पत्थर गढी से क्यों भयभीत है सत्ता प्रतिष्ठान और मीडिया .यह तो घोषणा है कि सरकारेँ संविधान का पालन करें ,और आदिवासी भी कानून की रक्षा करेगा . पत्थल गढ़ी पर विस्तृत चर्चा .

पत्थर गढी से क्यों भयभीत है सत्ता प्रतिष्ठान और  मीडिया .यह तो घोषणा है कि सरकारेँ संविधान का पालन करें ,और आदिवासी भी कानून की रक्षा करेगा . पत्थल गढ़ी पर विस्तृत चर्चा .

पत्थर गढी से क्यों भयभीत है सत्ता प्रतिष्ठान और मीडिया .यह तो घोषणा है कि सरकारेँ संविधान का पालन करें ,और आदिवासी भी कानून की रक्षा करेगा . पत्थल गढ़ी पर विस्तृत चर्चा .

24.04.2018

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छतीसगढ मे जानबूझकर पत्थल गढ़ी को लेकर हड़कम्प मचा हुआ है, सामन्त से राजनीतिज्ञ बने नेता और मीडिया के एक दो समूह ने षडयंत्र पूर्वक आदिवासियों की इस संवैधानिक पहल को माओवाद से जोडकर हमले की मुहिम शुरू कर दी हैं , सोशल  मीडिया से लेकर कुछ अखबार और टीवी चैनल बहस कर रहे हैं ,ऐसी लोग बहस कर रहे है जिन्हें इस का अ ब स भी नही मालुम ,न एंकर को कुछ पता है और न भाग लेने वाले नेताओं को ,बस लगे हैं आदिवासियों को माओवादी सिध्द करने मे.

सरगुजा के ओडगी और जशपुरनगर के बच्छर गांव में लगी पत्थर गढी को लेकर ऊलजलूल व्याख्या की जा ही है ,मानो वो गाँव भारत से अलग होने की घोषणा कर चुके हैं ,वे कोई भारत का कानून नहीं मानेंगे किसी को आने जाने नहीं देंगे , कोई लिख रहा है कि बस्तर के बाद उत्तर छत्तीसग़ढ़ सुलग रहा है तो कोई कह् रहा है माओवाद के लिए जमीन तैयार हो रही हैं .

जब कभी भी आदिवासी कोई संविधान की बात करे और कहे कि सबसे ऊँची ग्रामसभा तो सीधे उन्हें माओवादी बता दीजिए बस हो गया उनका काम.

 

पत्थल गढी क्या है और क्या यह संवेधानिक है

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इसलिए चलिये पहले यह जाने की पत्थलगढ़ी है क्या ,साधारण शब्दों मे कहें तो कोई एक पत्थर गाड़ने जैसा है जिसपर कोई घोषणा की गई है, अब पत्थर की जगह ईट सीमेंट से बने बोर्ड ने लेली है . ऐसे बोर्ड आपको भारत के हर गाँव शहर में सरकार द्वारा लगाए गए मिल जाएंगे इसमे कुछ भी अजूबा या नया नहीं है.

दी वायर की रिपोर्ट में लिखा गया हैं :

आदिवासी समुदाय और गांवों में विधि-विधान/संस्कार के साथ पत्थलगड़ी (बड़ा शिलालेख गाड़ने) की परंपरा पुरानी है. इनमें मौजा, सीमाना, ग्रामसभा और अधिकार की जानकारी रहती है. वंशावली, पुरखे तथा मरनी (मृत व्यक्ति) की याद संजोए रखने के लिए भी पत्थलगड़ी की जाती है. कई जगहों पर अंग्रेजों–दुश्मनों के खिलाफ लड़कर शहीद होने वाले वीर सूपतों के सम्मान में भी पत

दूसरी तरफ ग्रामसभा द्वारा पत्थलगड़ी में जिन दावों का उल्लेख किया जा रहा है, उसे लेकर सवाल उठने लगे हैं. दरअसल पत्थलगड़ी के जरिए दावे किए जा रहे हैं किः

