राहुल सांकृत्यायन दर्शन, इतिहास और आत्मकथा की समस्याएं- : जगदीश्वर चतुर्वेदी : 125 वीं जयंती 9 अप्रेल .

9.04.2018

हिन्दी के विकास में जिन महापुरुषों का महान योगदान है उनमें राहुल सांकृत्यायन प्रमुख हैं। नामवर सिंह ने अपने तरीके से उनको याद किया है और उनके बारे में जो बातें कही हैं वे काफी मूल्यवान हैं। नामवर सिंह ने उनकी तीन विशेषताएं बतायी हैं,प्रथम, पुनर्जन्म की धारणा में अविश्वास,दूसरा, निरन्तर कर्म की धारणा में गहरी आस्था, तीसरा, वे कभी उत्तेजित नहीं होते थे,हमेशा शान्त,धीर और सहज बने रहते थे। इसी प्रसंग में राहुल की किताब “मेरी जीवन यात्रा” के आरंभ में उद्धृत बुद्ध वचन का नामवर सिंह ने जिक्र किया है। वचन इस प्रकार है – “ कुल्लुपमं देसेस्यामि वो भिक्खवे धम्मं / तरणत्थाय नो गृहणत्थाय। ” अर्थात् “ हे भिक्षुओ! यह धर्म मैं छोटी सी नाव के समान दे रहा हूँ पार उतरने के लिए। पार उतरने के बाद,सिर पर रखकर ढोने के लिए नहीं।” नामवरजी ने इस पर लिखा ‘ अपने विचारों के बारे में हम लोगों को कितना आग्रह-दुराग्रह होता है। बुद्ध सिर्फ इसलिए बड़े थे कि उन्होंने उतना बड़ा क्रांन्तिकारी धर्म दिया। सद्-धर्म दिया बुद्ध ने। यह ‘ सद्-धर्म’ उस नाव के समान है जिस नाव के द्वारा ,नदी पार की,उसे वहीं छोड़ दिया। यह नहीं कि पार गए,रेती पर आप चल रहे हैं फिर भी,उस भारी नाव को सिर पर उठाए हुए,दबे हुए चले जा रहे हैं कि फिर हम इसका इस्तेमाल करेंगे। उन्होंने कहा छोड़ दो इसे। जब सब कुछ क्षणिक है तो यह धर्म ही कौन मरत्व पीकर आया है। इसे भी छोड़ दो। जिस हद तक काम आए ,इस्तेमाल करो।काम जब न आए ,छोड़ दो उसको। जो बेहतर चीज हो ,उसे ले लो।’ ( आलोचना और विचारधारा, पृ.260-61)
राहुल पर विचार करते समय हमें व्यापक फलक पर रखकर सोचना होगा,उन्होंने जिस तरह का काम किया है उसके बारे में सीमित दायरे में सोचने से बचना होगा। नामवरजी ने बोल्गा से गंगा,कनैला की कथा को पढ़ने पर जोर दिया और लिखा कि इन दोनों किताबों से सहज ही राहुल समझ में आ सकते हैं। नामवरजी ने लिखा है , ‘ लेकिन उस पांडित्य की सहजता देखनी हो और उनके विचारों को समझना हो तो उसके लिए मैं आपसे निवेदन करूंगा कि केवल दो ही ग्रन्थ पढ़ें ।’ ये दो ग्रन्थ हैं, ‘बोल्गा से गंगा’ और ‘कनैला की कथा’ । हम कहना चाहते हैं कि विश्व की रुपरेखा,2.मानवसमाज,3.दर्शन-दिग्दर्शन,4.वैज्ञानिक भौतिकवाद ,5.कनैला की कथा,6.बोल्गा से गंगा , 7.भागो नहीं दुनिया को बदलो , इन किताबों को भी कायदे से पढ़ा जाना चाहिए।
इसके अलावा जिस तरह जीवनी साहित्य और आत्मकथा साहित्य सामने आया है उसकी ओर भी ध्यान देने की जरुरत है। राहुल ने कई बड़ी विभूतियों की जीवनी और अपनी आत्मकथा लिखकर जो पैमाना इस विधा का बनाया है उसे भी समझने की जरुरत है।
नामवरजी ने रेखांकित किया है , ‘ निरन्तर गतिशीलता और खुलापन सिर्फ एक बुद्धिजीवी-विचारक-लेखक के लिए ही नहीं,साधारण जन के लिए भी जरुरी है। साधारण जन को राहुलजी ने यही सन्देश दिया था।’ (वही,पृ.262) नामवरजी ने राहुल के बहाने कई मूल्यवान बातों का जिक्र किया है , उन्होंने लिखा है , ‘ हमारे यहाँ माना जाता है कि आप बात क्या कहते हैं,जितनी महत्वपूर्ण है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि बात कौन कह रहा है ? वह अधिकारी है या नहीं ? हमारे यहाँ उस अधिकारी का बहुत महत्व है।’(पृ.265)
नामवर सिंह ने राहुलजी पर विचार करते समय जिन बातों को मूल रुप से रेखांकित किया है उनमें सबसे महत्वपूर्ण बात है अपने अतीत,अपने धर्म के अतीत ,अपने परिवार के अतीत और अपने गांव के अतीत के प्रति आलोचनात्मक विवेक। यह विवेक उनके लेखन में उभरकर सामने आया है। नामवरजी ने इस नजरिए पर लिखा कि ‘ सत्य कथन भले ही हमारे विरुद्ध जाए,लेकिन हम सच ही बोलेंगे।झूठ नहीं बोलेंगे । राहुलजी की यह सत्यनिष्ठा थी जिसने कनैला गाँव की कथा लिखते हुए सच बताया।’
‘ करैला गाँव की कथा’ के बहाने गाँव के इतिहास,परंपरा,संस्कृतिबोध और उदात्त मानवीय पहलुओं को उजागर किया। नामवरजी ने इस कृति का मूल्यांकन करते हुए लिखा, ‘ राहुलजी का कहना था कि हर गाँव अपनी ही परम्परा देखे ।’
राहुलजी ने “कनैला की कथा” (1957) में विभिन्न कहानियों के जरिए सामाजिक इतिहास के उन पहलुओं पर रोशनी डाली है जिनको हम भूल गए हैं या अप्रासंगिक मानते हैं या जिन परंपराओं पर आए दिन हमले करते रहते हैं। खासकर बीसवीं सदी में मिश्रित संस्कृति,मिश्रित समाज और मिश्रित भाषा को विभिन्न तरीकों से निशाना बनाया गया। इन पर पुनरुत्थानवादियों से लेकर फंडामेंडामेंटलिस्टों के हमले हुए हैं। इस कृति की सभी कहानियों के केन्द्र में मिश्रित समाज और बहुलतावाद को बचाने का लक्ष्य प्रमुख रुप से व्यक्त हुआ है। इस कृति के प्राक्कथन में राहुलजी ने लिखा ‘ सत्य कल्पना से भी अधिक सुन्दर होता है। ’ यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से वे चीजें देखते हैं। वे कथा साहित्य का कल्पना के साथ-साथ सत्य को बताने के लिए इस्तेमाल करते हैं। उनके लिए सत्य महत्वपूर्ण है। “त्रिवेणी” कहानी में लिखा, ‘ भूमि पर पहले आने से कोई सदा के लिए अपना अधिकार कायम नहीं रख सकता।अधिकार का फैसला हथियार करता है।’ (कनैला की कथा,पृ.5) हथियारों के बल पर किरातों को निषाद हरा देते हैं और उनके पशुधन और अन्य चीजों पर कब्जा कर लेते हैं।
