छतीसगढ में पत्रकारों पर हो रहे हमलों के संदर्भ में .: लेकिन क्या आप सबको यह नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के साथ जो कुछ घट रहा है वह बेहद भयावह है। छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता खतरे में हैं। यदि आप में से किसी को ऐसा नहीं लगता तो फिर मुझे कुछ नहीं कहना है. : राजकुमार सोनी

2.05.2018

रायपुर 

मुझे इस ग्रुप से सूचना मिली थी कि 2 मई को पत्रकार कमल शुक्ला के मामले में एक आपात बैठक रखी गई है। प्रेस क्लब अध्यक्ष केके शर्मा द्वारा तय किए गए समय पर जब मैं प्रेस क्लब पहुंचा तो आठ-दस नौजवान साथी ही वहां मौजूद थे। ये सभी साथी इस बात पर चर्चा करना चाहते थे कि कमल शुक्ला के साथ जो कुछ हुआ है वह जायज है या नहीं?

बेहद कम लोगों की उपस्थिति के चलते कोई बैठक नहीं हो पाई।

इस बीच एक सूचना यह भी मिली कि पत्रकार व्यास मुनि पर खनिज माफियाओं ने हमला कर दिया है।
अभी चंद रोज पहले ही बलरामपुर के पत्रकारों के साथ जो कुछ हुआ वह जग जाहिर है। वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैय्यर एक दिन पहले ही प्रेस क्लब में यह बता चुके हैं कि कैसे एक भू- माफिया ने उनके घर को पत्थरगड़ी में बदल दिया है। रायगढ़ के दो पत्रकार नितिन सिन्हा और सौरभ पर भी जुर्म दर्ज कर लिया गया है।

पत्रकार कमल शुक्ला और प्रदेश के पत्रकारों पर बढ़ते हुए हमलों को लेकर कल शायद रायगढ़ में भी पत्रकार अपना प्रतिरोध दर्ज करने जा रहे हैं। जहां तक मेरी जानकारी में हैं तो आज देश के वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश जी भी शहर में हैं और शायद जिस संगोष्ठी में वे हिस्सेदारी दर्ज करेंगे वहां भी पत्रकारिता पर मड़राते खतरों को लेकर ही बात होनी है।

लेकिन हम राजधानी में खामोश है। हम वाट्स अप पर गुड मार्निंग और गुड नाइट करने में लगे हुए हैं। जन्मदिन और शादी की सालगिरह पर मुबारकबाद देना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन हमारा प्रतिरोध इस बात को लेकर भी है कि प्रेस क्लब की दूरभाष निर्देशिका में नंबर गलत कैसे चला गया?

कई बार तो मैं सोचता हूं कि हम लोग पत्रकार है भी नहीं? या केवल संचालित हो रहे हैं।

नाम मत पूछिएगा
लेकिन कल मेरे पास पत्रकारिता जगत के कई मूर्धन्य लोगों का फोन आया। उनमें से एक भी प्रेस क्लब की बैठक में भाग लेने नहीं आया लेकिन सब मुझसे यह जानना चाहते थे कि प्रेस क्लब की आपात बैठक में क्या हुआ?

इस बैठक के न हो पाने से देश के अन्य पत्रकार साथियों/ संगठनों के बीच जो संदेश गया उसे अच्छा नहीं समझा जा सकता।

मैं यह सब कुछ किसी भी साथी को कोसने के लिए नहीं लिख रहा हूं…. लेकिन क्या आप सबको यह नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के साथ जो कुछ घट रहा है वह बेहद भयावह है। छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता खतरे में हैं। यदि आप में से किसी को ऐसा नहीं लगता तो फिर मुझे कुछ नहीं कहना है।

दो छोटी किन्तु महत्वपूर्ण कविताएं याद आ रही है। एक केदारनाथ सिंह की हैं और दूसरी निकोलर की।

1-
कई बार मौसम की नमी से
मर जाते हैं शब्द।
ठंड से नहीं मरते शब्द
वे मर जाते हैं
साहस की कमी से।

2-
पहले वे आए कम्युनिस्टों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था।

फिर वे आए
ट्रेड यूनियन वालों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था।
फिर वे आए यहूदियों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था।

फिर वे मेरे लिए आए
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता।

( यह पोस्ट वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सोनी ने रायपुर प्रेस क्लब के ग्रुप में लिखी है। साभार….)

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