आदिवासियों के स्वशासन व नियंत्रण क्षेत्र में गैररूढ़ि प्रथा के व्यक्तियों के मौलिक अधिकार लागू नहीं है. लिहाजा इन इलाकों में उनका स्वंतत्र भ्रमण, रोजगार-कारोबार करना या बस जाना, पूर्णतः प्रतिबंध है.पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में संसद या विधानमंडल का कोई भी सामान्य कानून लागू नहीं है. अनुच्छेद 15 (पारा 1-5) के तहत एसे लोगों जिनके गांव में आने से यहां की सुशासन शक्ति भंग होने की संभावना है, तो उनका आना-जाना, घूमना-फिरना वर्जित है.वोटर कार्ड और आधार कार्ड आदिवासी विरोधी दस्तावेज हैं तथा आदिवासी लोग भारत देश के मालिक हैं, आम आदमी या नागरिक नहीं.संविधान के अनुच्छेद 13 (3) क के तहत रूढ़ि और प्रथा ही विधि का बल यानी संविधान की शक्ति है.

आदिवासी महासभा से जुड़े युसूफ पूर्ति कहते हैं कि सरकार पत्थलगड़ी को गलत ठहराने में जुटी है, इससे हमें गुरेज है. दरअसल सरकार, सामान्य कानून को आदिवासी क्षेत्रों में लाकर हमारे हितों की अनदेखी कर रही है. जबकि आदिवासी ग्राम सभा के जरिए स्वशासन चाहते हैं. इसलिए दबाव और रोक के बावजूद पत्थलगड़ी कार्यक्रम आगे बढ़ रहा है.

पूर्ति का जोर इस बात पर भी है कि आदिवासियों की इजाजत के बिना किसी भी कानून में संशोधन नहीं हो सकता और ना ही नया कानून बन सकता.

इस बीच आदिवासी महासभा से जुड़े शंकर महली ने मीडिया से कहा है कि आदिवासी महासभा एक विचारधारा है और पत्थलगड़ी एक रूढ़िवादी व्यवस्था. इसके जरिए गांव के लोगों को स्वशासन के लिए जागरूक किया जा रहा है.

पत्थरों पर जानकारी लिखे जाने का इतिहास है. 1996 में खूंटी के कर्रा में बीडी शर्मा और बंदी उरांव समेत स्थानीय नेताओं ने पत्थलगड़ी की थी और इसके माध्यम से पेसा कानून के बारे में लिखा गया था.

 

यहां मौलिक प्रश्न यह है कि क्या पत्थलगड़ी असंवैधानिक हैं?

किसी को  पता भी है कि  आदिवासियों के लिए पत्थलगड़ी का क्या अर्थ है? क्या आदिवासियों की परंपरा और रूढ़ि में  आदिवासी समाज में पत्थलगड़ी का महत्व खतियान से भी ज्यादा है। जब ब्रिटिश हुकूमत ने इस इलाके के मुंडाओं से कहा कि यह कैसे साबित कर सकते हो कि यह तुम्हारी जमीन है, तब मुंडाओं ने ससनदिरी के पत्थरों को दिखाते हुए जवाब दिया कि यही हमारे अस्तित्व के सबूत हैं। यही हमारा खतियान है।

इस जमीन को हमारे पूर्वजों ने जोत-कोड़कर आबाद किया है यह इसका प्रमाण है। ब्रिटिश शासन के समय ससनदिरी के पत्थरों ने ही मुंडाओं को उनकी जमीन पर अधिकार दिलाया था। अंग्रेज आदिवासियों की संस्कृति, रूढ़ि एवं परंपरा का सम्मान करते थे इसलिए उन्होंने पत्थलगड़ी को स्वीकारा। पत्थलगड़ी कई आदिवासी समुदायों की संस्कृति, परंपरा एवं रूढ़ि है। पत्थलगड़ी को पवित्र माना जाता है। आदिवासी लोग अपने पूर्वजों की याद में पत्थलगड़ी करते हैं।