नामवरजी ने सही लिखा है ‘ राहुल के विचारों या उनकी किताबों से ज्यादा महत्वपूर्ण है-राहुल का जीवन,जीवन-यात्रा,जीवन-संघर्ष।’ (पृ.276) नामवरजी ने आधुनिकता के प्रसंग में राहुलजी के लेखन का विश्लेषम करते हुए कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।लिखा है, ‘ आजकल परम्परा बनाम आधुनिकता पर बहुत बहस होती है और ज्यादातर वे आधुनिकतावादी होते हैं,जिनका परम्परा से ठीक-ठाक परिचय तक नहीं है,फिर भी सबसे ज्यादा परम्परा के विरुद्ध मुखर वे ही दिखाई पड़ते हैं।किन्तु हमारी एक परम्परा रही है जिसमें राहुलजी आते हैं।’
‘ राहुलजी उन लोगों में थे जिनकी जड़ें परम्परा में गहरी थीं, इसलिए उनके लिए सम्भव हो सका ,जिसे हम विद्रोह कहते हैं। वह उस परम्परा के भीतर से पैदा हुआ। विद्रोह और विरोध के द्वारा ही उन्होंने परम्परा का पुनर्गठन किया।पूरे सम्मान के साथ,सादर के साथ,श्रद्धा के साथ।यही वजह है उनकी वाणी में शक्ति थी।’
नामवरजी ने सही लिखा है ,‘ आधुनिक हिन्दी कविता में नीत्से की सुनी-सुनायी बातों के आधार पर बहुत से लोग इसकी चर्चा करते हैं कि ईश्वर मर गया।जिसने ईश्वर का जीना नहीं जाना,वह ईश्वर के मरने की पीड़ा भी नहीं समझ सकता। उसी तरह जिसने परम्परा को नहीं जाना ,वह परम्परा के विरुद्ध एक खोखली आवाज उठाता है,तो उसका कोई अर्थ नहीं। इसलिए राहुलजी का विद्रोह परम्परा के भीतर से था और वे स्वतन्त्र बुद्धि को प्राप्त करने की कोशिश कर रहे थे। उस स्वतन्त्र बुद्धि को प्राप्त करने में राहुल ने निर्ममता के साथ अपना मूर्तिभंजन भी किया है।’
राहुलजी का नजरिया पूरी तरह से लोकतांत्रिक था इसलिए उन्होंने समानता और न्याय में न्याय को चुना। नामवरजी ने लिखा है, ‘ आगे जाने के लिए ,जब वे ‘जय यौधेय’ और ‘भागो नहीं,(दुनिया)बदलो’ लिख रहे थे ,तो उस सूत्र को कभी भूले नहीं,जिसका उल्लेख उसी ‘जीवनयात्रा’ में किया है, “ हमें इस समाज को बदलकर ऐसे समाज की स्थापना करनी है जिसका आधार न्याय और भातृभाव है।” किसी दर्शन से उन्होंने कलेश या कलीश या जार्गन शब्दजाल नहीं लिया।उन्होंने कहा –सामाजिक-न्याय,राजनीतिक-न्याय,आर्थिक न्याय,न्याय के अनेक रुप हैं। इसलिए ध्यान दें कि राहुलजी ने इसमें कहीं भी समानता का जिक्र नहीं किया है।’ नामवरजी ने लिखा ‘ राहुलजी ने बेहतर बनाने का जो मूल आधार रखा था उसमें एक है न्याय और दूसरा है भ्रातृभाव प्रवृत्ति। ऐसी बात वही कह सकता था,जो आदमी स्वतन्त्रचेता हो।स्वतन्त्रता ही इन तमाम चीजों की नींव है –बुनियाद है। मोटे तौर से राहुलजी फ्रांसीसी क्रांति का जो मूल दर्शन था,विचार था,उस भाषा में बात करते थे,लोक-सामान्य,लोक-समझ,साम्यवादी भाषा में बात करते थे।’
राहुलजी का मूल्यांकन करते हुए नामवरजी ने बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान खींचा है और यह पहलू अब तक सभी की आंखों से ओझल रहा है। नामवरजी ने लिखा है कि सरहप्पा के विवेचन और उद्घाटन के क्रम में राहुलजी ने विद्रोह पर नहीं करुणा को रेखांकित किया है। सरहप्पा के नजरिए की धुरी है करुणा। नामवरजी के अनुसार ‘ राहुलजी के समस्त साहित्य में देखें,जो आदमी न्याय और भ्रातृभाव के लिए संघर्ष कर रहा है ,उस मनुष्य के हृदय में अगाध करुणा थी।लेकिन दुश्मनों के लिए नहीं थी।उसके लिए,घृणा थी। क्रोध था । वह करुणा थी साधारण जनों के लिए ,उनके उद्धार के लिए,उनकी मुक्ति के लिए,उनके उत्थान के लिए ।इसलिए ‘भागो नहीं,(दुनिया)बदलो’ यह नारा अन्ततः उस मानवीय करुणा में परिणत होता है,जिस करुणा के बिना किसी भी प्रकार का विद्रोह,किसी भी प्रकार की क्रांति बंध्या होती है, बंजर होती है,शुष्क होती है,क्योंकि वह अमानवीय होती है,अमानुषिक होती है।’
नामवरजी ने सही रेखांकित किया है कि राहुल ने 19वीं सदी के नवजागरण में बौद्ध आयाम जोड़ा।करुणा को जोड़ा। ‘ करुणा केवल आँसू बहाने वाली नहीं है-न अपने पर ,न पराए पर।बल्कि यह वह करुणा है जिसका गहरा सूत्र वाल्मीकि के उस श्लोक से जुड़ा हुआ हैः
मा निषाद प्रतिष्ठाम् त्वमगमःशास्वती समाः।
यत्क्रौंच मिथुनादेक अवधिः काम मोहितम्।।’
दार्शनिक दृष्टिकोण के सवाल-
राहुल सांकृत्यायन के दार्शनिक नजरिए के बारे में हिन्दी में कभी कोई गंभीर विमर्श सामने नहीं आया,जबकि उन्होंने ” दर्शन दिग्दर्शन “ जैसी महत्वपूर्ण कृति लिखी। यह कृति 1942 में हजारीबाग के सेन्ट्रल जेल में लिखी और 1944 में इसका पहला संस्करण प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक का मार्क्सवादी दार्शनिक नजरिए से कोई संबंध नहीं है। इसमें उन्होंने अध्ययन की जो प्रणाली चुनी है उसका तरीका कुछ इस प्रकार है- दार्शनिक के जीवन का संक्षिप्त परिचय,उसके मूल विचारों का उल्लेख और कहीं –कहीं उन पर आलोचनात्मक तौर पर संक्षिप्त टिपप्णियां,इस तरह यह किताब विभिन्न दर्शनों का ब्यौरेबार लेखा-जोखा है। इस तरह की पद्धति कहीं से न तो ऐतिहासिक है और नहीं द्वंद्वात्मक है । इस कृति की मूल्यवान समझ यह है कि इसमें दर्शन को धर्म से पृथक् करके विवेचित किया गया है। साथ ही दर्शन और विज्ञान के संबंधों ,दर्शन और सामाजिक वर्गों के संबंधों का संक्षिप्त में जिक्र भी मिलता है। इसके अलावा दर्शन को वे राष्ट्रीय की बजाय विश्व परिप्रेक्ष्य में रखकर विवेचित करते हैं।
