25.04.2018

बिलासपुर। पूर्व महापौर वाणी राव की कांग्रेस में वापसी हो गई । अपने राजनीतिक जीवन में यह चौथी बार है कि उन्होने आना-जाना किया है,हालांकि भाजपा में वे कभी नहीं गई। जिस पार्टी में भी गई उसमें कांग्रेस शब्द जुड़ा रहा।  कांग्रेस छोड़ कर तिवारी कांग्रेस में गई फिर वापस कांग्रेस में।  उसके बाद जनता कांग्रेस में गई फिर वापस कांग्रेस में। अब फिलहाल कहीं जाने की संभावना तो दिखती नहीं क्योकि चुनाव सर पर है। इसके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण है कि अब वाणी राव ही बिलासपुर विधान सभा क्षेत्र से सबसे सशक्त दावेदार हैं।  संभवतः इसी शर्त के साथ उनहोंने वापसी की हो,क्योंकि अजीत जोगी ने तो टिकट दी नहीं।             

 

  वाणी राव कांग्रेस परिवार से रहीं हैं। नागेश्वर राव, अशोक राव कांग्रेस के प्रमुख नेता रहे। स्वाभाविक रूप से उन्होंने कांग्रेस में ही अपनी सक्रियता दिखाई। महापौर रहीं।  अखिल भारतीय महासचिव रहीं।  पिछला चुनाव भी कांग्रेस की टिकट पर लड़ा,हालांकि 15 हजार मतों से अमर अग्रवाल ने उन्हें हरा दिया। इस हार के बाद बहुत आरोप-प्रत्यारोप लगे। कांग्रेस के ही लोगों ने साथ नही दिया।  भितरघात – खुलाघात सब हुआ। ये सब उस समय की बात है जब चरण दास महंत प्रदेश अध्यक्ष थे। जो “साफ्ट” स्वभाव और नरम वार के लिए जाने जाते रहे। फिर भूपेश बघेल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। बनते ही श्री बघेल ने खुद को दबंग नेता के रूप में स्थापित किया और सबसे बड़ा काम अजीत जोगी को कांग्रेस से बाहर कर दिया। हालांकि राजनीति संभावनाओं का खेल है पर बघेल ने जोगी के लिए फ़िलहाल सारे दरवाज़े बंद कर दिए हैं।जाहिर है वे ही प्रदेश में सबसे सशक्त नेता हैं। इसके बावजूद वाणी राव की वापसी के समय प्रदेश प्रभारी पी एल पुनिया साथ रहे। और दिल्ली में सीधे राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने वापसी कराई। इससे वाणी राव का कद दिख गया। न ही जिले में कोई आवेदन दिया गया और न ही प्रदेश ने उनकी वापसी पर कोई अभिमत दिया जो कि सामान्य प्रक्रिया है। अब किसकी हिम्मत है जो इस वापसी पर सवाल उठा सके। 

 

   वाणी राव की वापसी से कांग्रेस की महिलाओं में तो खुशी दिख रही है। कुछ ने तो वाट्सअप ग्रुप पर बधाइयाँ दी है तो किसी ने लौट के बुद्धउ घर को आये भी लिखा है। इसके अलावा इस वापसी पर कोई कुछ बोल ही नही पा रहा है। इसलिए भी कि वाणी राव की अपनी अलग जगह रही है। उनके अपने समर्थक रहे हैं। एक प्रकार से उनका अपना गुट रहा है। आज कांग्रेस के जितने पदाधिकारी हैं उनमें से ज्यादातर से उनकी सम्मानजनक दूरी ही रही है। कुछ पर तो खुलाघात के आरोप भी लगे हैं। ऐसे में वाणी राव की वापसी से जोगी कांग्रेस का जरूर बड़ा नुकसान हुआ है पर कांग्रेस का कितना फायदा हुआ है यह तो बाद में ही पता चलेगा।           

