आज के संदर्भ में : पोर्नोग्राफी का आधार है रंगभेद,पुंसवाद और मुनाफा.: जगदीश्वर चतुर्वेदी .

आज के संदर्भ में : पोर्नोग्राफी का आधार है रंगभेद,पुंसवाद और मुनाफा.: जगदीश्वर चतुर्वेदी .

आज के संदर्भ में : पोर्नोग्राफी का आधार है रंगभेद,पुंसवाद और मुनाफा.: जगदीश्वर चतुर्वेदी .

16.04.2018

संयुक्त राष्ट्र संघ के खोजी-शोधार्थी नजत माज़िद माल्ला के अनुसार इंटरनेट पर 40 लाख से ज्यादा बेवसाइट हैं जहां पर बच्चों पर बनी पोर्नोग्राफी ,सेक्सुअल शोषण,बाल वेश्यावृत्ति आदि की सामग्री और इमेज मिलती हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि पोर्न बेवसाइट की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है।

 

एक ब्रिटिश इंटरनेट वाच ग्रुप की रिसर्च के आधार यह तथ्य सामने आया है कि सन् 2003 से 2007 के बीच में जो इमेजें नेट पर दिखाई गयी हैं उनमें बर्बर बलात्कार,बंधक,मुख मैथुन और इसी किस्म के अनाचार को दर्शाया गया। आंकड़े बताते हैं कि इंटरनेट पर किसी भी एक समय में साढ़े सात लाख लोग बाल पोर्नोग्राफी का इस्तेमाल करते हैं। इंटरनेट चाटरूम एक बड़ा जरिया है बाल पोर्नोग्राफी का। अमेरिका के नेशनल सेंटर आन मिसिंग एंड एक्स्प्लॉयटेड चिल्ड्रन संगठन के अनुसार 83 प्रतिशत बाल पोर्न रखने वालों के पास 6-12 साल की उम्र के बच्चों पर बनी पोर्न पायी गयी हैं। 39 प्रतिशत के पास 3-5 साल उम्र के बच्चों पर बनी पोर्न मिली हैं।19 प्रतिशत के पास 3 साल से कम उम्र के बच्चों पर बनी बाल पोर्नोग्राफी मिली हैं। माल्ला ने यह भी कहा कि पोर्न उद्योग 3 से 20 बिलियन डॉलर की कमाई कर रहा है। माल्ला ने कहा कि विभिन्न देशों को बाल पोर्न से संबंधित पोर्नोग्राफी बेवसाइट के बारे में तेजी से सूचनाओं का आदान-प्रदान करना चाहिए। जिससे उन्हें जल्दी बंद किया जा सके।

पोर्नोग्राफी को लेकर अमेरिकी मीडिया में खूब हल्ला मचता रहता है। अमेरिका के छह राज्यों में पोर्नोग्राफी दिखाए जाने के खिलाफ कड़े कानून भी हैं इसके बावजूद इंटरनेट से लेकर केबल टेलीविजन पर पोर्नोग्राफी का अबाध प्रदर्शन जारी है। कहीं पर भी अमरीकी प्रशासन और पुलिस सक्रिय नजर नहीं आती। स्थिति इतनी खराब है कि अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि हार्डकोर पोर्न न दिखाए जाएं। ऐसे पोर्न न दिखाए जाएं जिनमें सीधे संभोग करते दिखाया जाता है। इस आदेश के बावजूद अमेरिका में पोर्न का धंधा और प्रसारण खुलेआम हो रहा है। आखिर इसका प्रधान कारण क्या है ? अमेरिकी नस्लवाद,पुंसवाद और मुनाफा।

अमेरिका की प्रसिद्ध नारीवादी आंद्रिया द्रोकिन ने ‘भाषा, समानता और अपकार: पोर्नोग्राफी का स्त्रीवादी कानूनी परिप्रेक्ष्य और घृणा का प्रचार'(1993) में लिखा है कि
‘‘ मिनीयापोलिस में कुछ बड़े पोर्नोग्राफर है, कुछ भयानक जातिवादी सेंट पॉल में है और दोनों ही शहरों में कुछ गंभीर नागरिक भी हैं जो पोर्नोग्राफी व जातिवाद को समाप्त करना चाहते है। यह अध्यादेश उस राजनीतिक संस्कृति की उपज था जो लोगों के खिलाफ किसी भी प्रकार की क्रूरता के खिलाफ थी।’’

