संख्या में पुलिस ने औरतों के साथ बदसलूकी की जिसमें छेड़छाड़ व बलात्कार शामिल है। कई सतनामियों के घरों के अनाज को जलाया गया। मवेशियों को लूटा व मारा गया। आज भी पुलिस का खौफ कायम है जब हमने बाड़ा के अंदर जाने व जांच-परख करने की कोशिश की तो पुलिस ने हमें रोका। उस वक्त ड्युटी पर तैनात सब इंस्पेक्टर नशे में धुत्त था वह हमारे साथ बात करने की स्थिति में नहीं था उल्टे हमें जिस रास्ते आए उसी रास्ते लौट जाने कहा। इस संबंध में हमने ऐतिहासिक तथ्यों के लिए शोध छात्र अरविंद कुमार जगदेव से संपर्क किया। उन्होंने हमें कई दस्तावेज मुहैया करवाया साथ ही बोड़सरा की घटना की निंदा की तथा दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई की मांग की। उन्होंने प्यारी बाई के लाश के लापता हो जाने की घटना को गंभीर बताया। सर्वसमाज के नेता नरसिंह मंडल ने कहा कि बोड़सरा न्यायसंगत मांग है बाजपेयी परिवार धार्मिक भावना के साथ खिलावाड़ नहीं कर सकती। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से बचने प्यारीबाई के लाश को गायब कर दिया गया। वे अदालत जाने को तैयार हैं। निरूपमा बाजपेयी ने बताया कि साल 2002, माह अगस्त से इस विवाद की शुरूआत हुई है बाड़ा 1911 के भूमि बंदोबस्त व्यवस्था से हमारी है यहां बालकदास का कोई अवशेष नहीं है न्यायालय ने अधिग्रहण करने के लिए शासन के आदेश पर अंतरिम स्थगन लगा दिया है।

 

गुरू घासीदास सेवादार संघ के लखन सुबोध ने बताया कि बोड़सरा के बहाने राजनीतिक ध्रुवीकरण हो रहा है समाज के गुरू कांग्रेस-भाजपा के हाथ के खिलौना बन गए हंै प्रतिनिधि संस्था बनाकर तैलासी, गिरौदपुरी, चटुआ फिर बोड़सरा पर पूरे समाज को अपना हक स्थापित करना होगा जो अब भी निजी संपत्ति बना हुआ है। वे कहते हैं भू-राजस्व व्यवस्थापन कानून से बाड़ा हमारा हो जाएगा गुरूओं की गरिमा खत्म हो रही है। गुरूप्रथा बड़ा ब्राह्मणवाद है उन्होंने बोड़सरा पर न्यायिक जांच की मांग की है वे बोड़सरा को निजी संपत्ति बनाने गुरू जुटे हुए है। पूर्व सांसद केयूर भूषण ने बताया कि कई बाड़ा विपणता के कारण समाज के हाथों से निकल गया हैं बाजपेयी परिवार, शासन, जनता, गुरू व समाज को परस्पर बैठकर हल निकालना चाहिए। परंपरागत संघर्ष नहीं होने से मूलनिवासी संस्कृति, मंदिर, पीठों को नहीं बचा पा रहे हैं उस जमीन से बाजपेयी की पंूजी जुड़ी हैं, आस्था नहीं, इसलिए उनकी पूंजी सरकार मुआवजा के रूप में लौटा दें। 10 मई 2008 को कोरबा जेल में बंद गुरू बालदास ने एक मुलाकात में कहा कि ‘बोड़सरा महल समाज के लिए आस्था का केंद्र है इसे किसी भी हालत में समाज को सौंप देना चाहिए।’ उन्होंने सरकार के अधिग्रहण की कार्रवाई को बकवास कहा। गुरू विजय ने सरकार का पक्ष लेते हुए तल्खी के साथ कहा कि बोड़सरा का मामला कोर्ट में हैं इसलिए मैं कुछ नहीं कहंूगा अगर कुछ लिखोगे तो मैं उसका खंडन करूंगा। गुरू सतखोजन ने बताया कि मैं पूरे छत्तीसगढ़ में घूम-घूमकर बाड़ा के मुक्ति के लिए समाज को एकजुट करने का प्रयास कर रहा हूं लगातार पे्रस कांफ्रेंस कर बोड़सरा के सच्चाई से लोगों को अवगत कराया है।

