ब्राम्हणों ने क्यों सिर्फ अंग्रेजो के खिलाफ ही लड़ाई की, क्यों उन्होंने मुघलों या तुर्कों के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी. : कुछ भ्रांतियों के खिलाफ – तुहिन देब

ब्राम्हणों ने क्यों सिर्फ अंग्रेजो के खिलाफ ही लड़ाई की,  क्यों उन्होंने मुघलों या तुर्कों के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी. :   कुछ भ्रांतियों के खिलाफ – तुहिन देब

ब्राम्हणों ने क्यों सिर्फ अंग्रेजो के खिलाफ ही लड़ाई की, क्यों उन्होंने मुघलों या तुर्कों के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी. : कुछ भ्रांतियों के खिलाफ – तुहिन देब

 

14.05.2018

’’पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर एक पोस्ट चल रहा है कि ब्राम्हणों ने क्यों सिर्फ अंग्रेजो के खिलाफ ही लड़ाई की। क्यों उन्होंने मुघलों या तुर्कों के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी। चूंकि अंग्रेज, ब्राम्हणों के खिलाफ थे और मूल निवासियों/ शोषितों के पक्ष में थे और उन्होंने बहुत कुछ कानून बनाया इसलिए। और इसी बिना पर पोस्ट में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का गुणगान किया गया है।’’ कई दिनों से इस पर कुछ लिखने की ईच्छा थी। पहले भी इस पोस्ट के खिलाफ संक्षिप्त में कुछ लिखा था।

सबसे पहली बात तो यह कि ब्राम्हणवादियों ने कभी भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं चलाया ।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में किसान, मजदूर, आदिवासी, शहरी मध्यम वर्ग, तमाम शोषित वर्ग तथा हिंदू- मुसलमानों ने मिलकर भाग लिया था। 200 वर्षो की गुलामी के दरम्यान असंख्य लोग शहीद हुए थे तथा भारत की जेलें स्वराजी व क्रांतिकारियों से भर गई थीं। हकीकत यह है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारत में सामंती-ब्राम्हणवादी- मनुवादी व्यवस्था से कोई छेड़छाड़ नहीं की। क्योंकि सामंतवाद व ब्राम्हणवाद, ब्रिटीशरों की सहयोगी थी। अंग्रेजों ने हमें ये समझाना चाहा था कि हम- भारतवासी- निहायत ही निम्न श्रेणी के लोग हैं। सभ्यता ,शिक्षा, ज्ञान, बुद्धि किसी भी मामलें में हम, अंग्रेजों के बराबर नहीं हैं। इसलिए हमारे लिए गुलामी ही श्रेयस्कर है.

 

चूंकि भारतवासी असभ्य हैं इसलिए ब्रिटिश उपनिवेशवादियों का परम कर्त्तव्य है कि वे हमें सभ्य बनाएं। पूरी दुनिया में ब्रिटिश, इतालवी, स्पेनी, फ्रांसीसी, डेनिश, जर्मन, डच, अमरीकी उपनिवेशवादियों ने एशिया, अफ्रीकी और दक्षिण अमरीकी में अपने उपनिवेशों में निर्मम अत्याचार के जरिए लूट व शोषण कर बेशुमार धन-संपदा/पूंजी को अपने देश में भेजा और उपनिवेशों को कंगाल बनाया। और ये सब करके उन्होंने गोरे लोगो के परम कर्त्तव्य (White Man’s Burden) का पालन किया। ब्रिटिश औपनिवेशिक गुलामी के 200 वर्षों के दरम्यान अंग्रेज शासकों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम, समाज कल्याण के क्षेत्र में जो कुछ भी सामाजिक सुधार के मदद उठाये वे देश के समाज सुधारकां व नवजागरण आंदोलन के दबाव से ही किया। जैसे कि राजा राममोहन राय/ ब्राम्ह समाज, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फूले, व सावित्री फूले, साहूजी महराज, सर सैय्यद अहमद, बेगम सूफियाकमाल, पेरियार, बाबा साहब आंबेडकर, नारायण गुरू, आयंकाली, दीनबंधु मित्र, फादर जेम्स हिकी, डिरोजिओ, अक्षय कुमार दत्त, सतीश चंद्र मुखोपाध्याय एवं डॉन सोसायटी, आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय, बेगम रोकैय्या शखावत हुसैन, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (ए.आइ.र्टी.यू.सी.) ऑल इंडिया स्टुडेंट फेडरेशन (ए.आई.एस.एफ.) आदि ंआदि।