‘‘सन् 1983 में कैथरिन और मुझे आसपास के सक्रिय कार्यकर्त्ताओं द्वारा स्थानीय कमिटी मीटिंग की जाँच करने के लिए कहा गया। यह मिनीयापोलिस का गरीब, अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों का छोटा सा क्षेत्र था। नगर परिषद के अंतर्गत पोर्नोग्राफी कई क्षेत्रों में फलफूल रही थी। वे विगत सात वर्षों से इन क्षेत्रों के कानून एवं नीतियों से लड़ रहे हैं। जिनके समर्थन से पोर्नोग्राफी ने आसपास के जीवन को नारकीय बना दिया है। जरूरी है कि आसपास की इन गतिविधियों को खारिज किया जाए इससे पोर्नोग्राफी को झेल रही निर्धन, काली जनता प्रसन्न होगी। क्योंकि अमीर श्वेतों को छोड़कर उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा हैं।’’

द्रोकिन ने रेखांकित किया कि पोर्न के जरिए औरतों के खिलाफ फैलायी जा रही घृणा को खत्म करने और पोर्न के खिलाफ कड़े कानून बनाने और फिर उसे लागू कराने के लिए स्थानीय जनता को जागृत करना और संगठित करना बेहद जरूरी है।

द्रोकिन ने आगे लिखा है कि ‘‘ ये कार्यकर्त्ता हमारे पास आए और उन्होंने रेखांकित करते हुए कहा: हम जानते है कि यहाँ का सबसे बड़ा मुद्दा स्त्री के प्रति घृणा है। हम इसके लिए कुछ करना चाहते है, हम क्या कर सकते है ? वे जानते थे उन्हें क्या करना है। उन्होंने मुझे और मैकिनॉन को ही नहीं पूरे शहर को संगठित किया। स्त्री घृणा पर आधारित पोर्नोग्राफी के खिलाफ पूरा शहर एकजुट हो गया। गरीब, हर वर्णं के लोग स्त्री जीवन के पक्ष में खड़े होने लगे। अमेरिका के एक शहर में राजनीतिक नारीवादी कार्यकर्त्ताओं का जन सैलाब तैयार हो गया जिसमें मजदूर स्त्रियाँ, नई व पुरानी वेश्याएँ, शिक्षाविद्, लेस्बियन, छात्रों के साथ लैंगिक दुर्व्यवहार के पीड़ितों की छोटी सेना भी शामिल थी। इन्होंने नगरपालिका नागरिक अधिकार कानून में पोर्नोग्राफी के विरूद्ध नया प्रावधान लाने की माँग की। पोर्नोग्राफी युक्त लिंग भेद को स्त्री के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन माना गया। कैथरिन और मैंने अध्यादेश में पोर्नोग्राफी पर अलग, स्वायत्त कानून की माँग की।’’
‘‘यह अध्यादेश औचित्यपूर्ण, वाजिब था, वंचितों तथा शोषितों के पक्ष में था इसलिए इसे व्यापक समर्थन मिला। उच्च से निम्न और निम्न से उच्च सभी वर्गों के लोग इसके साथ थे। क्योंकि यह पोर्नोग्राफी के नारी केंद्रित घृणा, कट्टरतावाद, स्त्री के प्रति दुश्मनी, क्रोध, शोषण के विरोध में था। ऐसा नारी इच्छा के प्रति हमारे बदलते ज्ञान व अनुभव के कारण हो सका। महिला को जब कानून का साथ, सम्मान, शक्ति, अर्थपूर्ण नागरिकता दी जाती है तो पोर्नोग्राफरों की स्वायत्तता समाप्त होने लगती है, उनपर अंकुश लग जाता है। यदि वह कानून द्वारा संरक्षित है तो कोई फर्क नही पड़ता कि पोर्नोग्राफी या पोर्नोग्राफर या उनके ग्राहक उसका कितना तिरस्कार करते हैं। कानून उसका अधिकार है। इसका इस्तेमाल कर वे दलालों और ग्राहकों से कह सकती है: हम तुम्हारा उपनिवेश नही हैं, तुम हमारे मालिक नहीं, न ही हम तुम्हारे अधिकार-क्षेत्र का हिस्सा हैं। इस कानूनी प्रावधान द्वारा वह अपनी इच्छा जाहिर कर सकती है: मुझे यह नहीं चाहिए, मुझे यह नही पसंद, यह कष्टप्रद है, यह बल-प्रयोग कामुक नही है, मैं दूसरों की भाषा नही बनना चाहती, मैं मातहत बनने से इंकार करती हूँ, मैं बोलना चाहती हूँ, मैं अपने लिए बोलना चाहती हूँ, मैं अदालत में तुमसे बात करूँगी और तुम मुझे सुनोगे।’’

