राष्ट्रपति की पुष्कर यात्रा के दौरान ब्रम्हा मन्दिर के बाहर ही पूजा करने के विवाद के सम्बन्ध में पी.यू.सी. एल. की रपट.

राष्ट्रपति की पुष्कर यात्रा के दौरान ब्रम्हा मन्दिर के बाहर ही पूजा करने के विवाद के सम्बन्ध में पी.यू.सी. एल. की रपट.

 

पीयूसीएल की रिपोर्ट 

26.05.2018

राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द विगत 13 व 14 मई, 2018 को दो दिवसीय राजस्थान दौरे पर आए थे। उन्होने। उन्होनें 14 मई को अजमेर यात्रा की तथा इस दौरान तीर्थस्थल पुष्कर में पूजा तथा ख्वाजा मुइनुद्दीन चिष्ती की दरगाह में जियारत की। पुष्कर भ्रमण के दौरान वे विष्व प्रसिद्ध ब्रम्हा मंदिर भी गये किन्तु यह आष्चर्यजनक रहा कि उन्होनें ब्रम्हा मंदिर के भीतर प्रवेष नहीं किया तथा वहाॅ की सीड़ियों पर ही उनसे पूजा अर्चना करवा दिया गया। राष्ट्रपति के साथ उनकी पत्नी व पुत्री भी थे। ब्रम्हा मन्दिर में प्रवेष नहीं करने की घटना को लेकर यह आषंका व्यक्त की गई कि सम्भवतः दलित वर्ग से होने के कारण प्रषासन ने महंतों के दबाव में उन्हें बाहर ही पूजन करवा दिया। इस सम्बन्ध में सोषल मीडिया में तीव्र प्रतिक्रिया भी व्यक्त की गई।

उपरोक्त विषय की गम्भीरता को देखते हुए पी.यू.सी.एल. अजमेर की ओर से डा. अनन्त भटनागर, सिस्टर केरोल गीता , रेणू मेघवंषी व अंजू नयाल के दल ने पुष्कर के स्थानीय नागरिकों यात्रा से जुड़े प्रषासनिक अधिकारियों, महन्त एवं दलित समुदाय के लोगों व पत्रकारों से चर्चा कर सभी का पक्ष जाना और इस आधार पर निम्न निष्कर्ष पर पहॅुचे-

1. राष्ट्रपति का सपरिवार ब्रम्हा मन्दिर के भीतर पूजन का कार्यक्रम पूर्व निर्धारित था। यात्रा के एक दिन पूर्व यह सूचित किया गया कि राष्ट्रपति की पत्नी के पैरो में तकलीफ के कारन संभवतः वे मन्दिर की सीढियां नही चढ़ पाएंगी। इसलिए प्रशासन ने यह तय किया कि इस स्थिति में वे कुछ सीढियाँ ऊपर उन्हें मन्दिर के उस स्थान से पूजा करवा देंगे जहाँ से मन्दिर दिखाई देता है। राष्ट्रपति के मन्दिर में प्रवेश के सम्बन्ध में किसी भी पक्ष की ओर से कोई विरोध नहीं किया गया, न ही कोई ज्ञापन दिया गया और उन्हें रोकने के लिए कोई दबाव डालने की घटना प्रकाश में नही आई।

2. राष्ट्रपति ने 14 मई को पहले पुष्कर सरोवर के घाट पर सरोवर की अर्चना की। वहा सीड़िया उतरकर नीचे बैठाकर पूजन करवाया गया। जिस कारण राष्ट्रपति की पत्नी को उठने में बहुत कष्ट हुआ। उनके पैरों की तकलीफ को देखते हुए ब्रम्हा मन्दिर की सीड़िया चढ़ने में उनके साथ आये स्टाफ की ओर से असर्मथता व्यक्त की गई। उस समय राष्ट्रपति ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ”वहाॅ चलकर देखते हैं, अगर वह समर्थ हुई तो सीड़ियां चढ़ लेगे।“ ब्रम्हा मन्दिर में विकट तथा अनेक सीड़ियां है। उसे देखकर मन्दिर के बाहर ही पूजन कराने का निर्णय लिया गया। यह घटना अत्यन्त सहजता से हुई। तथा इसको किसी ने भी गम्भीरता से नहीं लिया।

3. ब्रम्हा मन्दिर में प्रवेष को लेकर कोई जातिगत भेदभाव कभी भी नहीं किया जाता है। वहाॅ प्रवेष करने वाले से जाति नहीं पूछी जाती है तथा वहाॅ सभी जाति व धर्म को मानने वाले सदा से प्रवेष करते रहे है।

4. पुष्कर एवं ब्रम्हा मन्दिर की महत्ता को देखते हुए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर विभिन्न केन्द्रीय मंत्री, राज्य सरकारों के राज्यपाल व मुख्यमंत्री आदि निरंतर आते रहते हैं। वरिष्ठ प्रषासनिक अधिकारी यहाॅ निरन्तर यात्रा करते रहे हैं तथा उनकी जाति व धर्म को लेकर मन्दिर प्रवेष से रोकने का कोई मामला नहीं आया है।

5. ब्रम्हा मन्दिर में विदेषी पर्यटको के प्रवेष पर भी कोई पाबन्दी नहीं है। उनका धर्म क्या है यह जानने का कभी प्रयास नहीं किया जाता है।

6. एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि पुष्कर के रंगजी मन्दिर में पहले दलित वर्ग को प्रवेष दहीं दिया जाता था। 1987 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की वहाॅ यात्रा प्रस्तावित थी, परन्तु मीडिया में इस सम्बन्ध में खबरें आने के बाद राष्ट्रपति ने सम्भावित टकराव को टालते हुए वहाॅं जाना स्थगित कर दिया था।

किन्तु इसकी बाद में प्रतिक्रिया यह हुई कि रंगजी मन्दिर को अपना निर्णय बदलना पड़ा, अब वहां पर भी सभी को प्रवेष दिया जाता है। वर्तमान में केवल विदेषियों को वहाॅ प्रवेष की मनाही है।

7. ब्रम्हा मन्दिर का नियन्त्रण वहाॅ के माहन्त की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद जिला प्रषासन के हाथ में है। प्रषासन द्वारा नियुक्त पुजारी द्वारा वहाॅ पूजा कराई जाती है। अतः जिला प्रषासन राष्ट्रपति को वहाॅ जाने से रोके, यह कदापि सम्भव नहीं है।

8. सोषल मीडिया के कुछ संदेषों में कहा गया है कि राष्ट्रपति की पत्नी दरगाह की सीड़ियां चढ़ सकती थी तो वह ब्रम्हा मन्दिर की सीड़ियां चढ़ने में असमर्थ कैसे हो गई तथा यह है कि दरगाह में मात्र 4-5 सीड़ियां ही हैं जिनपर चढ़ना आसान है जबकि पुष्कर में लगभग 50 सीधी सीड़ियां है अतः दोनों स्थानों की कोई तुलना नहीं हो सकती है।

9. दल का यह मानना है कि राष्ट्रपति स्वयं अपनी पुत्री के साथ मन्दिर के दर्षन करते तो इस तरह की अटकलों से बचा जा सकता था

राष्ट्रपति को मन्दिर में प्रवेष को रोकने के संदेष से दलित समुदाय को उद्वेलित होना स्वाभाविक है। इस प्रकार का संदेष फैलने से समाज में तनाव फैल सकता है। पी.यू.सी.एल. दल का यह निष्चयात्मक रूप से यह मानना है कि उक्त संदेश आधारहीन तथा तथ्यहीन है तथा इसका प्रसारण रोका जाना रोका जाना चाहिए।

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