यह ज़ाहिल लोग भारतीय संस्कृति से खिलवाड़ कर रहे है. फैज़ अहमद फैज़ की बेटी का अपमान पूरे भारत का अपमान है . दो संस्मरण जब हमारे राजनेताओं ने वह किया जो हमारी तहज़ीब हैं .

यह ज़ाहिल लोग भारतीय संस्कृति से खिलवाड़ कर रहे है. फैज़ अहमद फैज़ की बेटी का अपमान पूरे भारत का अपमान है . दो संस्मरण जब हमारे राजनेताओं ने वह किया जो हमारी तहज़ीब हैं .

यह ज़ाहिल लोग भारतीय संस्कृति से खिलवाड़ कर रहे है. फैज़ अहमद फैज़ की बेटी का अपमान पूरे भारत का अपमान है . दो संस्मरण जब हमारे राजनेताओं ने वह किया जो हमारी तहज़ीब हैं .

14.05.2018

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तमीज़ो, तहज़ीब से ख़ुन और परवरिश का सीधा रिश्ता होता है.

फैज़ अहम फैज़ को कौन नहीं जानता ,उन्ही की बेटी के साथ भारत सरकार के ज़हिल पूर्ण व्यवहार की सारे देश मे आलोचना हो रही है कि कैसे सरकार के ही विभाग ने उन्हें आमंत्रित किया और उनके दिल्ली पहुचने के बाद अपमानजनक स्थिति में वापस जाना पड़ा .

दो वाकये बहुत महत्वपूर्ण है जो भारत की तहज़ीब के उदाहरण हैं ,एक तो जब खुद फैज़ साहब बिना जरूरी कागज़ात के कलकत्ता एयरपोर्ट पर पहुच गये तब तात्कालीन मुख्यमंत्री ने और एक बार पाकिस्तान की जानीमानी मानव अधिकार कार्यकर्ता आसमां ज़हांगीर की दिल्ली में सुरक्षाकर्मियों ने तलाशी ले ली तो कैसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माफी मांगी .
यह दो घटनाओं का जिक्र आज करना बेहद जरूरी भी है.

जब फैज़ साहब बिना वीजा के कलकत्ता पहुच गये 

 सत्तर के दशक में बांग्लादेश बनने के बाद फ़ैज साहब कलकत्ता हवाई अड्डे पर अचानक से आ गए। उनके पास इंडिया का वीज़ा नहीं था। सुरक्षा अधिकारियों ने उनको रोक तो लिया, पर एअरपोर्ट इंचार्ज को ख़बर कर दी। एअरपोर्ट इंचार्ज ने फ़ैज़ साहब का नाम सुनते ही पश्चिम बंगाल सीएम दफ़्तर में फोन मिलाकर आगे की कारवाई का आदेश मांगा। वहाँ से हिदायत मिली, कि बस पांच मिनट तक फ़ैज़ साहब से बातें करते रहो, उनको किसी भी सूरत में नहीं लगना चाहिए कि उनको डिटेन कर लिया गया है।

पांच मिनट बाद वहाँ के मुख्यमंत्री खुद आए, अपना निजी गेस्ट बताकर काग़ज़ी कारवाई पूरी करवाई, और, एअरपोर्ट सुरक्षा अधिकारियों से ये बात कही :

“मिर्ज़ा गालिब के चले जाने के बाद फ़ैज़ साहब हमारे उप महाद्वीप के सबसे बड़े कवि हैं। फ़ैज़ साहब की रचनाओं का सत्तर भाषाओं में अनुवाद हो चुका है, इतना अनुवाद तो मिर्ज़ा गालिब का भी नहीं हुआ। फ़ैज़ साहब विश्व-नागरिक हैं, इनको वीज़े की कोई ज़रूरत नहीं है !!