पोर्न देखते हुए भूल जाते हैं कि इसमें औरत के प्रति गहरी घृणा और अमानवीयता भरी हुई है। द्रोकिन ने लिखा ‘‘हम चाहते है कि पोर्नोग्राफी में औरतों के साथ की गयी अमानवीयता प्रतिबंधित की जाए। सामान्यतया पोर्नोग्राफरों में व्याप्त नारी-नफ़रत के भाव का अनुकरण हमारी वैधानिक व्यवस्था भी करती है। यह व्यवस्था गहरे रूप में लिंग भेद एवं नारी देह की घृणा से प्रेरित है। मानो स्त्री का होना ही नफ़रत करने के लिए पर्याप्त है। साथ ही हमसे यह अपेक्षा भी की जाती है कि हम झूठ बोलें: ‘हमें कोई नुकसान नहीं पहुँचाया गया है।’ ‘मर्सी’ में मेरा एक चरित्र है आंद्रिया, जो कहती है कि कानून के सामने जाने से पहले तुम्हें साफ होना होगा, पवित्र होना होगा। इस अर्थ में कोई भी पीड़ित स्त्री न तो साफ़ है, न ही पवित्र। जब भी बलात्कार के अभियोग को लेकर हम अदालत गए हमें सबसे पहले अपवित्र माना गया। निश्चित तौर पर पोर्नोग्राफी के धंधे में जबरन लाई गई औरतें, सड़कों पर नीलाम औरतें, घरों में मारपीट कर कामुक उत्तेजना के लिए इस्तेमाल की गई औरतें पवित्र नहीं हो सकतीं। स्त्री जब कभी अपने कानूनी अधिकार का उपयोग करती है या उसे अवसर प्राप्त होता है तो ऐसे समय में उसे पवित्र होने की कोई ज़रूरत नही है। वह पूरे सम्मान के साथ साधिकार कह सकती है कि मैं भी हूँ और इसीलिए मैं प्रतिरोध व्यक्त करती हूँ।’’

आंद्रिया द्रोकिन ने ‘भाषा, समानता और अपकार: पोर्नोग्राफी का स्त्रीवादी कानूनी परिप्रेक्ष्य और घृणा का प्रचार'(1993) में लिखा है, ‘‘जब मिनीयापोलिस की नगर समिति ने इस अध्यादेश को पास करते हुए कहा, स्त्रियों का भी अस्तित्व है, उनका महत्व है, वे अपनी लड़ाई लड़ना चाहती हैं। जो उन्हें चाहिए हम देंगे। इस बार कानून नारी-इच्छा के पक्ष में तथा पोर्नोग्राफी के विरोध में खड़ा हुआ। जो औरतें इस विशेषाधिकार का प्रयोग करना चाहती थीं उनसे अनेकानेक नए विचार सामने आए। पोर्नोग्राफी द्वारा प्रताड़ित स्त्रियों की मर्मान्तक तकलीफों के अनुभवों ने इस कानून को अधिक स्पष्ट और कारगर बनाया। इस अध्यादेश में उनकी प्रतिरोध की इच्छा व्यक्त हुई। सहने की, जीने की विशाल ताकत ने कानूनी अधिकार का रूप ले लिया।’’