इस कृति का महत्व यह है कि इसमें राहुल ने प्रच्छन्नतः हेगेल के नजरिए को चुनौती दी है। हेगेल का मानना था पूर्वी देशों में दर्शन और धर्म में सहमेल है। राहुल सांकृत्यायन इस नजरिए को एकसिरे से खारिज करते हैं।यही हाल सर्वपल्ली राधाकृष्णन का था उन्होंने “ भारत में दर्शन” नामक कृति में दर्शन को आध्यात्मिकता से जोड़ा है.एम हिरियन्ना ने “भारतीय दर्शन की रुपरेखा” में इसी पर विचार करते हुए लिखा “ भारतीय दर्शन का लक्ष्य तर्क से परे पहुँचना है।” वे दर्शन को ‘विचार प्रणाली’ न मानकर ‘ जीवन प्रणाली” मानते हैं। इसके अलावा अनेक विचारकों ने भारतीय दार्शनिक प्रणाली को अपरिवर्तनीय माना है। यह भी माना कि भारत में तो अपरिवर्तनीय विचार परंपरा रही है। राहुल सांकृत्यायन ने इस नजरिए का “दर्शन-दिग्दर्शन” में खंडन किया है। इसी तरह साम्प्रदायिक और पुनरुत्थानवादी ताकतें भारतीय दर्शन की श्रेष्ठता,शुद्धता एवं अपरिवर्तनीयता पर बार बार जोर देती हैं। उनका भी इस कृति में खंडन मिलता है। इसके अलावा भारत में दर्शन की भाववादी व्याख्या करने वालों की भी लंबी सूची है। इसका भी इस कृति में जगह-जगह खंडन मिलता है।पर,वर्णन अधिकतर आदर्शवादियों का ही किया है।
आज हम भारतीय दर्शन की परंपरा का मूल्यांकन करते हैं तो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि दर्शन की कौन सी धारणा हमारे लिए प्रासंगिक है। खासकर धर्मनिरपेता,बुद्धिवाद और विज्ञानोन्मुख दृष्टिकोण के निर्माण में दार्शनिक परंपरा के कौन से तत्व आज भी हमारी मदद कर सकते हैं। इस प्रश्न को राहुल सीधे सम्बोधित नहीं करते। कौटिल्य के अनुसार वास्तविक दर्शन को ‘आन्वीक्षिकी’ कहते हैं।इसका अर्थ है कि दर्शन तर्कबुद्धि से संबद्ध है, वह बुद्धिसंगत विश्लेषण के लिए प्रत्यक्ष अनुभूति द्वारा प्रस्तुत आधार सामग्री को ही स्वीकार करता है। कौटिल्य के यहाँ वास्तविक दर्शन की दूसरी पहचान है धर्मनिरपेक्षता। वे मानते हैं कि दर्शन ब्रह्मविज्ञान में नहीं है।वह धर्मशास्त्र अथवा वेदज्ञान नहीं है। वह पूर्णरुपेण ज्ञान की एक स्वायत्त शाखा है। दर्शन की शाखा में कौटिल्य ने सांख्य,योग और लोकायत को रखा है।पर, बौद्ध,जैनमत,वेदान्त और मीमांसा पर वे चुप हैं।
राहुलजी ने जब धर्म और दर्शन में पार्थक्य स्थापित किया था तो सीधे भारतीय समाज में प्रचलित दार्शनिक प्रतिक्रियावाद को चुनौती दी।दर्शन और धर्म में पार्थक्य का कारण यह है कि दर्शन अपनी संज्ञानात्मक क्रिया में, अर्थात् यथार्थ रुप में वह सदैव विश्व के साथ समावेशन के साथ जुड़ा हुआ है।विश्व के वैचारिक समावेशन से आशय है प्रकृति,समाज एवं चिन्तन के वस्तुगत संज्ञान तथा ऐसे संज्ञान पर आधारित सिद्धान्तों का निर्माण करना। इसी तरह सिद्धान्त सामान्यीकृत अनुभव है,मनुष्य का सामान्यीकृत व्यवहार तथा उत्पादन का व्यवहार सामाजिक- ऐतिहासिक गतिविधि है।
“दर्शन-दिग्दर्शन” का मूल लक्ष्य है आधुनिककाल में मध्ययुगीनता के खिलाफ हस्तक्षेप करना। मध्ययुगीन भावबोध के मानने वाले बुद्धि को विश्वास के मातहत करके देखते हैं। उनके लिए बुद्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण है विश्वास या आस्था। इसके विपरीत राहुल ने इस कृति में बुद्धि को आस्था से पृथक् करके पेश किया है। दर्शन को धर्म से मुक्त किया है। वे दार्शनिक गलतियों को ज्ञानमीमांसीय परिघटना के रुप में देखते हैं। वे दार्शनिक गलतियों को दर्ज करने के साथ –साथ गलती की ऐतिहासिक रुप से अनित्य आवश्यकता,उसकी ज्ञानमीमांसीय जड़ों और वास्तविक अंतर्वस्तु के अध्ययन की पूर्वकल्पना को पेश करते हैं।
“दर्शन-दिग्दर्शन” से हमें राहुल सांकृत्यायन की भारतीय दर्शन परंपरा की अधूरी समझ का पता चलता है। मसलन्, ‘जिसे हम दर्शन कहते हैं ,वह वैदिक काल में दिखलाई नहीं पड़ता।’ उनके यहाँ दर्शन की परंपरा उपनिषद काल से आरंभ होती है और शंकर तक आकर खत्म हो जाती है। जबकि यह परंपरा नव्य-न्यायकाल तक जारी रहती है। यानी नव्य न्यायकाल के प्रतिनिधि गदाधर और उसके टीकाकारों तक यह परंपरा सत्रहवीं और 18वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक जारी रहती है। उल्लेखनीय है कि भारतीय दर्शन परंपरा में राहुल ने श्रीमद्भगवतगीता का जिक्र तक नहीं किया है। इसी तरह विशिष्टाद्वैत और द्वैत,शैव और शाक्त दर्शन, एकेश्वरवादी दर्शन और भक्ति आंदोलन के दार्शनिक चिंतकों का जिक्र नहीं करते। जबकि उपनिषदों, चार्वाक,गौतमबुद्ध,अजितकेशकंवल, मक्खलिगोशाल, काश्यप, प्रकुध, कात्यायन,वेलाट्ठिपुत्त,वर्धमान महावीर,कपिल, नागसेन,कणाद,गौतम अक्षपाद, जैनधर्म,पतंजलि,जैमिनी, बादरायण,असंग,धर्मकीर्त्ति, दिड़.गनाग,नागसेन,गौडपाद एवं शंकर के दार्शनिक मत का विवेचन किया है। वेदान्त के भाष्यकारों में वे शंकर,रामानुजीय,निम्बार्क, माध्व,राधाबल्लभी सम्प्रदायों एवं भाष्यकारों मात्र नामोल्लेख किया है। इस तरह की प्रस्तुति में अनेक असुविधाएं हैं। मसलन्, वेदान्त की ये प्रणालियां-रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत,माध्व का द्वैत,निम्बार्क का द्वैताद्वैत और बल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैत –ब्रह्म को ही इस जगत का अंतिम कारण मानती हैं। ये सभी आदर्शवादी दार्शनिक प्रणालियां हैं। किंतु शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित दर्शन की आदर्शवादी प्रणाली से ये मूलतःभिन्न हैं। इन सभी प्रणालियों का उदय शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त – जिसमें केवल ब्रह्म को यथार्थ माना गया था-के विरोध में हुआ है। दूसरे शब्दों में शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त जहाँ मनोवादी आदर्शवाद है,वहाँ ये सभी प्रणालियां वस्तुवादी आदर्शवाद पर आधारित हैं। इसके अलावा बौद्धदर्शन के पतन के संदर्भ में तंत्र की भूमिका को भी राहुलजी ने रेखांकित नहीं किया।