 

भारत में अपने शासन को टिकाए रखने के लिए उन्होंने (अंग्रेजों) उतना ही किया जितना करने से उनका कुछ नुकसान नहीं होता। लेकिन गुलामी की जंजीरो को जब कभी भी भारत की आम जनता ने तोड़ने का प्रयास किया तो उसके बदले में अंग्रेजों ने बर्बर दमन और जनसंहार का सहारा लिया। जैसे कि जलियां वाला बाग (1919), पेशावर व शोलापुर कम्युन का दमन, अंग्रेजों द्वारा पैदा की गई बंगाल की भीषण भूखमरी (1945-46), 1857 के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सरेआम तोप से उड़वाना, तमाम क्रांतिकारी आंदालनों का दमन और अंडमान निकोबार के कुख्यात सेलुलर जेल (कालापानी) में उन्हें निर्मम यातनाएं देकर ताजिदंगी सड़ाना। अंग्रेजों द्वारा ऐसे कई जुल्मों की दास्तानों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं।

 

चाफेकर बंधु, लाला हरदयाल समेत गदर क्रांतिकारी, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी, विष्णु गणेश पिंगले, शहीदे आजम भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू,राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला, जतीन दास, गेंदालाल दीक्षित, चौधरी रोशन सिंह, कर्तार सिंह, उधम सिंह, मदन लाल धिंगड़ा, प्रीतिलता वाद्देदार, मास्टारदा सुर्यसेन समेत चट्टग्राम विद्रोह के सभी शहीद, विनय, बादल, दिनेश, बाधा जतीन समेत अग्नियुग के ज्ञात और अज्ञात असंख्य क्रांतिकारियों को क्या ’’ब्राम्हण’’ कहेंगे और क्या इससे इनकी महानता व शहादत का अपमान नहीं होगाघ्
कार्ल मार्क्स ने ’’भारत में ब्रिटिश राज और उसका परिणाम’’ किताब में लिखा था कि अंग्रेजी राज मेंं भारत ने प्रगति नहीं की, बल्कि वह पीछे ढकेल दिया गया है।

 

अंग्रेज शासक भारत की भलाई की बात करते थे पर असली उद्देश्य होता था कि कम से कम अभिजात वर्ग (अति अमीर वर्ग), गरीबों के लिए खाने – पीने की कुछ तो व्यवस्था कर दें बस, इतना ही।’’ मार्क्स ने यह भी कहा कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी, भारत को एक उपनिवेश/ इंग्लैंड में उत्पादित वस्तुओं का एक बाजार समझते हैं और यहाँ के उभरते हुए निम्न पूंजीवादी तत्वों, किसानों व दस्तकारों का विनाश करके ही वह यह कर पाये थे। मार्क्स ने यह भी कहा था कि अंग्रेजों ने भारत में उनके शोषण के सामाजिक आधार सामंती/जमींदार/सूदखोर वर्ग और उनकी पृष्ठपोषक अमानवीय- हिंसक जाति व्यवस्था को बिल्कुल भी स्पर्श नहीं किया था। क्योंकि सामंतवाद और सामंती जाति व्यवस्था ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शाषण- शोषण के लिए मुफीद थी। विशेषकर जमींदार/ राजे रजवाड़े तो अंग्रेजों के दलाल थे।

 

इसलिए मार्क्स का कहना था कि अंग्रेजी पूंजीपति वर्ग जो भारत समेत सभी उपनिवेशों को लूट कर कंगाल बना रहा हैं वे मजबूर होकर चाहे जो करे, उससे हिंदुस्तान की आम जनता को न तो आजादी मिलेगी, न उसकी समाजिक हालत में कोई सुधार होगा। क्योंकि यह तो तभी हो सकता है जब न केवल उत्पादक शक्ति का विकास हो, बल्कि उस पर भारतीय मेहनतकश जनता का स्वामित्व भी कायम हो जाये।

