विनय दुबे की कविताएं – दस्तक के लिए प्रस्तुति अमिताभ मिश्र

दोस्तों आज विनय दुबे की कविताएं प्रस्तुत कर रहा हूँ. विनय दुबे प्रतिरोध के सशक्त कवि थे. उनका एक बिलकुल अलग अंदाज था. कविता के इस तेवर को देखिये और इन कविताओं पर बात कीजिए.

दस्तक के लिए प्रस्तुति अमिताभ मिश्र

दिल्ली होने से तो अच्छा है

मैं पहाड़ देखता हूँ
तो पहाड़ हो जाता हूँ

पेड़ देखता हूँ
तो पेड़ हो जाता हूँ

नदी देखता हूँ
तो नदी हो जाता हूँ

आकाश देखता हूँ
तो आकाश हो जाता हूँ

दिल्ली की तरफ़ तो मैं
भूलकर भी नहीं देखता हूँ
दिल्ली होने से तो अच्छा है
अपनी रूखी-सूखी खाकर
यहीं भोपाल में पड़ा रहू

 


२.
मेरा गाँव भी सीख जाएगा

मेरे गाँव में भी अब
पहुँचने लगे हैं अफ़सर
और रहने लगे हैं

मेरा गाँव भी अब सीख जाएगा
किसी से बोलना
न बोलना किसी से
किसी को देखकर न देखना
देखने के लिए बुलाना

मेरा गाँव भी अब सीख जाएगा
चिट भेजना, खिलाना-पिलाना
रिरियाना, घिघियाना
बोलना अर्ज़ी की भाषा में

मेरे गाँव में भी अब
रहने लगे हैं अफ़सर
मेरा गाँव भी अब सीख जाएगा


३.
मैं तो कविता लिखता हूं

मैं जब कविता लिखता हूं
तो भूख को भूख लिखता हूं
विचार या विचारधारा नहीं लिखता
मैं जब कविता लिखता हूं
और कविता में तितली लिखता हूं
तो तितली को तितली लिखता हूं
विचार या विचारधारा नहीं लिखता
मैं जब कविता लिखता हूं
और कविता में स्त्री लिखता हूं
तो स्त्री को स्त्री लिखता हूं
विचार या विचारधारा नहीं लिखता
विचार या विचारधारा के बारे में
महासचिव प्रगतिशील लेखक संघ और
महासचिव जनवादी लेखक संघ से बातें करें
मैं तो कविता लिखता हूं ।

 


४.
फिर वहीदा रहमान ने कहा

फिर वहीदा रहमान ने कहा
बादल आयें
बादल आए

फिर वहीदा रहमान ने कहा
पानी बरसे
पानी बरसा

फिर वहीदा रहमान ने कहा
सब मरें
सब मरे

फिर वहीदा रहमान ने कहा
अब सो जाओ
हम सो गए
इस हादसे को
बरसों हो गए

अब न वहीदा रहमान है न हम हैं
अब वहीदा रहमान कुछ नहीं कहती है
अब दुनिया में कहीं कुछ नहीं होता है।

५.
शायद

देखो कहीं भी देखो
कहीं भी देख सकते हो तुम
कोई पाबंदी नहीं है

पतंग देखो
या पड़ौस की लड़की
वृक्ष देखो
या सड़क पर दौड़ते वाहन
खुद को देखो
या मटर की फलियां
कोई पाबन्दी नहीं है

लेकिन अपनी राय मत दो
देखने और राय देने में फर्क है

गोभी को गोभी
क़त्ल को क़त्ल
और मत कहो अन्याय को अन्याय
या कविता को कविता

और अगर नहीं रह सकते हो
कहे बगैर
तो भटे को शायद भटा
पतंग को शायद पतंग
कीड़े को शायद कीड़ा
सच को शायद सच
और कविता को शायद कविता कहो

ऐसा करने से
शायद बच सकते हो तुम

लेकिन इतना समझ लो
कि बचने
और शायद बचने में फर्क है

तुम शायद
नहीं भी बच सकते हो।

दस्तक के लिए प्रस्तुति अमिताभ मिश्र

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