इसी तरह “दर्शन-दिग्दर्शन” में यूरोपीय परंपरा के विवेचन में भी काफी बड़ा असंतुलन है। मसलन्, वहां पर सत्रहवीं शताब्दी से दार्शनिकों का विवरण दिया है । इससे पूर्व की परंपरा का कोई विवरण नहीं है।भारतीय दर्शन मध्यकाल से आगे नहीं बढ़ता वहीं पर यूरोपीय दर्शन में 17वीं शताब्दी के पहले का जिक्र नहीं है। यूरोपीय दर्शन परंपरा के विवरण में भी राहुल ने सुसंगत नजरिए का परिचय नहीं दिया है। मसलन् ,देकार्त्त पर उन्होंने लिखा है ‘ द-कार्त्त पूरा लोकोत्तरवादी ,ईश्वर के इशारे पर ज़ड-चेतन को नचाने वाला मानता था”…” गंभीर विचारक होते हुए भी दकार्त्त मध्ययुगीन मानसिक बंधनों से अपने को आजाद नहीं कर सका था।’ और अपने दर्शन को सर्वप्रिय रखने के लिए भी वह धर्मवादियों का कोपभाजन नहीं बनना चाहता था। स्वयं द-कार्त्त के अपने वर्ग का स्वार्थ इसी में था कि धर्म और उसके साथ प्राचीन समाज व्यवस्था को न छेड़ा जाए।” राहुल सांकृत्यायन की इस धारणा का खंडन देकार्त्त की मुख्यकृतियों “विधि के विषय में तर्कणा”(1637) और “दर्शन के सिद्धांत”(1644) से होता है। वह तर्कबुद्धिवाद का प्रणेता था। उसने प्रकृति के बारे में भौतिकवादी मत प्रतिपादित किया,प्रकृति के विकास के सिद्धान्त,भौतिक शरीरक्रियाविज्ञान एवं उनकी यंत्रवादी विधि की धर्मशास्त्र से शत्रुता थी। उसने नए युग के भौतिकवादी दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया। यांत्रिकी के क्षेत्र में उसने गति और अविचलता की सापेक्षता लक्षित की,क्रिया और प्रतिक्रिया के सामान्य नियम को निरुपित किया।ब्रह्माण्डोत्पत्ति के क्षेत्र में सौरमंडल के नैसर्गिक विकास का विचार दिया,जो विज्ञान के लिए नया था। गणित के क्षेत्र में वह विश्लेषणात्मक ज्यामिति के प्रवर्तकों में से एक है। वह मानता था कि कणों की भ्रमित गति अन्तरिक्षीय भूतद्रव्य की गति का मुख्य रुप है, जो संसार की संरचना तथा आकाशीय पिण्डों की उत्पत्ति निर्धारित करती है। उसकी प्राक्कल्पना ने प्रकृति की द्वंद्वात्मक समझ की प्रेरणा दी।हालांकि वह इसे यांत्रिक ढ़ंग से ही समझता था। देकार्त्त का भौतिकवादी शरीरक्रियाविज्ञान अभौतिक आत्मा विषयक उसके दृष्टिकोण के विपरीत है। राहुल सांकृत्यायन ने देकार्त्त की इन मूलभूत बातों की मूल्यांकन करते हुए उपेक्षा की है। बेकन और देकार्त्त को मुक्ति की धारणा का सर्वप्रथम वैज्ञानिक प्रणेता भी माना जाता है।मुक्ति की समस्या दर्शन की मुख्य समस्या रही है।
राहुल सांकृत्यायन ने दर्शन के विवेचन के लिए विवरणात्मक पद्धति का इस्तेमाल किया है। इसमें वे दर्शन की अवधारणाओं को रुपवादी ढ़ंग से सरलीकृत रुप में पेश करते हैं। इससे इन धारणाओं के साथ समाज के अन्तस्संबंध को समझने में असुविधा होती है।वे इस क्रम में सिद्धान्त चर्चा तो करते हैं लेकिन ऐतिहासिक प्रक्रिया की अनदेखी करते हैं। इससे सभी अवधारणाएं एक-दूसरे से स्वायत्त और संपूर्ण नजर आती हैं। यहां धारणाओं का सर्वसंग्रहवाद पेश कर दिया गया है।इससे दर्शन की युगीन बहस और अन्तर्विरोध नजर नहीं आते ,और किसी भी अवधारणा के बारे में कोई सुसंगत समझ नही बन पाती।
मार्क्सीय नजरिए के अनुसार सिद्धान्त बनी-बनायी धारणाओं तक सीमित नहीं होता। अपितु धारणाएं अध्ययन,सामाजिक विकास और विचारधारात्मक संघर्ष की प्रक्रिया में तेजी से बदलती भी हैं। उनमें भेद नजर आता है,साथ ही जोड़ने वाला कारक भी नजर आता है।इस क्रम में धारणाएं अपनी संरचना का निर्माण करती हैं। प्रणाली बनाती हैं। वे अन्य चिन्तन प्रणाली के रुपों के साथ समन्वयन,अधीनीकरण,बहिर्वेशन,सामान्यीकरण और विकास करती हैं। दर्शन का मार्क्सीय अनुसंधान नयी परिघटनाओं ,नियमों और संज्ञान के विषयों की खोज करता है और नए प्रवर्गों और उनकी प्रणालियों को निर्मित करता है।
“ दर्शन-दिग्दर्शन” देखकर यह महसूस होता है कि दर्शन तो भ्रान्तियों का भंडार है। लेकिन इस विशाल भंडार का अपना निजी वैशिष्ट्य है। राहुलजी ने कौशल के साथ विभिन्न दर्शनों में मौजूद अंतर को रेखांकित किया है।साथ ही यह रेखांकित करने की कोशिश की है कि विभिन्न दर्शनों का उदय किसी एक दर्शन के गर्भ से नहीं हुआ है। वे यह भी नहीं मानते कि सभी दर्शन सही हैं। दर्शनों के बीच में अंतर दर्शाने के लिए उन्होंने संक्षिप्त ढ़ंग से ऐतिहासिक विधि का यांत्रिक ढ़ंग से इस्तेमाल किया है। कहीं पर दार्शनिक और गैर-दार्शनिक अध्ययन और क्रियाकलाप को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने की बजाय अन्तर्ग्रथित रुप में पेश करते हैं और इस तरह वे भाववादी नजरिए की आलोचना करने में सफल हो जाते हैं। वे प्रत्येक अदार्शनिक चीज को दर्शन की उपज नहीं मानते। दिलचस्प बात है राहुल के यहां दर्शन का इतिहास नहीं है लेकिन दर्शन का वैविध्य और विकास जरुर मिलता है। यह वस्तुतःबुर्जुआ नजरिया है। दर्शन के विकास के लिए दर्शन की पुरानी समस्याओं का पुनर्रुज्जीवन महत्व रखता है। इससे दर्शन के विकास में मदद मिलती है। “दर्शन-दिग्दर्शन” का महत्व यह है कि उसमें सरल हिन्दी में दार्शनिक अवधारणाओं को पेश किया गया है।
