वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ल पर राष्ट्रद्रोह के फर्जी मुकदमे एवं “पत्थलगडी” के नाम पर दो वरिष्ठ आदिवासी बुद्धिजीवियों की गिरफ़्तारी की छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन तीव्र निंदा करती है.: पीयूसीएल छतीसगढ

लोकस्वतंत्रय संघठन छतीसगढ ,{ पीयूसीएल संगठन छतीसगढ }

1मई 2018

रायपुर .

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वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ल पर राष्ट्रद्रोह के फर्जी मुकदमे एवं “पत्थलगडी” के नाम पर दो वरिष्ठ आदिवासी बुद्धिजीवियों की गिरफ़्तारी की छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन तीव्र निंदा करती है.


देश और प्रदेश में लोकतान्त्रिक असहमति प्रकट करने के बुनियादी अधिकार पर बढ़ रहे क्रूर दमन पर छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन गंभीर चिंता व्यक्त करता है.

इसका ताज़ा उदाहरण है वरिष्ठ पत्रकार श्री कमल शुक्ल पर, राजस्थान में की गयी किसी शिकायत के आधार पर, धारा 124क भा.द.वि., अर्थात राष्ट्रद्रोह, के अंतर्गत दर्ज की गयी प्राथमिकी (FIR) है. अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार इसमें श्री शुक्ल द्वारा एक कार्टून को फॉरवर्ड करने को अपराध बताया गया है जिसमे जस्टिस लोया की हत्या में राजनैतिक सत्ता और न्यायपालिका की भूमिका पर प्रश्न उठाया गया है. “केदारनाथ सिंह” से लेकर “असीम त्रिवेदी” तक के मुकद्दमों में बार बार दोहराया गया है कि राजनैतिक आलोचना, वोह चाहे कितनी ही तीखी क्यों न हो, बिना हिंसक गतिविधियों के साथ सम्बन्ध के, राष्ट्रद्रोह नहीं कहला सकता है. कमल शुक्ल लगातार बस्तर से अपनी निडर और तथ्यपरक ज़मीनी रिपोर्टों के कारण छत्तीसगढ़ सरकार की आँख की किरकिरी बने रहे हैं. “पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त संघर्ष समिति” के एक महत्वपूर्ण नेता के रूप में, उन्होंने छत्तीसगढ़ के पत्रकारों की सुरक्षा के अभियान में, और उनके लिए एक कानून का मसौदा बनाने की प्रक्रिया में भी अहम् भूमिका निभाई है. छत्तीसगढ़ पी.यू.सी.एल. को इसमें कोई संदेह नहीं है कि वर्तमान प्रकरण श्री शुक्ल को मात्र प्रताड़ित करने के लिए दर्ज किया गया है. विशेष रूप में ऐसी स्थिति में जब महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्रों में, तथा बीजापुर और सुकमा में, कई संदेहास्पद मुठभेड़ों में आदिवासियों और माओवादी कार्यकर्ताओं की मौतों की घटना हुई है. पत्रकारों के बीच में भी यह कारवाही एक “चिल्लिंग इफ़ेक्ट” – एक भय का वातावरण पैदा करने की कोशिश है, ताकि वे ज़मीनी सच्चाइयों की रिपोर्टिंग न करें. छत्तीसगढ़ पी.यू.सी.एल. इसकी तीव्र निंदा करती हैं और मांग करती है कि इस मुकद्दमे को तुरंत वापस लिया जाये.

दूसरी ओर, प्रदेश के जशपुर जिले में पूर्व आई.ए.एस. अधिकारी एच्.पी. किंडो और ओ.एन.जी.सी से सेवानिवृत अधिकारी जोसफ तिग्गा  समेत आदिवासी बुद्धिजीवियों और ग्रामीण कार्यकर्ताओं की धारा 149, 153सी, 505 (1)(सी), 120बी में गिरफ्तारी की भी छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन कड़ी निंदा करता है. जब जशपुर के ग्राम बच्छरांव में ग्रामीणों ने पांचवी अनुसूची एवं संविधान के अंतर्गत अपनी पारंपरिक एवं संवैधानिक अधिकारों की, तथा अपने जल-जंगल-ज़मीन को बचाने की घोषणा की, तो उनपर प्रबल जूदेव के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं ने सांप्रदायिक माहौल पैदा कर हमला किया, उनकी पिटाई की. अंततः इन्ही के समर्थन में राज्य पुलिस ने एक छद्म मुकद्दमा दर्ज किया है, ऐसी कारवाही वास्तव में अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार की श्रेणी में आता है और कानून का सरासर दुरूपयोग है. छत्तीसगढ़ पी.यू.सी.एल., “सर्व आदिवासी समाज” और “छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन” जैसे प्रदेश के अन्य लोकतान्त्रिक संगठनों के साथ, इस कारवाही की कड़ी निंदा करता है और इस द्वेष भावना से प्रेरित फर्जी मुकद्दमे को तुरंत वापस लिए जाने की मांग करता है.

आज की इस परिस्थिति में, जब उत्तर प्रदेश में भाजपा नीत सरकार अपने कार्यकर्ताओं पर सांप्रदायिक दंगों सम्बन्धी सैंकड़ों प्रकरण वापस लेती है, और दूसरी ओर देश भर में 2 अप्रैल बंध में शामिल दलित संगठनों के कार्यकर्ताओं पर सैंकड़ों की तादाद में फर्जी प्रकरण थोपे जाते हैं, वहां स्पष्ट है कि उपरोक्त दो घटनाये भी छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा प्रदेश में लोकतान्त्रिक अभिव्यक्ति को चुनावी वर्ष से पूर्व कुचलने का प्रयास है. हम छत्तीसगढ़ के समस्त नागरिकों से अपील करते हैं कि अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहते हुए उनकी मुस्तैदी से रक्षा करें.

डॉ लाखन सिंह             एड. सुधा भारद्वाज
अध्यक्ष।                         महासचिव

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