‘‘इस विशेषाधिकार का उपयोग करती औरतें कहेंगी, मैं वह हूँ जिसने बहुत सहन किया है, मैं जीवित बच गई हूँ, मेरा भी महत्व है, मैं बहुत कुछ जानती हूँ, और जो मैं जानती हूँ उसका बड़ा महत्व है, अर्थवत्ता है, और यह तुम जैसे दलालों को न्यायालय में पता चलेगा। मैं अपनी जानकारियों को तुम्हारे विरूद्ध इस्तेमाल करूँगी। और तुम मेरे ग्राहक, मैं तुम्हारे बारे में भी मेरे पास पक्की जानकारी है जिसका उपयोग मैं करूँगी। मैं तुम्हें तब से जानती हूँ जब तुम मेरे शिक्षक, मेरे पिता, मेरे वकील, मेरे डॉक्टर, मेरे भाई, मेरे पुरोहित थे। अब मैं जो जानती हूँ उसका इस्तेमाल करूँगी।’’

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पोर्नोग्राफी में ’Fuck Me’ का नारा ‘Hate Me’ का जनक है-

इंटरनेट की गतिशीलता और बदले नेट संचार के आंकड़े बड़े ही दिलचस्प हैं। विश्व स्तर पर इंटरनेट के यूजरों की संख्या 1.6 बिलियन है। इसमें एशिया का हिस्सा आधे के करीब है। एशिया में 738 मिलियन इंटरनेट यूजर हैं। इसमें सबसे ज्यादा यूजर चीन के हैं। फेसबुक के 500 मिलियन सक्रिय यूजर हैं। ये लोग संदेश ले रहे हैं और दे रहे हैं। इनके संदेशों की संख्या अरबों-खरबों में है। इसी तरह ट्विटर के यूजरों की संख्या भी करोड़ों में है। ट्विटरों के संदेशों की अब तक की संख्या 10 बिलियन है। यू ट्यूब में दो बिलियन वीडियो रोज देखे जाते हैं।
इंटरनेट की उपरोक्त गति को ध्यान में रखकर देखें तो पाएंगे कि पोर्नोग्राफी देखने वालों की गति क्या होगी ? पोर्नोग्राफी बेवसाइट पर एक पदबंध है जिसका व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है और वह है ‘‘Fuck Me Look’’ । इस पदबंध को पढ़कर लग सकता है कि इसका पोर्न के संदर्भ में ही प्रथम इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है। औरत का तो विज्ञापन में कार से लेकर ब्लेड तक इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसी वस्तुओं के विज्ञापन में औरत रहती है जिसे औरतें इस्तेमाल नहीं करतीं।
संस्कृति और मासकल्चर की समस्या यह है कि ये दोनों मानकर चलते हैं कि पुरूष हमारी संस्कृति है,पुंसवाद हमारी संस्कृति है। पुरूष ही हमारी संस्कृति का समाजीकरण करता है। इसी पुरूष के ऊपर ‘Fuck Me’ के नारे के जरिए बमबारी हो रही है। इस नारे के तहत विजुअल इमेजों में कहा जा रहा है कि तुम मेरे शरीर के मालिक हो, स्त्री शरीर के हकदार हो।

पुरूष से कहा जा रहा है कि तुम बलात्कार या स्त्री उत्पीड़न के आरोपों को गंभीरता से न लो क्योंकि मैं तुम्हें अपना शरीर भेंट कर रही हूँ। फ़र्क इतना है कि पोर्न बेवसाइट में ‘Fuck Me’ कहने वाली औरत बाजार या गली में टहलती हुई कहीं पर नहीं मिलती।
इसी तरह हार्डकोर पोर्नोग्राफी बेवसाइट में गुप्तांगों का वस्तुकरण होता है, वहां पर स्त्री का सेक्सी लुक सभ्यता को नरक के गर्त में ले जाता है। यह संभावना है कि पोर्न के देखने से बलात्कार में बढ़ोतरी हो यह भी संभव है पोर्न का यूजर सीधे बलात्कार न भी करता हो। लेकिन यह सच है कि पोर्न गंदा होता है और यह दर्शक के सांस्कृतिक पतन की निशानी है।