यदि हम भारत के संविधान को देखें तो अनुच्छेद – 13(2) में रूढ़ि को विधि का बल माना गया है तथा पांचवी अनुसूची क्षेत्रों के लिए रूढ़ि ही विधि का बल है। आदिवासी समाज रूढ़ि एवं परंपरा से चलता है तथा पत्थलगड़ी आदिवासी समाज की परंपरा हैं इसलिए पत्थलगड़ी पूर्णतः संवैधानिक है।

  पेसा कानून को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूर्व आई.ए.एस. आफिसर बी.डी. शर्मा के नेतृत्व में स्थापित भारत जन आंदोलन के द्वारा गांव-गांव में पत्थलगड़ी कर उसमें ग्रामसभा की शक्तियां एवं अधिकारों को लिखा गया। इस पत्थलगड़ी का उद्देश्य था गांव-गांव में ग्रामसभा के प्रभुत्व को स्थापित करना.

 

विजय भाई ,आलोक शुक्ला और तामेश्वर सिंह के विचार 

भारत जन आंदोलन के संस्थापकों में से एक और बी डी शर्मा के सहयोगी विजय भाई विस्तार से बताते हैं :

पथलगढ़ी -आज़ादी के बाद आदिवासियों के साथ हुई ऐतिहासिक अन्याय के विरूद्ध संवैधानिक मंशा के अनुरूप एक प्रतीक विरोध के रूप में हम मानते हैं।संविधान की अक्षर के रूप में नहीं हो तो भी मंशा के अनुरूप कार्य नही हो रहा है।संविधान के 5वी.अनुसूचि की सेक्शन 5(2) या पेसा या वैन अधिकार के तहत या समता जजमेंट को भी देखे तो पता चलता है कि उनकी जमीन, जंगल पर अधिकार की सतत हनन हुआ है।आज़ाद भारत मे नेहरूजी की पंचशील नीति जिसमे यह स्पष्ट था कि आदिवासियों की जमीन जंगल पर अधिकार को आदर करने के लिए राष्ट्र वचनबद्ध था।

लेकिन आप देखे की 1951 में 5बी अनुसूचित क्षेत्र 99,693sq miles था और आज कितना है। कुल भारत का 10परसेंट भी नही रह गया।झारखंड में cnt एंड spt एक्ट की धज्जियां उड़ाते हुए जो संबिधान की 9th schedule में रखा गया उसमे 3.5 लाख एकर ले लिया गया। छत्तीसगढ़ में भी ऐसा है। fra के तहत भारत का 750 लाख हेक्टेयर जंगल जमीन से आदिवासियों को कम से कम 450 लाख हेक्टेयर जंगल जमीन मिलना चाहिए था, जो डॉक्यूमेंटेड है,लेकिन कोई सरकार ऐतिहाशिक अन्याय को सुधारने के लिए लाये गए fra को लागू नही किया।बदले fra कानून को ही खत्म कर रहे है।

हमारा मानना है कि सरकारें आदिवासियों के साथ आज़ादी के बाद से जो गैर संबैधानिक और गैर कानूनी कार्य किये है उस से हट कर संविधन की मांस की अनुरूप काम करे जिस के लिए वो वचन वध है और आज़ादी के बाद आदिवासियों के सम्वन्ध में राष्ट्रीय संकल्प को पालन करें। आप ही देखे की इन्वेस्टर्स मीट या कॉमन वेल्थ गेम्स के लिए ट्राइबल सब-प्लान की धन राशि खर्च हो रहा है। इसीलिए सरकारें आदिवासियों को बोल ने के पहले अपना ट्रैक रिकॉर्ड सुधारें, बाकी तो ठीक हो जाएगा।

5वी अनुसूचि में अनुसूचित क्षेत्रों में जमीन हस्तान्तरण एवं अधिग्रहण ऐसे देखा जाये तो सम्पूर्ण बन है।लेकिन सरकारें क्या किये है? इस देश की मूलनिवासियों के साथ जो वायदा संबिधान में या संविधान सभा मे किया गया था, वो इस देश की सरकार पालन किया है क्या?

