स्वच्छ भारत अभियान शौचालयों का कॉरपोरेटीकरण है- बेजवाड़ा विल्सन

30.04.2018

सीमा आज़ाद

अखबारों में आज खबर है कि कल मोदी ने “मन की बात” बताते हुये कहा कि भारत सरकार स्वच्छ भारत अभियान में देश के नौजवानों को “इंटर्नशिप करायेगी।

कल ही खबर थी कि भाजपा नेता और गोवा की राज्यपाल किरन बेदी ने जनता को धमकाया था कि जो खुले में शौच जायेगा, सरकार उसे राशन उपलब्ध नहीं करायेंगी।

राजस्थान सरकार ने तो पिछले साल से ही प्राथमिक स्कूल के अध्यापकों को यह काम सौंप दिया था कि वे तड़के घर से बाहर निकलें और खुले में शौच कर रहे लोगों की तस्वीरे अपने मोबाइल कैमरे से खींचे।

उ प्र में भी कई जगह खुले में शौच करने वाले की तुलना जानवरों से करने वाली होर्डिंग लगी हुई हैं।

आखिर ये मामला क्या है? सरकार अचानक काहे लोगों को सभ्य बनाने पर तुल गयी है, वो भी इतने असभ्य तरीके अपनाकर?

इसका जवाब बेजवाड़ा विल्सन ने 28 अप्रैल को इलाहाबाद में हुए पीयूसीएल के 39वें  जेपी मेमोरियल व्याख्यान में दिया। उन्होनें कहा कि “स्वच्छ भारत अभियान दरअसल शौचालयों का कॉरपोरेटीकरण है। कॉरपोरेट घराने बड़े पैमाने पर इसमें पैसा निवेश कर रहे हैं, जिसे वसूलने के लिए शौचालयों का शुल्क २ रूपये से बढ़ाकर पांच रूपये कर दिया गया है।”

उन्होनें कहा कि यदि किसी गरीब के घर में पांच लोग हैं तो उसे सुबह के समय २५ रूपये टॉयलेट पर खर्चने होंगे, भले ही उसके पास खाने के लिए पैसे न हों। इस तरह यह अभियान गरीबों की जेब से अंतिम बचा पैसा भी कॉरपोरेटों तक पहुंचाने के लिए है।

उन्होनें कहा “इसके साथ ही यह एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदायों का मैला साफ करने की पुरानी प्रथा को भी बनाये रखने का काम करेगा, क्योंकि कॉरपोरेट्स टॉयलेट तो बना देंगे, लेकिन सीवेज सिस्टम नहीं।”

साम्राज्यवादी पूंजी मंदी के इस दौर में अपनी पूंजी के निवेश के रास्ते खोज रही है, ताकि उसका मुनाफा ठहराव का शिकार न होने पाये। ऐसे में भारत जैसे गरीब और पिछड़े देश उनके मुनाफे का साधन बन रहे हैं। अब वे टॉयलेट में पैसा लगाकर, इंसान की इस बेहद मूलभूत आवश्यकता से भी अपना पैसा बना रहे हैं। सरकार इन्हीं की दलाली करने के लिए खुले में शौच को प्रतिबन्धित तक कर सकती है।

खुले में शौच को तो सरकार बेहद असभ्य कृत्य बता रही है, जो कि गरीबों की मजबूरी है, लेकिन आज का अखबार देखिये। उप्र के उप मुख्यमंत्री खुले में अाधा नंगा होकर नहा रहे हैं और इसे अखबारों ने “जमीन का आदमी” कह कर “वाह वाह” किया है।

क्या यह असभ्यता नहीं है, यह सामंती पितृसत्तात्मक मानसिकता है, जिसमें पुरूषों का खुले में आधा नंगा होकर नहाना असभ्यता माना ही नही जाता। क्या कोई महिला मंत्री “जमीन का होने” के नाम पर यह काम कर सकती थी? कर भी लेती तो क्या मीडिया वाले उसकी वाहवाही करते? ना जी, ये तो असभ्यता में आ ही जाता।

वो स्नानागार होते हुए भी खुले में नहायें तो ” जमीन का आदमी”, गरीब मजबूरी में खुले में शौच जाये या नहाये तो “गंवार, असभ्य”।

हो सकता है सरकार को किसी रोज अचानक लगे कि खुले में नहाना असभ्यता है। यह उस दिन होगा, जिस दिन कोई कॉरपोरेट स्नानागार बनाने में धन निवेश करना शुरू करेगी।

दुसरा तथ्य यह भी है कि मैं आजमगढ़ के एक ऐसे परिवार को जानती हूं, जो कई सालों से घर में शौचालय बनाने की सोच रहा है, पर पैसा नही है। किसी तरह थोड़ा पैसा इकट्ठा होता है तो बच्चे की पढ़ाई पर खर्च हो जाता है। ग्रामप्रधान से शौचालय बनाने की सरकारी राशि के लिए सालों पहले आवेदन किया हुआ है, जो कभी नहीं मिला। खुले में शौच उनके लिए कष्टदायक मजबूरी है।

शौचालयों के लिए सरकार कुछ नहीं करेगी, कॉरपोरेट उसे बनवायेंगे, और शुल्क लगाकर कमायी करेंगे, सरकार लोगों को उनमें जाने के लिए धमकायेगी, फिल्म कारोबारी उस पर फिल्म बनाकर शहरी मध्य वर्ग से वाह-वाही के साथ पैसा वसूलेगी, गरीब जनता हगने के लिए भी फासीवादी नीतियों को झेलेगी, मैला उठाने वाला समाज मनुस्मृति द्वारा पैदा की गयी गन्दगी में रहने को मजबूर होगा।
यही है नरेन्द्र मोदी का स्वच्छ भारत अभियान और यही है उनके मन की बात।

सीमा आज़ाद
30/4/2018

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