जब तक कोई युवक पोर्न नहीं देखता उसकी जवानी उसके हाथ में होती है। वह अपनी जवानी का मालिक होता है। अपनी कामुकता का मालिक होता है। लेकिन ज्योंही वह पोर्नोग्राफी देखना आरंभ करता है उसका अपनी जवानी और कामुकता पर से नियंत्रण खत्म हो जाता है। अब ऐसे युवक की जवानी पोर्नोग्राफी के हवाले होती है। उसकी जवानी की ताकत का स्वामित्व पोर्नोग्राफी के हाथों में आ जाता है और इस तरह एक युवा अपनी जवानी को पोर्नोग्राफी के हवाले कर देता है। वह पोर्न देखता है, खरीदता है।
पोर्न बदले में उसके सेक्स के बारे में संस्कार,आदत, एटीट्यूट और आस्था बनाती है। युवा लोग नहीं जानते कि वे अपनी जवानी की शक्ति पोर्न के हवाले करके अपनी कितनी बड़ी क्षति कर रहे हैं। जवानी उनकी कामुक भावनाओं का निर्माण करती है। उनकी कामुक पहचान बनाती है

जो लोग कहते हैं कि पोर्न के जरिए शिक्षा मिलती है,सूचनाएं मिलती हैं। वे झूठ बोलते हैं। पोर्न के देखने के पहले युवक का दुनिया के बारे में जिस तरह का नजरिया होता है वह पोर्न देखने के बाद पूरी तरह बदल जाता है। पोर्न देखने वाला सिर्फ स्वतः वीर्यपात करता रहता है और उससे ज्यादा सेक्स पाने की उम्मीद लगाए रहता है।
पोर्न की इमेजों में दुनिया,औरत,मर्द,कामुकता ,आत्मीयता ,शारीरिक लगाव आदि के बारे में कहानी बतायी जाती हैं। लेकिन पोर्न की सारी इमेजों से एक ही संदेश अभिव्यंजित होता है वह है घृणा। यह कहना गलत है पोर्न से प्रेम पैदा होता है। गेल डेनिश ने इसी संदर्भ में लिखा था कि पोर्न से प्रेम नहीं घृणा अभिव्यंजित होती है। पोर्न देखकर औरत के प्रति प्रेम नहीं घृणा पैदा होती है। पुरूष औरत के शरीर से घृणा करने लगता है। उसे तो वह शरीर चाहिए जो पोर्न स्टार का है।वैसा सेक्स चाहिए जैसा पोर्न में दिखाया जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ’Fuck Me’ का नारा ‘Hate Me’ की विचारधारा की सृष्टि करता है।
आंद्रिया द्रोकिन ने इस बात पर लिखा है कि ”जब कोई औरत या लड़की के सामान्य जीवन को देखता है तो वह वस्तुत: उनकी क्रूर स्थितियों को देख रहा होता है। हमें मानना पड़ेगा कि सामान्य जीवन में चोट लगना आम बात है, यह व्यवस्था का हिस्सा है, सत्य है। हमारी संस्कृति ने भी इसे स्वीकार किया है। इसका प्रतिरोध करने पर हमें दंड मिलता है। गौरतलब है कि यह तकलीफ देना, नीचे ढकेलना, लिंगीय क्रूरता आदि दुर्घटनाएँ या गलतियाँ नहीं वरन् इच्छित कार्य व्यापार हैं। हमें अर्थहीन व निर्बल बनाने में पोर्नोग्राफी की बड़ी भूमिका है। यह हमारे दमन, शोषण तथा अपमान को सहज और अनिवार्य बनाती है।’
द्रोकिन ने यह भी लिखा है कि ‘‘पोर्नोग्राफर हमारे शरीर का उपयोग भाषा के रूप में करते हैं। वे कुछ भी कहने या सम्प्रेषित करने के लिए हमारा इस्तेमाल करते हैं। उन्हें इसका अधिकार नहीं है। उन्हें इसका अधिकार नही होना चाहिए। दूसरी बात, संवैधानिक रूप से भाषायी पोर्नोग्राफी की रक्षा करना कानून का निजी हित में उपयोग करना है। इससे उन दलालों को खुली छूट मिल जाएगी जिन्हें कुछ भी कहने के लिए हमारी जरूरत होती है। वे दलाल मनुष्य है, उन्हें मानवाधिकार प्राप्त है, वैधानिक रक्षण का सम्मान प्राप्त है। हम चल संपत्ति है, उनके लिए रद्दी से ज्यादा नहीं।’’