निष्कर्ष

1. एक लंबे समय से ही सतनामी समाज अपने आस्था से जुड़े इस ऐतिहासिक महत्व के स्थान बोड़सरा बाड़ा को प्राप्त करने पिछले 5 वर्षों से संघर्षरत हंै। कोर्ट ने कब्जाधारी बाजपेयी परिवार के द्वारा दायर याचिका पर जानमाल की सुरक्षा के नाम पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दे रखा है। सरकार अपने प्रयासों में सफल नहीं हुआ है पूरे सतनामी समाज के साथ सर्वसमाज भी बोड़सरा को सतनामियों को सौंपने के पक्ष में है।
2. बाड़ा की जमीन पर मालिकाना हक की वास्तविकता उजागर करना एक श्रमसाध्य व ऐतिहासिक खोज तथा पुरातात्विक सर्वेक्षण की मांग है अब सवाल उठता है कि कोर्ट में पक्षकार बनने एवं लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन की पहलकदमी कौन करेगा? सतनामी समाज को एक प्रबंधन कमेटी का गठन कर पूरे सबूतों के साथ न्यायालय की लड़ाई लडऩी होगी इसके साथ जमीनी आंदोलन भी। समाज को इतिहास व पुरातात्विक विज्ञान से अवगत होना होगा भूमि संबंधी अंग्रेजों के समय के कानूनों से लेकर आज के जटिल व अपर्याप्त रिकार्ड पर ठोस सबूत रखने होंगे।
3. जाहिर सी बात है कि बाड़ा को मुक्त करने का प्रयास कम सनसनी पैदा कर घृणित राजनीति खेली जा रही है चौधराहट की टकराव को खत्म कर सारे नौ सतनामियों के तीर्थस्थानों व धामों पर सतनामी समाज का एकाधिकार सुनिश्चित करें न कि गुरूओं व पंडाओं का पेट भरे। इन सब के लिए सर्वसम्मति से एक सतनामी प्रबंधन कमेटी बने सतनामियों के लिए उनके सांस्कृतिक उन्नयन के लिए इन धामों के मुक्ति के साथ उनके सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व धार्मिक समस्याओं का हल हो।
4. अब तक बोड़सरा में जो कुछ घटित हुआ उसे चिन्हित करने एक न्यायिक जांच कमेटी का गठन होना चाहिए। सतनामियों व गैर सतनामियों के बीच सांप्रदायिक तनाव ईष्र्या, कटुता को दूर करना होगा इस पूरे कुचक्र को रोककर पूरी पारदर्शिता के साथ न्याय करना होगा।
5. बोड़सरा का एक गौरवशाली इतिहास है इस पूरे इतिहास को देखते हुए बोड़सरा पर वास्तव में सतनामी समाज का हक बनता है जो सतनामियों के साथ पूरे पीडि़त समाज का ऐतिहासिक धरोहर हैं लेकिन उसके कब्जा को लेकर जो विवाद उत्पन्न किया गया है उसे हल करने की कोशिश नहीं हो रही हैं बल्कि बोड़सरा के नाम पर सतनामी समाज का राजनैतिक धु्रवीकरण हो रहा है। रिपोर्ट में इतिहास, पुरातात्विक अध्ययन, कानूनी दांवपेज के साथ सभी वर्गों से विचार-विमर्श कर एक निष्पक्ष जांच के परिणाम के बाद समाधान तक पहुंचा गया है।
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