दर्शन में सरलीकरण करने से दर्शन में निहित संश्लिष्टता और जटिलता का बोध नहीं होता। दर्शन की परंपरा के मूल्यांकन में कालविभाजन,वर्गीकरण एवं तदनुरुप जीवन्त एवं मृत दार्शनिक तत्वों का बोध महत्वपूर्ण स्थान रखता है।एक मार्क्सवादी को इसके लिए ऐतिहासिक एवं तार्किक दोनों ही विधियों का प्रयोग करना होता है। इस पद्धति को राहुल ने गंभीरता के साथ लागू नहीं किया है।‘ दर्शन-दिग्दर्शन’ में वे दार्शनिक विचारों का संग्रह तैयार करने की दिशा में चले गए ।इसके लिए भी वे सरलीकरण से काम लेते हैं। इसके कारण वे विभिन्न भौतिक विचारकों के बीच अंतर नहीं कर पाते। वे लोकायत,न्याय -वैशेषिक,सांख्य,मीमांसक,वैभाषिक, सौत्रान्तिक और जैन दर्शनों के आदर्शवाद के विरोध में अंतर नहीं कर पाए हैं। आदर्शवाद के प्रतिपक्ष की परंपरा को सुसंगत रुप में पेश करने में असमर्थ रहे हैं। ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ देखकर यही लगता है कि भारतीय दर्शन परंपरा में आदर्शवादी चिन्तकों का ही वर्चस्व रहा है और उनका प्रतिपक्ष कमजोर रहा है। जबकि हकीकत इसके विपरीत है। औपनिषदिक चिंतकों ,महायानी बौद्धों और अद्वैत वेदान्तियों के एक हिस्से को छोड़कर भारतीय दर्शन में आदर्शवाद का किसी ने भी समर्थन नहीं किया। इसका अर्थ नहीं है कि आदर्शवादियों की शक्ति और लोकप्रियता कम रही है।हां, यह शक्ति और लोककप्रियता उन्हें राजनीतिक संरक्षण और वित्तीय समर्थन के कारण प्राप्त थी।
भारतीय दर्शन परंपरा का जो वर्गीकरण डी.पी .चट्टोपाध्याय किया है वह हमारी मदद कर सकता है। मसलन्, आदर्शवाद विरोधी दार्शनिकों में चार्वाक या लोकायत,कपिल,जैमिनी,उलूक,कणाद,गौतम अक्षपाद ,श्रीलाभ,बांधव सौत्रांतिक,कात्यायनी पुत्र,महान उमास्वति,ईश्वरकृष्ण, शबर,वात्स्यायन,प्रशस्तपाद,शुभगुप्त,अकलंद, प्रभाकर,कुमारिल,उद्योतकर,जयन्तभट्ट,वाचस्पति मिश्र,उदयन,गंगेश,गदाधर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इसी तरह आदर्शवाद विरोधी इन दार्शनिकों को दो वर्ग में रख सकते हैं। पहली श्रेणी उन दार्शनिकों की है जो ठोस रुप में आदर्शवाद का विरोध करते हैं। इनमें प्रमुख हैं-लोकायत,न्याय-वैशेषिक और सांख्य-दर्शन। दूसरी श्रेणी में वे दर्शन आते हैं जो आदर्शवाद के विरोध की परिधि पर हैं,ये हैं, मीमांसक,वैभाषिक,सौत्रान्तिक ,जैन आदि।दार्शनिक आदर्शवाद का विरोध करने में इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।
राहुलजी के विवरण की यह विशेषता है कि वे जिसे पसंद करते हैं उसके सिर्फ सकारात्मक पक्ष को ही बताते हैं और उसकी कमजोरियों को नजरअंदाज करते हैं। मसलन्, कुमारिल के बारे में राहुलजी का कहना है ,’ कुमारिल ने मीमांसा दर्शन में कोई खास तत्व का विकास नहीं किया,बल्कि जैमिनि के सिद्धान्तों को युक्ति और न्याय से पुष्ट करना चाहा।’(दर्शन-दिग्दर्शन, 616) इस तरह के निष्कर्ष की पहली समस्या यह है कि इसके साथ कुमारिल के दार्शनिक विचारों का विवरण नहीं है।उनके विचारों का जिक्र धर्मकीर्ति के विचारों के खंडन के प्रसंग में आया है। सच यह है कि कुमारिल ने पुरोहितों के विचारों का पक्ष लेने के बावजूद आदर्शवाद के खंडन में महत्वपूर्ण योगदान किया।
इसी तरह राहुलजी ने कणाद के बारे में जो विवेचन प्रस्तुत किया है वह भी समस्यामूलक है। परमाणुवादी कणाद को राहुलजी ने आत्मवादी कहा है,साथ ही यह भी लिखा है उनकी ‘ विवेचना का मुख्य लक्ष्य है धर्म के प्रति होती शंकाओं को युक्तियों से दूर कर फिर से धर्म की धाक स्थापित करना।’(दर्शन-दिग्दर्शन, 585) राहुलजी का मानना है कि धर्म की प्रामाणिकता का अर्थ है वेद की प्रामाणिकता को स्थापित करना। यह भी लिखा कणाद के ‘वैशेषिक सूत्र’ का लक्ष्य है धर्म की व्याख्या या मानक वैदिक परंपरा में श्रद्धा पैदा करना। इससे भिन्न देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय का मानना है ‘वैशेषिक सूत्र’ का वेदों की दार्शनिक धारा से कोई संबंध नहीं है। ‘वैशेषिक सूत्र’ में मुख्यतः द्रव्य,गुण आदि छह पदार्थों या तत्वों पर विचार विमर्श है। जिनके अंतर्गत जगत की सभी ज्ञात और अभिधेय वस्तुओं को वैशेषिक दर्शन के अनुसार वर्गीकृत करने का प्रयत्न किया गया है। बीच-बीच में पुरोहितों की महिमा एवं विशेषाधिकारों की सराहना कर दी गयी है। इस ग्रंथ में जो कुछ भी कहा गया है ,वह प्रारंभ में घोषित उसके उद्देश्य से एकदम विपरीत है। यह कुल मिलाकर ऐसा ही है कि “ सागर की ओर जाने की घोषणा करके हिमालय की ओर चल देना।” राहुलजी ने आरंभिक घोषणा को गंभीरता से लिया है जबकि देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने इसे वाक्-छल के अलावा कुछ नहीं माना है। चट्टोपाध्याय का मानना है कि यह वाक्-छल अनावश्यक नहीं है,क्योंकि ऐसा न करने पर ग्रंथ अधार्मिक घोषित कर दिया जा सकता है।कणाद, जैसे भी, ऐसी स्थिति से बचना चाहते हैं। साथ ही धर्मशास्त्र प्रणेताओं और निहित स्वार्थी तत्वों के संभावित आक्रमण से अपने विज्ञान की रक्षा करना आवश्यक था और इसका सबसे सरल आसान तरीका यही था कि आधिकारिक रुप से स्वीकृत अंधविश्वासों की मोहर उस पर लगा दी जाय।
