? मज़दूर दिवस के दिन : आज सारी दुनिया के मेहनतकशों के सामने दो प्रमुख चुनौतियां हैं एक कृत्रिम बुद्धि (Artificial intelligence) की और दूसरी व्यापक पैमाने पर विघटनकारी सांस्कृतिक हमले : नंद कश्यप 

?  मज़दूर दिवस के दिन : आज सारी दुनिया के मेहनतकशों के सामने दो प्रमुख चुनौतियां हैं एक कृत्रिम बुद्धि (Artificial intelligence) की और दूसरी व्यापक पैमाने पर विघटनकारी सांस्कृतिक हमले : नंद कश्यप 

? मज़दूर दिवस के दिन : आज सारी दुनिया के मेहनतकशों के सामने दो प्रमुख चुनौतियां हैं एक कृत्रिम बुद्धि (Artificial intelligence) की और दूसरी व्यापक पैमाने पर विघटनकारी सांस्कृतिक हमले : नंद कश्यप 

 

1 मई 2018

133वें मई दिवस की शुभकामनाएं, आज सारी दुनिया के मेहनतकशों के सामने दो प्रमुख चुनौतियां हैं एक कृत्रिम बुद्धि (Artificial intelligence) की और दूसरी व्यापक पैमाने पर विघटनकारी सांस्कृतिक हमले , और ये दोनों ही समस्यायें दुनियाभर की चंद कारपोरेट के हाथों में पृथ्वी के संसाधनों के सिमट जाने से पैदा हुए हैं, 1886 में जब मेहनतकशों ने 8 घंटे काम और अन्य सेवा शर्तों के लिए गोलियां खाईं शहीद हुए और अपने खून से जिस लाल झंडे को पैदा किया उसने दुनियाभर में मेहनतकशों की हालत में बहुत सुधार किया , जिसके परिणामस्वरूप समाज में संपन्नता आई, स्वास्थ्य शिक्षा व्यापक हुई,रहन सहन का स्तर बहुत ऊंचा हुआ , समाज में स्थिरता और शांति की ताकतें मजबूत हुई, यद्यपि अमीर गरीब की खाई बनी रही, फिर भी सामाजिक चेतना के कारण गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों के लिए सामाजिक सुरक्षा के इंतजाम हुए,यह मेहनतकशों की विचारधारा की सफलता थी.

 

लेकिन 1990 में मजदूरों के पहले राज्य सोवियत संघ के विघटन और वैश्वीकरण उदारीकरण की नीतियों के चलते पिछले 28 वर्षों में एक ओर अमीर गरीब की खाई तेजी से गहरी हुई वहीं दूसरी ओर टेक्नोलॉजी के विकास और उसके चंद हाथों में सिमट जाने के कारण , जिस टेक्नोलॉजी से संपूर्ण मानवता के लिए बेहतर जिंदगी और व्यापक रोजगार पैदा किए जा सकते थे,उसी टेक्नोलॉजी ने व्यापक पैमाने पर रोजगार छीना, क्योंकि उस पर पूंजीवादी कारपोरेट का नियंत्रण है और वह सिर्फ अपना मुनाफा देखता है इंसान मरता है मरे आत्महत्या करे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, इसीलिए हमने देखा कि हमारे देश में हाल के कुछ वर्षों में तीन लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्याएं की,बेरोजगार नौजवान, विद्यार्थियों तक आत्महत्या कर रहे, संगठित क्षेत्र के मजदूरों पर काम का बोझ लादा जा रहा जिसके कारण उन्हें विभिन्न जानलेवा बीमारियां जकड़ रही हैं, कार्य क्षेत्र में संविदा का फैशन चल पड़ा है , जीने लायक वेतन तक नहीं मिल रहा संविदा कर्मियों को , दूसरी ओर कारपोरेट मुनाफा आसमान छू रहे हैं,सारी दुनिया की आधी संपत्ति चंद कारपोरेट के हाथों सिमट गई है.

 

हमारे देश में सौ कारपोरेट घरानों के हाथों देश की 43% संपत्ति सिमट गई है और यह टेक्नोलॉजी के निजी व्यक्तिगत हाथों में केंद्रित होने के कारण है, सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष बेरोजगारी वृद्धि दर लगभग 6.5 प्रतिशत थी( ,इस वर्ष के आंकड़े आने है ), इसका मतलब है लगभग 7.5 करोड़ बेरोजगार बढ़े जबकि रोजगार पैदा होने के अवसर 4 फीसदी भी नहीं है जबकि इसमें अस्थाई स्वरोजगार और कृषि आधारित रोजगार शामिल हैं ,सीधी सी बात है बेरोजगारी का बोझ देश में बढ़ता ही जा रहा है,उस पर तुर्रा यह कि कि अब कृत्रिम बुद्धि यानि रोबोटों के द्वारा सभी तरह की नौकरियों में कटौती की जाएगी और इन्हीं रोबोटों से श्रमिक वर्ग की निगरानी रखी जाएगी मेक्किंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट के मुताबिक ,इस काम में आने वाले बीस वर्षों में 2.7 ट्रिलियन डॉलर यानी लगभग 175500 अरब रुपए का टर्नओवर होगा जिससे टेक्नोलॉजी में काबिज कारपोरेट को अरबों खरबों रुपए का मुनाफा होगा, और करोड़ों लोग बेरोजगार होंगेे .

 

हम देख रहे हैं कि पांचवें वेतन आयोग से कुछ अराजपत्रित पदों की समाप्ति होनी शुरू हुआ नतीजा आज महज 6 करोड़ शासकीय पद बचे हैं, इनमें भी 70% पद ठेके और संविदा में है,इस राष्ट्रवादी मोदी सरकार में सेना में ही 50 हजार पद रिक्त हैं, सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक अकेले केंद्र सरकार के 7 लाख असैनिक पद रिक्त हैं,सारे राज्यों की भी वही स्थिति है, राज्य सभा सांसद अब्दुल वहाब के अतारांकित प्रश्न क्रमांक 2536 दिनांक 16-03-18 के जवाब में रेल राज्य मंत्री ने बताया कि रेलों के सभी क्षेत्रों में अराजपत्रित पदों पर रिक्तियों की संख्या 2244793 है, यानि लगभग साढ़े बाईस लाख पद,अभी रेल के 90000 पदों जिसमें 63000 ग्रुप डी के हैं के लिए डेढ़ करोड़ आवेदन आए हैं,

मोदी सरकार ने बेरोजगारों को छलने का नया तरीका ईजाद किया है ,2016 में श्रम मंत्रालय के मुताबिक देश में 7करोड़ 80 लाख रजिस्टर्ड बेरोजगार थे, उसके बाद श्रम मंत्रालय ने सर्वे बंद कर दिया,अब सरकार 7 करोड़ रोजगार पैदा करने का दावा कर रही है,आप सवाल न पूछें इसलिए आपको हिंदू मुस्लिम दलित पिछड़े के आरक्षण में भटका रही है मेहनतकश मजदूर किसान की ताकत उसकी एकता में है उसे तोड़ने आरक्षण (जो सामाजिक न्याय प्रदान करने की एक जरूरी प्रक्रिया है) के नाम पर देश को गृहयुद्ध में ढकेलने की कोशिश की गई है

आइए इस मई दिवस हम अपने एकता को कायम रखने ,सिर के बल खड़े लोकतंत्र को पैरों पर खड़ा करने रैली सभा में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करें.

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