मार्क्स और एंगेल्स ने भारत के 1857 के महाविद्रोह को काफी महत्व दिया जबकि अंग्रेजों ने इसे बदनाम करने के लिए ’’सिपाही विद्रोह’’ (Sepoy Mutiny) कहा । 1857 का महा विद्रोह सिर्फ सिपाहियों का नही था बल्कि किसानों मजदूरों आदिवासियों समेत आम वंचित वर्गो की इसमें बड़ी भूमिका थी। मार्क्स ने एंगेल्स को भेजे गए एक पत्र में लिखा था ’’भारत के हिन्दु और मुसलमान मिलकर अंग्रेजों से संघर्ष करेंगे तो यह कार्य स्वागत करने योग्य होगा।’’ और 1857 और उसके बाद 1905 में बंग भंग के खिलाफ, 1921 में असहयोग आंदोलन के पथ पर चलते हुए 1947 तक भारत छोड़ो आंदोलन, नौसेना विद्रोह, आजाद हिंद फौज, तेभागा, तेलंगाना, कय्यूर, पुन्नपा वायलार के महान किसान विद्रोहों तक यह धर्मनिरपेक्ष परम्परा चलती रही। साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष की परम्परा में ही हिंदू- मुसलमान समेत तमाम भारतीय जनता के संघर्ष ने साम्राज्यवाद विरोधी देशभक्ति/ राष्ट्रीय भावना/ चेतना का निर्माण किया जो आर.एस.एस. के फासिस्ट अंधराष्ट्रवादी /फर्जी राष्ट्रवादी चेतना से अलहदा है।

 

ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने भारत में आने के बाद और विशेषकर पलासी के युद्ध (1757) के बाद भारत के ग्राम समाज और गा्रम आधारित समाजिक – आर्थिक व्यवस्था (मार्क्स की भाषा में एशियाई उत्पादन पद्धति) को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई। उन्होंने यूरोप की परम्परागत सांमतवाद से अलग यहाँ बलपूर्वक जमींदारी प्रथा का सूत्रपात किया। 1871 मे लार्ड कॉर्नवालिस ने भू राजस्व व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव करते हुए भूमि उत्पादन संबंधों को स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement Act) में बदल दिया। इससे बंगाल, बिहार उड़ीसा के आदिवासी क्षेत्र, उत्तर भारत, सी.पी. एंड बरार, दक्षिण भारत व पश्चिम भारत में बडे़ पैमाने पर अंग्रेजों के दलाल उच्च वर्णीय व उच्च वर्गीय जमीदारों/ सूदखोरां का शासन कायम हो गया। इन जगहों पर जमींदारी/मालगुजारी/महलवारी व्यवस्था कायम हुई। जिसके खिलाफ लगातार 1857 के पहले से ही अमर शहीद बाबा तिलका मांझी (दुमका झारखंड), सिंधू -कानू -चांद- भैरव का संथाल हूल विद्रोह (झारखंड बंगाल), बिरसा मुंडा का मुंडा उलगुलान विद्रोह (झारख्ांड), चुआड़ विद्रोह व तितुमीर विद्रोह (बंगाल),तांतिया भील का विद्रोह (म.प्र.) वीर नारायण सिंह, (सोनाखान का विद्रोह) व बस्तर विद्रोह (छत्तीसगढ), अल्लूरी सीताराम राजू का विद्रोह (आंध्रप्रदेश), रानी गंईदालो (नागालैंड) समेत पूरे देश मे आदिवासियों, अंत्यजों व वंचित तबकों ने लगातार ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके दलाल सांमती वर्ग के खिलाफ जबरदस्त लड़ाईयाँ लड़ी और सबसे ज्यादा खून बहाया ।

 