‘दर्शन-दिग्दर्शन’ में व्यक्तिकेन्द्रित दर्शन परंपरा की प्रस्तुति है।जबकि मूल्यांकन को दार्शनिक तत्व केन्द्रित होना चाहिए। राहुलजी की मुश्किल यह है कि वे गौतम अक्षपाद को बुद्धिवादी और कणाद को अध्यात्मवादी मानते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि न्याय-वैशेषिक दर्शन की मुख्य चिंता तर्कशास्त्र और परमाणुवाद से जुड़ी है।यह दर्शन पूर्णतःधर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण को व्यक्त करता है। इसी तरह अक्षपाद गौतम के बारे में राहुलजी ने लिखा है वे कर्मकांड समर्थक थे। ईश्वर की सत्ता मानते थे। पुनर्जन्म या परलोक में विश्वास करते थे। यह कहना ठीक है कि ‘न्यायसूत्र’ में वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार किया गया है।पर देखना होगा कि किस तरह वेदों की प्रामाणिकता को वे स्वीकार करते हैं।अक्षपाद गौतम के ‘न्याय सूत्र’ पर वात्स्यायन ने भाष्य लिखा है ,वात्स्यायन ने रेखांकित किया है वैदिक कर्मकांडों के प्रति उनकी श्रद्धा का सारतत्व बड़ा ही खोखला है। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने लिखा है कि तर्कविज्ञान और वैदिक कर्मकांड,पुनर्जन्म ,अंधविश्वासों आदि को एक ही साथ पेश करने के पीछे एकमात्र प्रमुख कारण यही था कि तर्कबुद्धिवाद के लिए दंडित होने से बचा जाय।वस्तुतःवैदिक निष्ठा का नाम लेकर उन्होंने तर्कशास्त्र की रक्षा की।
देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने “ भारतीय दर्शन में क्या जीवंत है और क्या मृत ” में रेखांकित किया है कि कणाद और गौतम वेद के प्रति जो श्रद्धा भाव प्रकट करते हैं उसमें वास्तविक वैदिक दर्शन –मिसाल के तौर पर याज्ञवल्क्य और दूसरों के द्वारा प्रतिपादित उपनिषदों में वर्णित दर्शन के बारे में वे कुछ भी नहीं लिखते। क्योंकि वे जानते थे कि वे जिस दर्शन को मानते हैं उसका उपनिषद आदि के दार्शनिक नजरिए से अंतर्विरोध है।
राहुलजी ने ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ में धर्मकीर्त्ति के प्रति भी अपने एकांगी दृष्टिकोण को व्यक्त किया है। एकांगी इस अर्थ में कि धर्मकीर्त्ति के नजरिए में सबसे प्रमुख धारणा है “सहोपालंभ –नियम” ,लेकिन राहुलजी ने उसका जिक्र तक नहीं किया है। साथ ही धर्मकीर्त्ति के अंतर्विरोधों के बारे में भी राहुलजी चुप हैं। वे धर्मकीर्त्ति के विचारों की आलोचनाओं का जिक्र तक नहीं करते। मसलन्, दिङ्गनाग को राहुलजी ने बौद्धदर्शन को भारत में प्रतिष्ठित करने वालों में से एक माना है। लेकिन दिङ्गनाग की तर्कप्रणाली में बौद्ध जैसी कोई चीज नहीं है। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने लिखा है कि उनकी प्रणाली से तर्कशास्त्र और तत्वमीमांसा की एक नयी प्रणाली का बोध होता है। दिङ्गनाग ने अपनी रचना “आलम्बन-परीक्षा” में इसतरह की शैली अपनायी है जिसे प्रत्यक्ष जांच पड़ताल द्वारा पदार्थ की अवधारणा को विलुप्त कर देने वाली शैली कह सकते हैं । धर्मकीर्त्ति ने दिङ्गनाग की कृति “प्रमाण समुच्चय” की व्याख्या करते हुए ही “प्रमाण वार्त्तिक” का निर्माण किया । वे मौलिक चिन्तक हैं,राहुलजी ने उनकी तुलना हेगेल से की है।स्तचेर्बात्स्की ने उन्हें भारतीय कांट कहा है। लेकिन उनकी तुलना बर्कले से करना समीचीन होगा।
धर्मकीर्त्ति अपने युग के सबसे मेधावी दार्शनिक हैं। उनका तर्कविज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान है। इसका उनके युग के विज्ञान और तकनीकी विकास से गहरा सम्बन्ध है। उनके नजरिए में आदर्शवादी पूर्वाग्रह और तर्कविज्ञान के मध्य अन्तर्विरोध व्यक्त हुआ है,जिसकी ओर राहुलजी ने ध्यान नहीं दिया। धर्मकीर्त्ति के भाष्यकारों में विनीतदेव और धर्मोत्तर का नाम प्रमुख है। विनीतदेव का भाष्य सरल और धर्मोत्तर का भाष्य पंडिताऊ है। विनीतदेव ने लिखा धर्मकीर्त्ति का प्रमाण विषय़क लेखन दृढ़ प्रतिज्ञ आदर्शवादी के दृष्टिकोण को सामने नहीं लाता। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने “भारतीय दर्शन में क्या मृत और क्या जीवंत” ग्रंथ में धर्मकीर्त्ति के प्रमाण के बारे में लिखा कि यह विवेचन मौटे तौर पर विभ्रमों के आम ढाँचे में विवेचन है।ठेठ आदर्शवादी दृष्टिकोण से तर्क सिद्धान्त की सार्थकता भ्रांति की सीमाओं के अंतर्गत ही है। धर्मकीर्त्ति के विचारों की गंभीर आलोचना के अध्ययन के लिए कुमारिल,शुभगुप्त और अकलंक की कृतियां महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इन दार्शनिकों ने “सहोपालंभ –नियम” की आलोचना की है। इस प्रसंग में शुभगुप्त के “बाह्यार्थ सिद्धि” ,एम.जे.शाह के “अकलंस क्रिटिसिज्म ऑफ धर्मकीर्त्तिज फिलॉसफी” और कुमारिल के “सर्वास्तिवाद” नामक ग्रंथ में विस्तार से इस अवधारणा पर विचार किया है।
यहां पर राहुलजी के मूल्यांकन की सीमाओं का उदघाटन करने लिए दो अवधारणों का विवेचन पेश कर रहे हैं। सहोपालंभ नियम-
धर्मकीर्त्ति के दार्शनिक नजरिए का मूलाधार है ‘सहोपालंभ नियम’। इसके कई पहलू हैं जिनको ध्यान में रखा जाना चाहिए। खासकर अवधारणात्मक धरातल पर उसका विश्लेषण करना जरुरी है।देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने इस अवधारणा पर विस्तार से विचार किया है। ‘सहोपालंभ नियम’ का शाब्दिक अर्थ है तत् क्षणिक (सह) बोध(उपालंभ) । यानी विचार और वस्तु दोनों का अनिवार्यतः एक साथ बोध होने के कारण –वस्तु के रुप में वस्तु का स्वतंत्र ज्ञान न होने के कारण – उसी वस्तु रुप में वस्तु के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं मिलता। इस तरह के प्रमाणाभाव के कारण यह स्वीकार करना होगा कि विचार से पृथक कथित वस्तु की कोई सत्ता नहीं। इसका आशय है कि विचार और उस वस्तु में कोई अंतर नहीं। दार्शनिकों के यहाँ ‘सह’ पदबंध व्याख्याएँ भिन्न-भिन्न रुपों में व्यक्त हुई हैं। शुभगुप्त ने ‘बाह्यार्थ सिद्धि’ में तर्क दिया है कि बोध और साथ ही बोध की वस्तु का चेतना में एक ही क्षण (सह) उदय होता है। लेकिन दोनों की समरुपता सिद्ध नहीं होती। कोई वस्तु किसी अन्य वस्तु के साथ घटित होती है; दो भिन्न तत्वों की सह –उपस्थिति को स्वीकार किए बिना सहगामिता की अवधारणा निरर्थक है।केवल एक तत्व का ही अस्तित्व स्वीकार करने पर सहगामिता की चर्चा करना एकदम अर्थहीन हो जाता है। शुभगुप्त ने ‘सह’ शब्द के ‘तादात्म्य’ अथवा ‘एकार्थ’ के ‘अभिप्राय’ से की गई व्याख्याओं का भी खंडन किया है। जैन दार्शनिक अकलंक ने इसी प्रसंग में लिखा कि ‘सह’ शब्द को ‘समरुपता’ अथवा ‘एकार्थ’ के अर्थ में स्वीकार करने से इसमें द्विरिक्त दोष पैदा हो जाता है ।