 

आंद्रिया द्रोकिन ने लिखा कि पोर्न के लिए औरत महज भाषिक प्रतीक मात्र है। पोर्न की भाषा दलाल की भाषा है। उन्हीं के शब्दों में ‘‘हम मात्र उनके भाषिक प्रतीक हैं जिन्हें सजाकर वे सम्प्रेषित करते हैं। हमारी पहचान दलालों की भाषा में निर्मित होती है। हमारा संविधान भी हमेशा से उन्हीं के पक्ष में खड़ा है, वही जो लाभ कमानेवाले सम्पत्ति के मालिक हैं। चाहे सम्पत्ति कोई व्यक्ति ही क्यों न हो। इसका कारण कानून और धन, कानून और पॉवर का गुप्त समझौता है। दोनों चुपचाप एक दूसरे के पक्ष में खड़े हैं। कानून तब तक हमारा नही जब तक वह हमारे लिए काम नही करता। जब तक हमारा शोषण नहीं रोकता, हमें मानव होने का सम्मान नही देता।’’

जैसा कि सभी जानते हैं कि अमेरिका पोर्न का मूल स्रोत है। सारी दुनिया में अमेरिका ने पोर्न संस्कृति का प्रचार-प्रसार करके एक नए किस्म की सांस्कृतिक प्रतिक्रांति की है। द्रोकिन ने लिखा है , ‘‘ अमेरिका में पोर्नोग्राफी उन लोगों का इस्तेमाल करती है जो संविधान के बाहर छिटके हुए हैं। पोर्नोग्राफी श्वेत औरतों का चल सम्पत्ति के रूप में इस्तेमाल करती है। यह अफ्रीकन-अमेरिकन महिलाओं का दास की तरह उपयोग करती है। पोर्नोग्राफी बहिष्कृत पुरुषों (अफ्रीकन-अमेरिकन दासों) का उपयोग कामुक वस्तुओं की तरह जानवरों द्वारा बलात्कार के लिए करती है। पोर्नोग्राफी वृद्ध श्वेत पुरुषों पर नही बनती। ऐसा नही हैं। कोई उन तक नही पहुँच पाता है। वे हमारे साथ ऐसा कर रहे हैं, या उन लोगों की रक्षा कर रहे है जो हमारे साथ दुर्व्यवहार करते हैं। उन्हें इसका फायदा मिलता है। हमें उन्हें रोकना होगा।’’

समाज में पोर्न तब तक रहेगा जब तक औरत को संपत्ति माना जाएगा और समाज में संपत्ति का महिमागान चलता रहेगा। संपत्ति पर आधारित संबंधों को नियमित करने में धर्म और मीडिया दो बड़े प्रचारक और राय बनाने वाले हैं। इसी संदर्भ में आंद्रिया द्रोकिन ने लिखा-
‘‘ज़रा सोचें किस तरह विवाह स्त्री को नियमित करता है, किस प्रकार औरतें कानून के अंतर्गत संपत्ति मात्र हैं। बीसवीं शती के आरम्भिक वर्षों के पहले यह स्थिति ऐसे ही बरकरार थी। चर्च महिलाओं को संचालित करता था। जो मर्द स्त्री को अपनी वस्तु समझते थे उनके खिलाफ प्रतिरोध चल रहा था। और अब ज़रा पोर्नोग्राफी द्वारा समाज के स्त्री नियमन की नई व्यवस्था पर गौर करें, यह औरतों के खिलाफ आतंकवाद का लोकतांत्रिक प्रयोग है। रास्ते पर चल रही हर स्त्री को इसके द्वारा यही संदेश दिया जाता है कि उसकी अवस्था नज़रे नीची किए हुए जानवर के समान है। वह जब भी अपनी ओर देखेगी उसे पैर फैलाए लटकी हुई स्त्री दिखेगी। आप भी यही देखेंगे।’’

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