     वाणी राव का काम करने का अपना अलग तरीका रहा है। उनकी ‘पहुंच’ भी ऊपर तक रही है। जाहिर है उनकी वापसी से बिलासपुर विधान सभा क्षेत्र के दावेदार सबसे ज्यादा परेशान हो गए हैं। बिलासपुर से प्रमुख़ दावेदारों में अटल श्रीवास्तव, विजय पांडे, शैलेश पांडेय,रामशरण यादव,चीका बाजपेयी,शिवा मिश्र, के नाम चल रहे थे।महिलाओं में जयश्री शुक्ल का नाम था। फिर हाल ही में अचानक अशोक अग्रवाल का भी नाम तेजी से उभरा। इतनी तेजी से कि लोग कहने लगे कहीं से पक्का आश्वासन मिल गया है तभी तो अशोक अग्रवाल इतना सक्रिय। इसके अलावा नंदन चतुर्वेदी और तरु तिवारी भी टिकट चाहते हैं। इस बार यह बात भी चल रही थी और चल ही रही है कि टिकट चाहे जिसे मिले सब मिलकर कांग्रेस को जिताएंगे। लग भी रहा था कि सब मिल गए हैं। अब वाणी राव के आ जाने से समीकरण बदलते दिख रहे हैं। उपरोक्त्त दावेदारों में से कितने हैं जो वाणी राव को (अगर) टिकट मिलती है तो साथ देंगे ? वहीं ये सब भी आश्वस्त नहीं है कि वाणी राव भी उनका साथ देगी। कुल मिलाकर इस वापसी से जिले में तो अंतरकलह बढ़ना ही है। हां, आम लोगों में वाणी राव की बहुत अच्छी छवि है। एक पढ़ी लिखी और भद्र महिला नेत्री के रूप में उनका सम्मान है। इस छवि का कितना लाभ कांग्रेस उठा पाती है यह भी देखना होगा। हालांकि महापौर रहते हुए उनकी लोकप्रियता पर आंच आई थी। पर इसका ठीकरा भाजपा सरकार पर फोड़ा गया कि कांग्रेसी महापौर को काम नही करने दिया गया। 

  कुल मिलाकर वाणी राव की यह वापसी महत्वपूर्ण तो है। अगर बिलासपुर से नही तो वे बिल्हा से दवा ठोक सकती हैं। वहां से महंत समर्थक राजेन्द्र शुक्ल दावेदार है। पर वह स्व. अशोक राव की सीट रही है इस नाते वाणी राव का दावा बनता ही है। हां, अगर वाणी राव विधानसभा चुनाव न लड़कर इंतज़ार करे तो लोकसभा के लिए वे एक सशक्त प्रत्याशी हो सकती हैं। ये सिर्फ सम्भावना ही है। राजनीति में कुछ भी तय नही होता, खासकर लम्बे समय के लिए तो कुछ भी नही। हमेशा समीकरण बदलते रहते हैं। पर इतना तो तय दिख रहा है कि वाणी राव की वापसी निःशर्त नही हुई है। साथ ही यह भी साफ है कि इस एक वापसी ने जिले की कांग्रेसी राजनीति के समीकरण तो बदल ही दिए हैं, यह वाणी राव की ताकत भी है और कमजोरी भी। अब जिस नेत्री की वापसी राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कराई हो उसके लिये कोई क्या टिप्पणी कर सकता है ? पर पुराने जख़्म तो सभी लिए बैठे हैं। पिछले चुनाव में मिले जख्मों को वाणी राव भी भूल पाईं होंगी क्या? फ़िलहाल तो वाणी राव का यही कहना कि भाजपा को रोकने वे वापस आईं हैं। साथ ही अजीत जोगी से कोई शिकायत नहीं है यह भी कहा है उन्होने। श्री जोगी ने अपनी पार्टी से उन्हें टिकट नहीं दी यह भी एक तथ्य तो है। 

 


नथमल शर्मा ,संपादक ,सांध्य दैनिक ,ईवनिंग टाईम्स बिलासपुर