एन.जे.शाह ने ‘अकलंकस क्रिटिसिज्म ऑफ धर्मकीर्तिज फिलॉसफी’ में लिखा की अकलंक मानते हैं कि वास्तव में यह उदिष्ट निष्कर्ष और इसे प्रमाणित करने के अभिप्राय से प्रस्तुत आधार दोनों के बीच में कोई अंतर नहीं रहने देता। कुमारिल ने धर्मकीर्त्ति की ‘सहोपालंभ नियम’ अवधारणा की आलोचना करते हुए लिखा ज्ञान की पड़ताल ज्ञात वस्तु से स्थापित नहीं की जा सकती,क्योंकि दोनों में लाक्षणिक भिन्नता है। आदर्शवादी दार्शनिक मानते हैं कि सब कुछ भाव मात्र अथवा ज्ञान मात्र है,कोई भी वस्तु ऐसी नहीं ,जो ऐसी न हो। ऐसी हालत में ज्ञाता और ज्ञात क्या हैं? आदर्शवादी दृष्टिकोण से स्वयं ज्ञान ही कभी ज्ञाता और कभी ज्ञात के रुप में दिखायी पड़ता है। कुमारिल ने ‘सर्वास्तिवाद’ में लिखा कि यदि ज्ञान,ज्ञाता और ज्ञात में कोई वास्तविक अंतर नहीं ,तो इस दावे का कोई विशेष अर्थ नहीं होगा कि ज्ञान कभी ज्ञाता के रुप में और कभी ज्ञात के रुप में प्रकट होता है। वे कहते हैं कुछ न कुछ अंतर जरुर होता है।
फणिभूषण तर्कवागीश ने ‘न्याय दर्शन’ में लिखा कि प्रथमतः ज्ञात के साथ ज्ञान की एकात्मकता का वास्तव में कोई प्रमाण नहीं। आदर्शवादी तर्क प्रस्तुत करता है कि ज्ञान से भिन्न ज्ञानात्मक वस्तु की चेतना संभव नहीं,अथवा ज्ञात से संबंधित चेतना अनिवार्यतःऔर निरपवाद रुप से मात्र ज्ञान की चेतना होती है। लेकिन यह सब कुछ कल्पना मात्र है,तथ्य नहीं। इसके विपरीत अनुभव का निर्णय यह है जो कुछ भी ज्ञात है,वह ज्ञान से भिन्न रुप में ज्ञात है।और ज्ञानात्मक तथ्य के वास्तविक स्वरुप के विश्लेषण से इस निर्णय की पूर्णतया पुष्टि होती है। ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्यतः एक प्रकार की क्रिया है,और जिसे ज्ञात किया जाना है वह इस क्रिया का लक्ष्य होता है। किसी क्रिया के लक्ष्य को स्वयं क्रिया से समीकृत नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार काटने की क्रिया खुद अपने को काट नहीं सकती;ठीक उसी प्रकार ज्ञान प्राप्ति की क्रिया स्वयं ज्ञान नहीं हो सकता। कोई एक आदमी लकड़ी का टुकड़ा इसीलिए काट सकता है,क्योंकि लकड़ी ,काटने की क्रिया से भिन्न होती है। इसी भांति कोई आदमी किसी वस्तु को इसीलिए जान पाता है ,क्योंकि ज्ञात वस्तु ज्ञान प्राप्ति की क्रिया से भिन्न होती है।
धर्मकीर्त्ति के आदर्शवादी दृष्टिकोण के खंडन में अकलंक ने कहा कि विष के ज्ञान या भाव से ही मृत्यु नहीं हो जाती। यदि गरल की कोई बाह्य सत्ता नहीं;बल्कि वह चेतना अथवा भाव का ही एक स्वरुप है तो उसका पान करने से शरीरपात कैसे हो सकता है? विष का नाम मात्र लेने से ही किसी की मृत्यु नहीं हो जाती। शुभगुप्त ने लिखा कि कोई आदमी स्वप्न देखता है कि उसका शरीर टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया है। यह वास्तव में एक आत्मपरक भाव है और किसी वस्तुपरक यथार्थ से इसकी संगति नहीं बैठती। वे यह भी तर्क देते हैं कि जब कोई इस विचार का स्वगत करता है कि अकेले मन सत्य है,तब वह कैसे दान आदि जैसे प्रारम्भिक कर्त्तव्यों का पालन करता है ?जब कोई बारंबार दान-चिन्तन (अर्थात् निपट चिंतन के रुप में दान का,अथवा और भी सरल शब्दों कहें तो,दान के मात्र विचार का ) सहारा लेता है ,तो इससे कभी दरिद्रता दूर नहीं होती। अतःअकेले भाव या विचार को सत्य नहीं माना जा सकता।जो कि धर्मकीर्त्ति के दृष्टिकोण की धुरी है।
शून्यवाद-
नागार्जुन की ‘शून्यवाद’ की अवधारणा के बारे में राहुलजी ने लिखा है, ‘ नागार्जुन का दर्शन- शून्यवाद- वास्तविकता का अपलाप करता है।दुनिया को शून्य मानकर उसकी समस्याओं के अस्तित्व को इंकार करने के लिए इससे बढ़कर दर्शन नहीं मिलेगा।’ शून्यवाद की यह नकारात्मक समझ है। शून्यवाद को बहुधा यह समझा जाता है कि यह शुद्ध निषेधवाद का ही एक रुप है,जो वास्तविकता को पूर्णतःअस्वीकार करता है। लेकिन यह धारणा सही नहीं है।देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय के अनुसार शून्य अथवा ‘अभाव’ की धारणा (तथा शून्य से बने भाववाचक शब्द शून्यता) का उनके दर्शन में,निस्संदेह एक निर्णायक स्थान है। फिर भी,स्वयं उनके अपने दृष्टिकोण से यह एक कठिन अवधारणा है जिसे बड़ी आसानी से गलत समझ लिया जा सकता है। वस्तुतः शून्य -सिद्धान्त से उनका आशय और कुछ नहीं बल्कि वही है जो माध्यमकशास्त्र नामक अपने दर्शन में व्यक्त करने का प्रयास किया है।इसके अनुसार निरपेक्ष अथवा परमतत्व,भौतिक जगत अथवा मात्र दृश्य जगत से बिलकुल परे है, अतः हमारी उन ऐहिक अभिव्यक्तियों की दृष्टि से जो दृश्य जगत के उपयुक्त हैं वह अनिर्वचनीय है। किसी अधिभौतिक अथवा रहस्यात्मक अभिज्ञान के आदार पर ही से समझा जा सकता है।
