🔴 देश के प्रमुख जनवादी कवि मुकुट बिहारी सरोज की कविताएँ और गीत

कला  साहित्य संस्कृति के लिये कविता कोष से आभार सहित .

इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं.

दंत-कथाओं के उद्गम का पानी रखते हैं
पूंजीवादी तन में मन भूदानी रखते हैं
इनके जितने भी घर थे सभी आज दुकान हैं
इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं ।

उद्घाटन में दिन काटें रातें अख़बारों में
ये शुमार होकर मानेंगे अवतारों में
कोई क्या सीमा-रेखा नापे इनके अधिकारों की
ये स्वयं जन्म-पत्रियाँ लिखते हैं सरकारों की
ये तो बड़ी कृपा है जो ये दिखते भर इंसान हैं
इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं ।

उत्सव के घर जन्मे समारोह ने पाले हैं
इनके ग्रह मुँह में चाँदी की चम्मच वाले हैं
तुम होगे साधारण ये तो पैदाइशी प्रधान हैं
इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं ।

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मेरी, कुछ आदत, ख़राब है

कोई दूरी, मुझसे नहीं सही जाती है,
मुँह देखे की मुझसे नहीं कही जाती है
मैं कैसे उनसे, प्रणाम के रिश्ते जोडूँ-
जिनकी नाव पराए घाट बही जाती है ।

मैं तो ख़ूब खुलासा रहने का आदी हूँ
उनकी बात अलग, जिनके मुँह पर नकाब है ।

है मुझको मालूम, हवाएँ ठीक नहीं हैं
क्योंकि दर्द के लिए दवाएँ ठीक नहीं हैं
लगातार आचरण, ग़लत होते जाते हैं-
शायद युग की नयी ऋचाएँ ठीक नहीं हैं।

जिसका आमुख ही क्षेपक की पैदाइश हो
वह क़िताब भी क्या कोई अच्छी क़िताब है ।

वैसे, जो सबके उसूल, मेरे उसूल हैं
लेकिन ऐसे नहीं कि जो बिल्कुल फिजूल हैं
तय है ऐसी हालत में, कुछ घाटे होंगे-
लेकिन ऐसे सब घाटे मुझको क़बूल हैं।

मैं ऐसे लोगों का साथ न दे पाऊँगा
जिनके खाते अलग, अलग जिनका हिसाब है

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जब तक कमर कसी नहीं तभी तक कठिनाई  हैं 

वरना, काम कौनसा है, जो कि‍या न जाए ।

जि‍सने चाहा पी डाले सागर के सागर
जि‍सने चाहा घर बुलवाए चाँद-सि‍तारे
कहने वाले तो कहते हैं बात यहाँ तक
मौत मर गई थी जीवन के डर के मारे ।

जब तक खुले न पलक, तभी तक कजराई है
वरना, तम की क्‍या बि‍सात, जो पि‍या न जाए ।

तुम चाहो सब हो जाए, बैठे ही बैठे
सो तो सम्‍भव नहीं भले कुछ शर्त लगा दो
बि‍ना बहे पाई हो जि‍सने पार आज तक
एक आदमी भी कोई ऐसा बता दो ।

जब तक खुले न पाल, तभी तक गहराई है
वरना, वे मौसम क्‍या, जि‍नमें जि‍या न जाए ।

यह माना तुम एक अकेले, शूल हज़ारों
घटती नज़र नहीं आती मंज़िल की दूरी
ले‍कि‍न पस्‍त करो मत अपने स्‍वस्‍थ हौसले
समय भेजता ही होगा जय की मंज़ूरी ।

जब तक बढ़े न पाँव, तभी तक ऊँचाई है
प्रभुता के घर जन्मे समारोह ने पाले हैं
इनके ग्रह मुँह में चाँदी के चम्मच वाले हैं
उद्घाटन में दिन काटे, रातें अख़बारों में,
ये शुमार होकर ही मानेंगे अवतारों में

***

ऐसे ऐसे लोग रह गए

बने अगर , तो पथ के रोड़ा 
कर के कोई ऐब न छोड़ा 
असली चेहरे दीख न जाएँ
इस कारण, हर दर्पण तोड़ा
 
वे आचार किए अस्वीकृत
जिनके लिए विचार कह गए।

कौन उठाए जोख़िम उतनी
तट से मँझधारों की जितनी
ख़ुद धोख़ा दें पतवारों को
नौबत अब आ पहुँची इतनी
 
पानी पर दुनिया बहती है 
मग़र, हवा के साथ बह गए।

अस्थिर सबके सब पैमाने
तेरी जय-जयकार ज़माने
बन्द कपाट किए बैठे हैं
अब आए कोई समझाने

फूलों को ख़ामोश कर दिया
काँटों की हर बात सह गए।
ऐसे-ऐसे लोग रह गये।

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एक ओर परदों के नाटक एक ओर नंगे .

राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे

अव्वल मंच बनाया ऊँचा जनता नीची है
उस पर वर्ग-वर्ग में अंतर रेखा खींची है
समुचित नहीं प्रकाश-व्यवस्था अजब अँधेरा है
उस पर सूत्रधार को खलनायक ने घेरा है

पात्रों की सज्जा क्या कहिए, जैसे भिखमँगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

नामकरण कुछ और खेल का, खेल रहे दूजा
प्रतिभा करती गई दिखाई लक्ष्मी की पूजा
अकुशल असंबद्ध निर्देशन-दृश्य सभी फीके
स्वयं कथानक कहता है, अब क्या होगा जी के

संवादों के स्वर विकलांगी कामी बेढँगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

मध्यांतर पर मध्यांतर है कोई गीत नहीं

देश काल की सीमाओं को पाया जीत नहीं
रंगमंच के आदर्शों की यह कैसी दुविधा
उद्देश्यों के नाम न हो पाए कोई सुविधा

जन गण मन की जगह अंत में गाया हर गंगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

 

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