डॉ. भीमराव अंबेडकर : राज्य समाजवाद बनाम संसदीय व्यवस्था: 14 अप्रेल जन्मदिवस पर विशेष .

14 अप्रेल 2018 

मनीष श्रीवास्तव

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डॉ. अम्बेडकर प्रारंभ में राज्य समाजवाद के माध्यम से आदर्श समाज की स्थापना के पक्षधर थे। स्वतंत्र भारत के संविधान में दलितों एवं अल्पसंख्यकों के हितों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से डॉ. अम्बेडकर ने सरकार को एक ज्ञापन दिया था, जो बाद में ‘स्टेट एण्ड माइनॉरिटीज_ States and minorities’ (1947) नाम से एक लघु पुस्तिका के रूप में प्रकाशि‍त हुआ था। इस ज्ञापन में अन्य बातों के साथ डॉ. अम्बेडकर ने संविधान में राज्य समाजवाद संबंधी निम्न मुख्य व्यवस्थाओं को सम्मिलित किये जाने का प्रस्ताव किया था, जिससे कि समाज के बहुसंख्यक कमजोर वर्ग के लोगों को आर्थिक शोषण के विरूद्ध सुरक्षा प्रदान की जा सके-

1. सभी मूलभूत उद्योग या जिन्हें इस रूप में घोषित किया जा सकता है, राज्य स्वामित्व के अंतर्गत हों और उन्हें राज्य द्वारा चलाया जाये। 

2. वे सभी उद्योग भी जो मूलभूत उद्योग तो नहीं है किन्तु बुनियादी उद्योग हैं, राज्य के ही अधीन हों और राज्य द्वारा संचालित किए जायें। 

3. बीमा पर राज्य का अधिकार हो। 

4. कृषि राज्य उद्योग हो।

डॉ. अम्बेडकर राज्य समाजवाद की योजना के अंतर्गत बेहतर उत्पादन की दृष्टि से कृषि और उद्योग दोनों क्षेत्रों में पूंजी निवेश का दायित्व राज्य व्यवस्था पर देने के हिमायती थे। उन्होंने कृषि उद्योग को सामूहिक कृषि के रूप में संचालित करने हेतु आवश्यक संवैधानिक व्यवस्था किये जाने की सिफारिश की थी। उनका कहना था कि टेनेन्सी एक्ट कृषि में आवश्यक सुधार लाने में नाकामयाब रहे हैं। इन कानूनों से आगे भी दलितों को कोई लाभ नहीं पहुंचने वाले हैं। औद्योगिकरण के द्रुतगामी विकास की दृष्टि से राज्य समाजवाद आवश्यक है। व्यक्तिगत उद्यम से समानता आधारित समाज स्थापित नहीं हो सकता है। व्यक्तिगत उद्यम को बढ़ावा देने से यूरोप जैसे पूंजीवाद समाज की स्थापना होगी। इससे आर्थिक विषमता और बढ़ेगी।

अम्बेडकर का सोचना था कि राज्य समाजवाद से मालिकों व पूंजीपतियों के हाथों श्रमिकों का शोषण बंद किया जा सकता है।

किन्तु बाद में डॉ0 अम्बेडकर ने यह महसूस किया कि भारत जैसे विविध संस्कृति, जाति और वर्ग आधारित समाज में अकेले राज्य आधारित समाजवाद की अवधारणा से प्रजातंत्र का निर्माण संभव नहीं हो सकता है। इसलिये आगे चलकर उन्होंने राज्य समाजवाद पर जोर देना छोड़ दिया और समाज के आर्थिक ढांचे के स्वरूप के निर्धारण का दायित्व लोगों पर छोड़ना मुनासिब समझा। क्योंकि संविधान के माध्यम से इसके स्वरूप का यदि एक बार निर्धारण हो जाता तो समय व परिस्थिति के अनुकूल इसमें परिवर्तन ला पाना लोगों के लिए कठिन हो जाता। इसी के फलस्वरूप बाद में संसदीय प्रजातंत्र व्यवस्था का निर्माण संभव हो सका। इस तरह अम्बेडकर ने हमेशा समाज की भलाई सोची। वे स्वयं सुधार की भावना से प्रेरित होकर सामाजिक उत्थान के कार्य करते रहे।

डॉ0 अंबेडकर ने भारतीय संविधान में इस बात का विषेष रूप से उल्लेख किया गया है कि राज्य जनता के निम्न आर्थिक अधिकारों तथा समाज-सुरक्षा के सिद्धान्तों के परिपालन की पूरी-पूरी व्यवस्था करें (अनुच्छेद 36-51)- 

1. जीविका के पर्याप्त साधन। 

2. धन का न्यायोचित वितरण। 

3. समान कार्य के लिये समान वेतन। 

4. बाल श्रमिकों तथा प्रौढ़ श्रमिकों को सुरक्षा। 

5. रोजगार। 

6. चौदह वर्ष की आयु तक के बालक-बालिकाओं के लिये निःशुल्क तथा अनिवार्य शि‍क्षा। 

7. बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी असमर्थता तथा अन्य प्रकार की अशक्तता की स्थिति में सरकारी सहायता। 

8. निर्वाह योग्य मजदूरी। 

9. काम की शर्तें जिनके अनुसार उत्तम जीवन स्तर, अवकाष का पूर्ण उपयोग और सामाजिक तथा सांस्कृतिक अवसर प्रदान करने की व्यवस्था हो। 

10. पुष्टि पोषण के स्तर में वृद्धि तथा स्वास्थ्य सुधार।

डॉ. अम्बेडकर का आर्थिक चिन्तन जीवन के यथार्थ अनुभव से प्रेरित था। वे मूलतः समाजशास्त्री थे। उनके अध्ययन, अध्यापन और लेखन की शुरूआत अर्थशास्त्र से हुई। उनका मानना था कि यदि परिस्थितियोंवश उन्हें सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्रों में कार्य करने को विवश नहीं होना पड़ता, तो वे अर्थशास्त्र का शि‍क्षक बने रहना पसन्द करते।

डॉ0 अम्बेडकर ने अपने संपूर्ण जीवन में सामाजिक समानता लाने की दिशा में कार्य किया। इसके लिए उन्होंने कभी कोई समझौता किये बिना महत्वपूर्ण फैसले लिए। उन्होंने घोर संघर्ष कर गहन अध्ययन किया। अपने संपूर्ण ज्ञान का उपयोग सदैव समता आधारित समाज के निर्माण में किया। आज वे युवाओं के प्रेरणास्त्रोत हैं और उनका नाम भारतीय महापुरूषों में अग्रणी रूप से लिया जाता है।

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