मजदूर दिवस पर शरद कोकास की तीन कविताएँ : हमारे हाथ अभी बाकी हैं

 

1.

कल रात मेरी गली में एक कुत्ता रोया था
और उस वक़्त आशंकाओं से त्रस्त कोई नहीं सोया था
डर के कारण सबके चेहरे पीत थे
किसी अज्ञात आशंका से सब भयभीत थे
सब अपने अपने हाथों में लेकर खड़े थे अन्धविश्वास के पत्थर
कुत्ते को मारने के लिये तत्पर
किसीने नहीं सोचा
कुत्ता क्यों रोता है
उसे भी भूख लगती है
उसे भी दर्द होता है

हम भी शायद कुत्ते हो गए हैं
इसलिए खड़े हैं उनके दरवाज़ों पर
जो नहीं समझ सकते
हमारे रूदन के पीछे छिपा दर्द

उनके हाथों में हैं वे पत्थर
जो कल हमने तोड़े थे चट्टानों से
बांध बनवाने के लिए
या अपने गाँव तक जाने वाली
सड़क पर बिछाने के लिए

उनका उपयोग करना चाहते हैं वे
कुचलने के लिये हमारी ज़ुबान
चूर करने के लिए
हमारे स्वप्न और अरमान
वे जानते हैं
हमें जो कहनी है
वह बात अभी बाकी है

ज़ुबानें कुचले जाने से नहीं डरेंगे हम
हमारे मुँह में दाँत अभी बाकी हैं

*लेकिन हम आदमी हैं कुत्ते नहीं*
*आओ उठे दौड़ें*
*और छीन लें उनके हाथों से वे पत्थर*
*हमारे हाथ अभी बाकी हैं*
*हमारे हाथ अभी बाकी हैं ।

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*बची हुई खाल*

कल उन्होंने दी थी हमें कुल्हाड़ी
जो उन्होंने छीनी थी हमारे बाप से
जिसे हम अपने पैरों पर मार सकें
और रोटी की तलाश में
टेक दें अपने घुटने
उनकी देहरी पर
रोटी के टुकड़े को फेंकने की तरह
उन्होंने उछाला था आदर्श वाद
रोटी का एक टुकड़ा भी मिले तो
आधा खा कर संतोष करो
और बढ़ते रहो

आज उन्होंने
बिछा लिए हैं कंटीले तार
अपनी देहरी पर
ताकि ज़ख्मी हो सकें
हमारे घुटने

हमारे जैसे
याचकों के लिए
खुला है अवश्य
सामने का द्वार
पिछला रास्ता तो
संसद भवन को जाता है

कंटीली बाड़ के भीतर
वे मुस्काते हैं
हम कभी हाथ जोड़ते हैं
कभी हम हाथ फैलाते हैं

लेकिन एक दिन आयेगा
जब हमारी दसों उंगलियाँ
आपस में नहीं जुड़ेंगी
वे उस ओर मुड़ेंगी
जहाँ होगी एक मोटी सी गरदन
बाहर निकल आयेगी वह जीभ
जो बात बात पर
आश्वासन लुटाती है

तोड़ देंगे हम
अपने ज़ख्मी पैरों से
वह कँटीली बाड़
और घुस जाएंगे
उन हवेलियों में
जहाँ सजी होगी
चांदी के मर्तबानों में
हमारे खून पसीने से
पैदा की हुई रोटियाँ
छीन लेंगे हम उन्हें और
बाँट लेंगे
अपने सभी भाईयों के साथ

हम बता देंगे
माँस और हड्डियाँ
नुच जाने के बाद भी
बची हुई खाल
अपने बीच से
हमेशा के लिए
विदा कर सकती है
कसाईयों को ।

 

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*सोने से दमकते हुए हमारे चेहरे*

आग आग है आग कब तक रुकेगी
आग पेट से उठती है
पहुँचती है दिमागों तक
भूख कोसती है परिस्थितियों को
रह जाती है
खाली पेट ऐंठन
आक्रोश सिमटता है मुठ्ठियों में
मुठ्ठियों को
हवा में उछालने की ताकत
मुहैया होती है रोटी से
रोटी तो तुमने छीन ली है
और खिला दी है
अपने पालतू कुत्तों को

आग आग है
फिर भी बढ़ती है
चिंगारियाँ आँखों से निकलती हुई
ताकत रखती है
तुम्हें भस्म कर देने की
तुमने चढ़ा लिया है मुलम्मा
अपने जिस्म पर
आग उठती है
होठों से बरसती है
लेकिन तुमने पहन लिए हैं कवच
जिन पर असर नहीं होता
शब्द रूपी बाणों का

आग अब पहुंचती है
हमारे हाथों तक
अब हमारे हाथों में
सिर्फ आग होगी
और उसमें होंगे
सोने से दमकते हमारे चेहरे
तुम्हारी नियति …?

 

*- शरद कोकास*

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