सरकार द्वारा आदिवासियों की जमीन को गैर संविधानिक और गैर कानूनी तरीके से हथियाने की सब से बड़ा उदाहरण है 74बा संशोधन का अनुछेद 243(z c) जिसके तहत राज्य सरकारें अनुसूचित क्षेत्रों के नगरी इलाके में प्रशासनिक व्यवस्था 1994 से गैर कानूनी चल रहा है। इस सम्वन्ध में विस्तार अधिनियम 2001 से राज्य सभा मे लंबित है, लेकिन सरकारें दिलचस्पी नही ले रहे है।इसीलिए की नगरी क्षेत्रों की जमीन की हस्तांतरण हो जाये।सरकारें जानबूझकर गैर संविधानिक तरीके से ग्राम पंचयोतों को नगर पंचयोतों में तबदील कर रही है.

छतीसगढ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला कहते है :

संविधान की पांचवी अनुसूची का मूल मकसद था कि आदिवासियों की अपनी परंपरागत व्यवस्था कायम रहे और सरकारें आदिवासियों के जंगल, जमीन की रक्षा करने हेतु लिए गए संकल्प का पालन करें । परन्तु आजादी के बाद से आदिवासी इलाकों में स्वयं सरकारों ने गैर संवैधानिक और गैरकानूनी तरीको से आदिवासियों के जीवन के आधार प्राकृतिक संसाधनों जल जंगल जमीन की प्राकृतिक लूट को बढ़ावा दिया। सबसे दुखद यह रहा कि इन अनुसूचित क्षेत्रो में आदिवासियों के अधिकारों के संरक्षण का दायित्व राज्यपालों के पास रहा परन्तु राज्यपालों ने कभी भी अपने दायित्व का निर्वहन नही किया । और हम देखते हैं कि आजादी के पूर्व ब्रिटिश व्यवस्था में सामान्य इलाको के कई कानून जो आदिवासी हितों के खिलाफ थे वो लागू नही थे लेकिन आजादी के बाद वो सभी कानून लागू हो गए क्योंकि उन्हें रोकने या संशोधन हेतु राज्यपाल ने कोई भूमिका निभाई न ही सरकारों ने इस बात की चिंता की।

वर्ष 2006 में जब वनाधिकार मान्यता कानून बना तब इसे संसद में पारित करते समय सभी दलों ने स्वीकार किया कि आदिवसियों के साथ एतिहासिक अन्याय हुआ हैं क्योंकि उनके उनके जंगल जमीन पर उनके हकों को मान्यता देने की बजाए उसे छिना गया हैं। यह स्वीकरोक्ति भी स्पष्ट रूप से दर्शाता हैं कि जो जो भी संविधानिक व्यवस्था आदिवासी क्षेत्रों के लिए बनाई गई थी उसका कभी भी पालन नही हुआ । उस ऐतिहासिक अन्याय को खत्म करने में लिए बनाए गए वनाधिकार कानून का भी आज पालन नही हो रहा हैं। छत्तीसगढ़ में तो बाकायदा इसकी धज्जियां उड़ाकर अडानी जैसे कार्पोरेट को जंगल जमीन खनिज संपदा सौंपी जा रही हैं ।

मेरा मानना हैं कि लगातार अन्याय और अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित आदिवासी समाज मे व्यापक आक्रोश हैं और पत्थलगाढ़ी उसके खिलाफ संविधान की मंशा अनुरूप एक प्रतिकात्मक विरोध हैं । जिसमे परंपरागत ग्रामसभा को स्वशासन की आदर्श इकाई के रूप में स्थापित करने की कोशिश हैं, और यही मंशा पेसा कानून और वनाधिकार कानून की भी रही हैं।
हालांकि पत्थलगढ़ी के नाम पर हम ऐसे किसी कार्यक्रम का समर्थन नही कर सकते जो लोकतांत्रिक मूल्य और संवैधानिक प्रावधानों से हटकर हैं।

