कितने व्याकरण समाये है इस एक व्याकरण में ” नाटक व्याकरण की नाट्य समीक्षा  : अख्तर  अली 

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नाट्य समीक्षा  – अख्तर  अली 
नाटक – व्याकरण
लेखक- प्रेमानंद गज्वी , अनुवाद – अजय आठले
निर्देशक – हीरा मानिकपुरी |
प्रस्तुति – रंग श्रृंखला नाट्य मंच , रायपुर |

“कितने व्याकरण समाये है इस एक व्याकरण में “

देश में व्याप्त जुलूस , रैली , नारे , समर्थन , विरोध का जो शोर मचा हुआ है , हीरा मानिकपुरी ने इस शोर के स्वर को रचनात्मक परिवर्तित क515र कलात्मक विरोध में दर्ज कर अपनी नाट्य प्रस्तुति को इस अंदाज़ में परोसा कि प्रस्तुति ही एक ऐसी जुलूस और रैली नज़र आई जिसमे शोर तो नहीं था पर गंभीर नाराज़गी , चिंता , गुस्सा ,अपने चरम पर था | नाटक में बात करने का एक तरीका होता है ,उस कलात्मक तरीके का इस्तेमाल लेखक , अनुवादक और निर्देशक को आना चाहिए तभी प्रस्तुति नाट्य प्रस्तुति कहलाएगी वरना मंच पर जिंदाबाद मुर्दाबाद का कोलाहल भर रह जाएगा और दर्शक अपने को ठगा हुआ महसूस करेगा |

 

प्रेमानंद गज्वी की इस मौलिक रचना का अनुवाद अजय आठले जी ने किया है | व्याकरण के अनुवाद में अनुवाद का व्याकरण रत्ती भर भी त्रुटिपूर्ण नहीं है क्योकि अजय आठले का रंगमंच का व्याकरण दुरुस्त है | भाषा के व्याकरण का जानकार ही समाज के व्याकरण को ठीक कर सकता है | प्रेमानंद गज्वी और अजय आठले ने जो व्याकरण के नाम से रंगमंच का अदब पेश किया है वह ज़रा भी बेअदब नहीं है |चूकि यह विचारात्मक नाटक है लिहाज़ा इससे सहमति – असहमति हो सकती है | मै नाटक के अंत से असहमत हूँ , नायिका एक अच्छा सन्देश दे रही थी फिर उसे वेम्प क्यों बनाया ? जिस लय में नाटक चल रहा था उसका एक सुखद अंत होना चाहिए था | नाटक का यह अंत समाज को गलत मेसेज देता है | नाटक में शब्द बहुत अधिक है , इतने ज़्यादा कि अभिनेता को रत्ती भर भी विश्राम नहीं मिलता , लगातार बोलते बोलते उसका लडखडा जाना स्वाभाविक है |

 

हीरा मानिकपुरी रंगजगत में तेज़ी से अपनी पहचान बनाते जा रहे है , बड़े कद के निर्देशकों में इनका शुमार होने लगा है | सुर की बरदारी और गगन दमादा बाज्यो के बाद हीरा मानिकपुरी व्याकरण में भी अपनी निर्देशकीय परिकल्पना का भरपूर इस्तेमाल करते दिखाई दिए | नाट्य आलेख पूर्णतया लेखक की कल्पना होता है लेकिन उसका मंचन निर्देशक की कारीगरी से सज संवर कर सामने आता है | प्रस्तुति की डिज़ाइन ही लेखन को मान्यता प्रदान करती है और यह महत्वपूर्ण काम निर्देशक करता है | अगर अच्छी प्रस्तुति के बिना भी नाट्य लेखन स्वीकारा जा सकता तो हिंदी रंगमंच में नवनाट्य लेखन का अभाव हरगिज़ हरगिज़ नहीं होता और कवियों की तरह हर शहर की हर गली के हर मकान के हर कमरे में एक नाटककार मौजूद होता |

हीरा राष्ट्रीय नाट्य विद्धालय से प्रशिक्षित है | अब उन्हें निरंतर रंगकर्म करना है इसलिए एक ही पैटर्न के नाटको से बात नहीं बनेगी , विषय और ढंग की विविधता इन दिनों आवश्यक आवश्यकता बन गई है | दर्शक हर बार कुछ अलग देखना चाहता है लिहाज़ा एक ही विचारधारा से चिपक कर बेहतर रंगमंच नहीं किया जा सकता |हीरा के चयन में यह सोच सम्मिलित है |

व्याकरण प्रतिरोध का रंगमंच है | इसमें पलायन की पीड़ा , मजबूरी ,और वजह का उल्लेख है | छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में व्याकरण जैसे नाटक मात्र कला का प्रदर्शन नहीं होते बल्कि सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वाह भी होते है | लेखक , अनुवादक और निर्देशक इस विषय के चयन के लिए यक़ीनन बधाई के पात्र है | विस्थापन की त्रासदी को रोकना सरकार का नैतिक कर्तव्य है यह बात अपनी पूरी प्रभावशीलता के साथ मंच पर स्थापित हुई , यही नाटक की सफलता का मापदंड है |

विस्थापन , यह नाटक का विचारात्मक पक्ष है , इसे प्रतिपादित करने के लिए या यू कहे कि साफगोई के साथ सत्यापित करने के लिये मंच पर जो कलात्मकता निर्मित की गई जिसमे प्रकाश के बिम्ब , नाट्य संगीत का पुट ,ध्वनी , वेश भूषा एवम रूपसज्जा का तड़का और सब से महत्वपूर्ण कलाकारों का सहज अभिनय , इन सब ने प्रस्तुति को उस उंचाई पर पंहुचा दिया जहां इस परिश्रम , उत्साह , योग्यता और साहस को पहुचना चाहिए था | मंच के सामने के दो कोने में निर्देशक ने अच्छे दृश्य रचे जबकि इस स्थान पर अभिनय करना मुश्किल होता है , अभिनेता जितना मंच के मध्य भाग में खुलता है उतना सिरहाने में नहीं |

 

नाटक की सफलता किसी एक कलाकार के कंधो पर नहीं टिकी होती | मंच पर मौजूद हर कलाकार महत्वपूर्ण होता है , वह अपनी पूरी ज़िम्मेदारी के साथ मंच पर होता है तभी नाटक अपने सुखद अंत तक पहुच पाता है , लेकिन फिर भी कुछ कलाकार (विवेक निर्मल ,त्रिलोचन सोना , शिवा कुमार ,अलका दुबे ) अपनी क्षमता और पात्र की संरचना के कारण ध्यान खीचते है जैसे व्याकरण की अभिनेत्री सिग्मा | सिग्मा शीघ्र भारतीय रंगमंच की प्रमुख हस्ताक्षर होगी | मंच पर उनका सहज होना , पात्र के अनुरूप स्वंम को परवर्तित करना , संवादो की अदायगी में उतार चढाव , मंच की भाषा को लहजा देना और आंगिग अभिनय से प्रस्तुति को संवार देना | सिग्मा के अभिनय में आवाज़ है और आवाज़ में गज़ब का अभिनय | इस भूमिका में सिग्मा के चयन का श्रेय भी निर्देशक हीरा मानिकपुरी को ही जाता है |

रंग श्रंखला नाट्य मंच रायपुर की यह प्रस्तुति एक शानदार नाट्य प्रस्तुति थी |

अख्तर  अली
आमानाका ,कुकुर बेडा
रायपुर ( छत्तीसगढ़ )
मो.न. 9826126781
ई मेल – akakhterspritwala@yahoo.co.in

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