एक दिवसीय परिचर्चा, दिनांक 26 जून 2015,वनाधिकार मान्यता कानून 2006 – दशा और दिशा

एक दिवसीय परिचर्चा, दिनांक 26 जून 2015,वनाधिकार मान्यता कानून 2006 – दशा और दिशा

वनाधिकार मान्यता कानून 2006 – दशा और  दिशा
एक दिवसीय परिचर्चा, दिनांक 26 जून 2015, समय सुबह 10 बजे से, वृन्दावन हाल, रायपुर     

साथियों जोहर !

जेसा आप जानते हे की  वनाधिकार मान्यता कानून 2006 बनाये जाने के पीछे मुख्य मकसद था की इस देश के आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासियों  को उनके जंगल -जमीन पर अधिकारों को मान्यता देते हुए  वन व्यस्था का जनतंत्रीकरण किया जाये l परन्तु कानून को  लागु हुए लगभग 7 साल हो चुके हे, लेकिन आज तक इसका प्रभावी ढंग से  क्रियान्वयन नहीं हो पाया l छत्तीसगढ़ राज्य में  लाखो परिवार जिनकी आजीविका और अस्तित्व वनों से जुड़ा हुआ हे उनके वनाधिकारो की मान्यता की प्रक्रिया आज तक लंबित हे l  प्रदेश में मार्च 2015   तक 8 लाख 17 हजार 809   दावे प्रस्तुत किये गए हे जिनमे से मात्र 3 लाख 36  हजार 590 अधिकार पत्रक ही दिए गए हे जो कुल प्राप्त दावो का मात्र 41  प्रतिशत ही हे l इसी प्रकार सामुदायिक अधिकारों की प्रक्रिया को पूर्णता नजरंदाज कर दिया गया हे l प्रदेश में कई ग्रामसभाओ के दुवारा पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए सामुदायिक दावे जमा किये गए हे लेकिन उनका भी निराकरण नहीं किया जा रहा हे l राज्य सरकार दुवारा पूरी क्रियान्वयन की प्रक्रिया को एक तरीके से अघोषित रूप से बंद कर दिया गया हे l राज्य सरकार के दुवारा लगातार ये दावा किया जा रहा हे की छत्तीसगढ़ में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की स्थिति बाकि राज्यों से सबसे ज्यादा बेहतर हे जबकि हकीकत में स्थिति बहुत ही निराशाजनक हे जेसे –
  • प्रदेश पी टी जी समूह के आवास के अधिकारों को लेखबद्ध और मान्यता नहीं दी गई l 
  • संरक्षित क्षेत्रों (सेंचुरी, नेशनल पार्क ) में वनाधिकारो को लगभग ही अमान्य कर दिया गया हे l 
  • 425 वन ग्रामों को कानून के आधार पर  राजस्व ग्रामो में बदला नहीं गया l 
  • वनाधिकारो की मान्यता की प्रक्रिया पूर्ण किये बिना, ग्रामसभा की लिखित सहमती के बिना ही अवैध तरीके से  वन भूमि को कंपनियों को दिया  जा रहा हे l 
  • अभी भी धारा  3 (2) के तहत विकास कार्यो के लिए वन भूमि के व्यपवर्तन के प्रस्तावों को धारा 3 (1) के तहत सामुदायिक अधिकारों के रूप में दर्ज किया जा रहा हे l   
  • जिन लोगो को व्यक्तिगत अधिकार दिए गए हे वह उनकी काबिज वन भूमि से बहुत ही कम हे साथ ही गेर आदिवासी के अधिकारों को दिया ही नही जा रहा हे l
केन्द्रीय आदिम जनजाति कार्य मंत्रालय के दुवारा कई बार पत्र और सर्कुलर के माध्यम से राज्य में वनाधिकार कानून के क्रियावयन की निराशाजनक स्थिति पर चिंता जताते हुए प्रभावी क्रियान्वयन के लिए निर्देशित  किया हे, परन्तु राज्य सरकार दुवारा इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाये गए हे l  दिनांक 17 जून को केन्द्रीय आदिम जनजाति कार्य मंत्रालय के दुवारा राज्यों को  दिशा निर्देश जारी करते हुए ये कहा गया की वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के लिए विशेष अभियान चलाये जाये, लेकिन अभियान चलाने के लिए दी  गई राज्यों की सूची में छत्तीसगढ़ का नाम नहीं हे, जबकि छत्तीसगढ़ में किसी भी प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्र का ओसतन हिस्सा ज्यादा हे, तथा प्रदेश में कुल जनसँख्या के आधार पर आदिवासियों की संख्या ज्यादा हे l ऐसे में छत्तीसगढ़ का नाम न होना शंका पैदा करता हे l अतः उपरोक्त सभी विषयों पर व्यापक विचार विमर्श कर आगे की रणनीति बनाने के लिए एक दिवसीय परिचर्चा आयोजित की गई हे जिसमे आप सादर आमंत्रित हे l 
छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन 
आलोक शुक्ला 

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