यहां पर में उन लोगो को  कहना चाहता हूं कि जब आप पत्थलगढ़ी में गांव की सीमा बंधन और ग्रामसभा के बिना किसी भी कार्य की अनुमति नही होने का विरोध करते हैं तो जार हमे SEZ कानून को भी देख लेना चाहिए जहां बाकायदा फॉरेन टेरिटरी के तरीके से देखते हुए उसके अंदर इस देश के कोई भी सामान्य कानून लागू नही होने के प्रावधान स्वयं सेज कानून में हैं उस समय क्यों यह हल्ला नही होता कि ऐसी कोई जगह कैसे हो सकती हैं जहाँ सामान्य कानून ही लागू नही होंगे ।
मुझे लगता हैं यह बेहतर समय हैं जब हम आजादी लगभग 70 साल बाद ही सही पांचवी अनुसूची पर चर्चा तो कर रहे हैं अन्यथा करपोर्ट परस्त सरकारों ने तो इसे भुला ही दिया हैं।

आदिवासी संस्कृति और आंदोलन पर खास नजर रखने वाले युवा पत्रकार तामेश्वर सिन्हा कहते है:

छतीसगढ में पहली पत्थर गढ़ी बस्तर में डॉ .बीडी शर्मा की पहल और प्रेरणा पर लगी वे इसे संविधान का मंदिर कहते है .तामेश्वर एक रिपोर्ट में लिखते हैं :

 2 हजार की आबादी वाले गांव की खास बात यह है कि यह देश में अकेला गांव है, जहां भारत के संविधान का (मंदिर) गुड़ी है। यह कोई भव्य (मंदिर) गुड़ी नही बल्कि आधारशिला पर संविधान में निहित जनजातीय क्षेत्रों में पांचवीं अनुसूची के प्रावधान और अधिकार लिखा हुआ है।

6 अक्टूबर 1992 को जब इस गुड़ी की आधारशिला रखी गयी थी तब से ग्रामीण इसे ही गुड़ी समझते हैं और इसकी पूजा (सेवा) करते हैं। छत्तीसगढ़ समेत अब देश के अन्य अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी, अब पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के संवैधानिक प्रावधान लिखित पथरगड़ी लग रहे हैं।

करीब 25 साल पहले आदिवासियों ने स्टील प्लांट के खिलाफ एक आंदोलन किया था। इसके बाद यह (मंदिर) गुड़ी स्थापित हुआ। एसएम डायकेम के स्टील प्लांट के जमीन अधिग्रहण को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका लगाईं गई थी, याचिका का फैसला ग्रामीणों के पक्ष में आया था, जिस दिन फैसला हाईकोर्ट में आया उसी दिन को ग्रामीण विजय उत्सव के रूप में यहाँ एकजुट होकर मनाते हैं।

आज भी ग्रामीण विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा (बस्तर राज के पेनों की महाजतरा) के मावली परघाव के दो दिन पहले बुरुंगपाल पंचायत के आसपास के 50 गांव के आदिवासी अनुसूचित जाति ओबीसी समुदाय इकट्ठा होकर संविधान में आदिवासीयों व पांचवीं अनुसूची के प्रावधान अधिकार शक्तियों का वाचन, चर्चा परिचर्चा और वर्तमान में एक्सक्लुडेड एरिया के संविधान प्रावधान की संवैधानिक सभा पारम्परिक ग्रामसभा की प्रस्ताव निर्णय को लेकर ग्राम प्रमुख अवगत कराते हैं, यह सिलसिला बीते 25 सालों से लगातार चलता आ रहा है।

आदिवासी समुदाय संवैधानिक लड़ाई के पक्ष में

सोमारू कर्मा कहते हैं कि इस सच्चाई को बहुत कम ही लोग जानते हैं कि आज का पेसा कानून बस्तर के बुरूंगपाल में लिखा गया। आदिवासी  समुदाय आज भी संवैधानिक लड़ाई के पक्ष में है और संविधान में दिए सारे आधिकारों के तहत अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

बुरूंगपाल सरपंच तथा तत्कालीन संघर्ष समिति (1992) के सदस्य एवं पेसा कानून के ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य सोमारू कर्मा उस दौरान पेसा कानून के इंजीनियर डॉक्टर बीडी शर्मा के योगदान को याद करते हैं। सोमारू बताते हैं कि यदि शर्मा जी का सकारात्मक सहयोग नहीं मिलता तो आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की लड़ाई कमजोर हो जाती क्योंकि “पेसा अधिनियम ” आदिवासियों की ग्राम गणराज्य की लड़ाई “मावा नाटे मावा राज” की दहाड़ से बना है।

 

राजनैतिक दलों मे कही समर्थन तो कहीं विरोध.