इनमें से एक भी विद्रोह ब्राम्हणों का नहीं था। अयोध्या सिंह व सुप्रकाश राय द्वारा अलग-अलग रूप से हिंदी व बांग्ला में लिखित ’’भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास’’ में हम देखते हैं कि अंग्रेजों के खिलाफ तमाम क्रांतिकारी संघर्ष किसानों मजदूरों आदिवासी, दलितों व शहरी मध्यमवर्ग द्वारा छेड़े गए हैं। सबसे ज्यादा अंग्रेजों के खिलाफ शहादत दी है आदिवासियों ने। लेकिन ब्रिटिश इतिहासकार और उनके दलाल भारतीय इतिहासकारों ने आदिवासी विद्रोहों का सही मूल्याकंन नहीं किया व उनकी उपेक्षा की और अपने वर्ग चरित्र के अनुरूप अभिजात्य वर्गो के इंग्लैंड रिटर्न बड़े जमींदार, बड़े बुजुआर्जी /पूंजीवादी वर्ग के लोगों को ही भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का दर्जा दिया। इसी कारण इतिहास में व पाठ्य पुस्तकों में स्वतंत्रता संग्राम के आदिवासी विद्रोहियों/नायक-नायिकाओं का उल्लेख नही के बराबर है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने हमारे देश की जनता के प्रबल साम्राज्यवाद विरोधी विद्रोहों व आंदोलनों के कारण एवं द्वितीय विश्वयुद्ध में बहुत कमजोर हो जाने के कारण मजबूरन 1947 में उनके दलाल, भारत के बड़े जमींदार व बड़े पूंजीपतियों के प्रतिनिधियों के हाथों सत्ता का हस्तांतरण किया। और इस तरह पुराने किस्म के प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद की जगह नयी गुलामी व नवउपनिवेशवाद का सूत्रपात हुआ। जिसमें जनता के सामने शासक के रूप में रहते हैं साम्राज्यवादियों के देशीय दलाल कॉर्पोरेट व भूस्वामी वर्ग -लेकिन परदे के पीछे ब्रिटिश, अमरीकी, जापानी कई साम्राज्यी ताकतें देश को नियंत्रित करती हैं।
असल में साथियों, साम्राज्यवाद जिस तरह तीसरी दुनिया के गरीब देशों में साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारी आंदोलन को भटकाने और भरमाने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से उत्तर उपनिवेशवाद, उत्तर आधुनिकतावाद, उत्तर मार्क्सवाद ,एन.जो.ओ वाद आदि विचारधाराओं को गढ़कर मेहनतकशों के सामूहिक वर्ग संघर्ष के बदले टुकड़ों टुकड़ों में अलग अलग समुदाय के हितों के लिए आवाज उठाने को या समाधान ढूंढने की बात कहता है। उसी प्रकार यह पहचान की राजनीति की वकालत करता है। यह ’’पहचान की राजनीति’’ (Identity Politics) एक जहरीली, संकीर्ण और खतरनाक विचारधारा है जो आम जनता को एकजुट करने की जगह उनको उनकी जाति/ समुदाय की पहचान के आधार पर बांटती है।

पहचान की राजनीति , कार्पोरेट राज व साम्प्रदायिक फासिस्ट मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, देशभक्त, जनवादी ताकत व तमाम मेहनतकशों की चट्टानी एकता की विरोधी है। और इससे अमरीकी साम्राज्यवाद के नेतृत्व वाले साम्राज्यवादी और उनके देशीय दलाल कॉर्पोरेट / सांप्रदायिक फासिस्ट शासक वर्ग के लिए बल्ले -बल्ले (Feel Good) की स्थिति बन जाती है। क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्यवादी इसी तरह ’फूट डालो राज करो’ की नीति के जरिए देश को 200 वर्षों तक गुलाम बनाए रखे और अभी भी साम्राज्यवादी व उनके देशीय दलाल धार्मिक/ साम्प्रदायिक, जातिगत, नस्ली व समुदायगत रूप से लोगों को बांट कर भारत के इतिहास और संस्कृति को साम्प्रदायिक व विकृत बनाकर अपना शासन-शोषण चला रहे हैं। और ऐसा ही वे हमेशा के लिए चाहते हैं। क्या हम अनजाने में शासक वर्ग के षड़यंत्र का शिकार तो नही बन रहे हैं।

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संपर्क- तुहिन देब
फोन -095899-57708
ईमेल – tuhin_dev@yahoo.com

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