उन फ़ैज़ साहब की बेटी को इंडिया आने का और बोलने का न्यौता देने के बाद भी अगर तुरंत वापस जाना पड़े, इससे ज़्यादा शर्मींदगी का लेवल तो कल्पना से भी बाहर की बात है।

फ़ैज़ साहब का कहना था, कि इंडिया-पाकिस्तान जो बनाना है, बना लो, पर हमारी तहजीब, हमारी संस्कृति एक है।

‘सुब्हे-आज़ादी’ कविता में फ़ैज़ साहब ने लिखा है,

“ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गजीदा सहर
वो जिसका इंतज़ार था, ये वो सहर तो नहीं।।

(ये टुकड़े टुकड़े का प्रकाश, ये अंधेरी रात की काटी हुई सुबह
हमें जिसका इंतज़ार था, (आपकी ये सुबह) वो सुबह नहीं है !!)

अफ़सोस.।। सद अफ़सोस।

बलराज कटारिया द्वारा प्रस्तुत

 

जब असमां जहांगीर  से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में माफी मांगी .

उर्दू शायर फ़ैज़ (1911-1984) की बेटी मुनीज़ा हाशमी को भारत बुलाकर उन्हें एक प्रोग्राम में हिस्सा नहीं लेने दिया गया.

ये ख़बर तो आप सब पढ़ ही चुके होंगे. प्रोग्राम कराने वाले लोग कह रहे हैं कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. लेकिन ये बड़ी अजीब बात है. प्रोग्राम के आयोजन की ज़िम्मेदारी सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय, आईआईएमसी और एशिया पैसीफ़िक इंस्टिच्यूट फ़ॉर ब्रॉडकास्टिंग डेवेलप्मेंट (एआईबीडी) की थी. प्रोग्राम 10-12 मई को था. वो 9 मई को ही दिल्ली पहुंच गईं. पहले तो उन्हें होटल में रहने से मना कर दिया गया, फिर बोलने से मना कर दिया गया. और तो और जब उन्होंने कहा कि कम से कम एक आम ऑडिएंस की तरह उन्हें प्रोग्राम में शामिल होने की इजाज़त दी जाए तो इसे भी नकार दिया गया. ज़ाहिर है जब तक सरकार की तरफ़ से कोई आदेश नहीं होगा तब तक कोई अधिकारी तो ऐसा कर ही नहीं सकता.

अब आप को सुनाते हैं एक ऐसा क़िस्सा जब एक भारतीय प्रधानमंत्री ने एक पाकिस्तानी नागरिक से माफ़ी मांगी.

ये बात है अगस्त 2006 की. पाकिस्तान की जानी मानी मानवाधिकार कार्यकर्ता आस्मा जहांगीर दिल्ली आई थीं.

उसके कुछ ही दिन पहले जुलाई 2006 में मुंबई में धमाके हुए थे जिसमें लगभग 200 बेगुनाह भारतीय मारे गए थे. पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग के लोग कुछ ज़्यादा ही चौकस थे. ख़ासकर पाकिस्तान से आए लोगों पर ख़ास निगाह रखी जा रही थी.

ऐसे में दिल्ली पुलिस के कुछ लोग दिल्ली के सुंदर नगर स्थित होटल पहुंचे जहां आस्मा जहांगीर ठहरी हुई थीं.

दिल्ली पुलिस के लोगों ने उनके कमरे में घुसकर उनके सामान की तलाशी ली. आस्मा के सुटकेस में शराब की बोतलें देख पुलिस से उनसे पूछा, ‘’आप पीती भी हैं.’’

ख़ैर बात ख़त्म हो गई और वो पाकिस्तान वापस जाने लगीं. बात किसी तरह पूर्व प्रधानमंत्री आइके गुजराल को पता चली.

उन्होंने उस वक्त के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को बताई. डॉक्टर साहब ने फ़ौरन फ़ोन कर आस्मा जहांगीर से माफ़ी मांगी.
वो भी उस वक्त जब वो पाकिस्तान जाने के लिए एयरपोर्ट पर थी.
ट्रिब्यून अख़बार ने तो बाज़ाब्ता इस पर संपादकीय (सॉरी आस्मा) भी लिखा.

आस्मा जहांगीर की मौत के बाद दिल्ली के इंडिया हैबिटाट सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम में गौतम सोनी ने भी इस वाक़्ये का ज़िक्र किया. आस्मा जब भी दिल्ली आतीं ज़्यादातर गौतम सोनी के यहां ही ठहरती थीं.
सब वक़्त-वक़्त की बात है.

(Iqbal Ahmad Via Shahnawaz Malik)

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