छतीसगढ के प्रमुख आदिवासी नेता और अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष नंदकुमार साय ने घोरघडी में 18 फरवरी को जहां एक पत्थर गढ़ी का उद्घटान किया और सरगुजा में इस प्रकार की गढी लगाने का एलान किया तो भजपा के ही प्रबल प्रताप सिंह ने इस पहल का तीखे शब्दों में विरोध किया ,विपक्ष के नेता टी एस बाबा ने तो इस प्रकार की पत्थर गढ़ी की जानकारी से इन्कार किया साथ ही कहा कि यदि कुछ असंवैधानिक हो रहा हैं तो कांग्रेस उसका विरोध करती हैं. अभी ज्यादार राजनीतिक दल कुछ बोलने से बच रहे हैं ,आदिवासी और जनसंगठन संविधान की धाराओं के एलान का समर्थन करते हैं.

आदिवासी क्षेत्रों मे संविधान या कानून का उलंधन सरकार खुद करती रही है .

यह सही हो सकता है कि इन पत्थल गढ़ी
में संविधान का की कुछ धाराओं का गलत उल्लेख किया गया हो ,और चर्चा में कुछ अतिशयोक्ति पूर्ण भाषा का उपयोग किया गया हो ,तो इतने भर से कोई माओवादी नही हो जाता.
जबकि पांचवी या छठवी अनुसूचित क्षेत्रों मे आदिवासियों के लिये बनाये कानून का कौन पालन कर रहा हैं , पेसा और वनाधिकार कानून की धज्जियां सरकार ,कारपोरेट और प्रशशन मिल कर उड़ा रहे हैं ,कलेक्टरों से लेकर मन्त्री ,पुलिस पेसा कानून को जानते ही नहीं है, इनके लिए तो कम्पनी का आदेश ही अंतिम है, ग्राम सभा के कोई मायने नही रह गये है ,फर्जी जनसुनवाई से कोन इंकार कर सकता हैं ,पूरे आदिवासीयो़ की जमीनों को गैरकानूनी तरीकों से छीना जा रहा है या यों कहिये छीन ली गई है.

पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों मे आदिवासी जीवन परंपरागत रूप से बना रहे और लूट से बचा रहे इसके लिये राज्यपाल को विशेष अधिकार दिये गये हैं कि वे संसद और विधानसभा द्वारा पारित कानून की भी समीक्षा करके लागू करें और यदि उन्हें लगे कि वह क़ानून उस समुदाय के लिये अनुकूल नही है तो उसे लागू करने से रोक सकते है. साथ ही यदि उन्हें लगता हैं तो आदिवासियों के अनुकूल कानून बना भी सकते हैं ,लेकिन आज तक पूरे देश मे किसी राज्यपाल ने इस अधिकार का उपयोग नही किया. एसी ,स्थिति में यदि आदिवासी संघठन अपने गांव मे कानून की घोषणा कर रहे है तो गलत नहीं क्या है .

जो गलत है वो स्वीकार्य नहीं लेकिन सरकारों को भी सोचना पड़ेगा कि जो कानून संसद और संविधान ने आदिवासियों को प्रदान किये है वो उन्हें मानना ही होगा .

छतीसगढ के प्रमुख आदिवासी नैता अरविंद नेताम एक बार कह रहे थे की जगदलपुर ने 7 कलेक्टर , एसपी और कमिश्नर की बैठक आदिवासी नोजवानो ने प्रशाशन को पूरा संविधान पढा दिया था जो वे लगभग नहीं जानते थे .

संविधान को जानियें क्योकि की हम जानते है कि कानून क्या कहता है .

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