नागार्जुन ने शून्य अथवा अभाव की धारणा का प्रयोग ,एक महत्वपूर्ण अर्थ में ,वास्तव में आभास और वास्तविकता जैसे दो भिन्न दृष्टिकोणों से किया है। आभासमूलक दृष्टिकोण से इसका अर्थ यह है कि भौतिक जगत की प्रत्येक वस्तु बिल्कुल शून्य अथवा असार है। दूसरे शब्दों में ,प्रकृति एक सूने छायाभास से अधिक कुछ भी नहीं है। लेकिन इसके साथ ही परम तत्व अथवा ब्रह्म को भी शून्यता की संज्ञा प्रदान की गयी है। जिसका अर्थ है कि वह समृद्धि, अभिव्यक्ति ,विविधता और भिन्नता से रहित(प्रपंचशून्य) है। समृद्धि, अभिव्यक्ति, विविधता और भिन्नता से प्रतीति जगत की ही विशेषताएं प्रकट होती हैं। इन विशेषताओं से पूर्णतःरहित मानने पर वास्तविक सत्ता को भी शून्यता की संज्ञा दी जा सकती है। इसका सीधा अर्थ है कि हम अपनी ऐहिक भाषा में ब्रह्म अथवा परमतत्व को व्यक्त ही नहीं कर सकते।हमारे ऐहिक चिन्तन की सभी धाराओं से परे हैं। इसे रहस्यात्मक चेतना से ही समझा जा सकता है। इसे प्रज्ञापारमिता या इन्द्रियातीत सर्वोच्च ज्ञान कह सकते हैं। इसकी प्राप्ति का अर्थ है असत्य भौतिकजगत से मुक्ति या निर्वाण। नागार्जुन के यहाँ इसके लिए दूसरा शब्द है शून्यता। यहाँ पर यह कहना प्रासंगिक होगा कि दर्शन के इतिहास के लिए परिप्रेक्ष्य का प्रश्न बेहद महत्व का प्रश्न है। परिप्रेक्ष्य का अर्थ किसी दार्शनिक की धारणाओं का विवरण नहीं होता। और न ही किसी दार्शनिक विशेष की मूल धारणा का सरलीकृत प्रस्तुतिकरण ही परिप्रेक्ष्य कहलाता है। इसी तरह दर्शन में पक्षधरता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। साथ ही दार्शनिकों पर विचार करते समय राज्यों,सामंतों पर आर्थिक निर्भरता को भी देखा जाना चाहिए। दर्शन में पक्षधरता सामाजिक प्रगति की द्वन्द्वात्मकता और सामाजिक विकास के वस्तुगत व्याघातों से उद्भूत होती है। दर्शन में सत्य के वस्तुगत ज्ञान से यह पक्षधरता सुसंगत ढ़ंग से उद्भूत होती है।
प्राचीन समाज के मूल्यांकन की कमजोरियां- –
राहुलजी ने मार्क्सवाद का यांत्रिक प्रयोग करते हुए वेदों के निर्माण के युग में “प्रभुताशाली सामंती राज्य” खोज लिया। साथ ही “वर्ण ” या जातियां भी खोज लीं। जबकि वैदिक धर्म वर्गों के उदय के पहले आर्यों के समाज में प्रचलित धर्म था ।यह प्रकृतिपूजा का आदिम रुप है। वे यह भी मानते हैं कि “वैदिक ऋषि धर्म और देववाद में विश्वास करते थे।” असल में , वेदों में सीधे-सादे भौतिकवाद और आदर्शवाद का सूक्ष्म सम्मिश्रण है। वैदिक देवता मूलतः प्रकृति की शक्तियों का मूर्त्त रुप थे । देवताओं की मूलतः तीन श्रेणियां मिलती हैं। 1.खगोलीय,2.वायुमण्डलीय,3भौमिक। यहां न शिव है ,न देवीमाता है और न लिंग पूजा ही है।
के.दामोदरन ने भारतीय चिन्तन परंपरा” में लिखा है कि वैदिक युग विकास की आदिम कम्युनिस्ट अवस्था का सामाजिक संगठन गणों और गोत्रों –कुलों और कबीलों –पर आश्रित था। इस ढाँचे में बहुत से परिवर्तन हुए और एक ही क्षेत्र की सीमाओं के अंदर बहुत से वर्गों को संयुक्त करने वाले सामाजिक वर्गों का उदय हुआ। राहुलजी का वैदिक ऋषियों का मूल्याँकन भी सही नहीं है। वैदिक युग के ऋषिगण अपने रहन-सहन की परिस्थितियों को सुधारने के साधनों की खोज में व्यस्त रहते थे। वे जीवन की पूर्णता और विविधता को स्वीकार करते हैं। उन वस्तुओं को वे ठुकराते नहीं थे जो सांसारिक थीं। रहस्यपूर्ण चिन्तन-मनन और सन्यास उनके हथियार नहीं थे।उनके हथियार थे तीर-कमान और दूसरे तेज हथियार।वे आत्मनिष्ठ नहीं,ठोस आदर्शवादी थे।
राहुलजी का मानना है ‘वैदिक ऋषि धर्म और देववाद में विश्वास करते थे’, इसके विपरीत रवीन्द्रनाथ टैगोर का मानना है कि वैदिक स्तुतियाँ ‘ अस्तित्व के प्रति आश्चर्य और श्रद्धा की उन लोगों की सामूहिक प्रतिक्रिया की काव्यात्मक वसीयत हैं जिनकी कल्पना .सभ्यता के उषःकाल में अत्यन्त शक्तिसंपन्न और अकृत्रिम थी तथा जो जीवन में निहित अक्षय रहस्य की भावना से अभिभूत थे। यह उनकी सरल आस्था थी जिसने प्रकृति के हर तत्व और हर शक्ति पर देवत्व आरोपित किया। किन्तु यह अत्यन्त साहसपूर्ण और उल्लासपूर्ण आस्था थी। इसमें देवताओं के प्रति भय को उन्हीं के प्रति विश्वास संतुलित करता था,और रहस्यमयता की भावना उसे किंकर्त्तव्यविमूढता के बोझ के नीचे दबाती नहीं थी बल्कि और भी सम्मोहक बना देती थी।’
इसी तरह उपनिषदों की रचना ऐसे समय हुई थी जब वर्गों का उदय हो रहा था और कबीलों को संगठित करके राज्यों का निर्माण किया जा रहा था। बहुदेववाद की जगह एकेश्वरवाद जन्म ले रहा था। राहुलजी ने उपनिषद काल को 4भागों में विभाजित किया है। पहला युग 700ई. पूर्व,दूसरा युग 600-500 ई.पू., तीसरा युग 500-400ई.पू. चौथा काल 200-100ई.पू. रखा है।
दर्शन में वर्गीकऱण और प्रणाली की समस्याएं-
राहुलजी ने दर्शन के वर्गीकरण के लिए जो नाम दिए हैं ,वे मार्क्सीय आधार पर ठीक नहीं जंचते। मसलन् , ईश्वरवादी ,अनीश्वरवादी,आत्मवादी ,ब्रह्मवादी आदि इन नामों के माध्यम से दर्शनों का वैज्ञानिक वर्गीकरण संभव नहीं है। मार्क्सीय नजरिए से दर्शन का इतिहास लिखने के लिए मूलतःदो पद्धतियां अपनायी जा सकती हैं। पहली पद्धति यह हो सकती है कि दर्शनों का आदर्शवाद और भौतिकवाद के आधार पर वर्गीकरण किया जाय।आदर्शवाद में भी आत्मगत और वस्तुनिष्ठ दो वर्ग हैं। भौतिकवाद के वर्गीकरण को 4भागों में वर्गीकृत कर सकते हैं। (1) प्राचीन दार्शनिकों का स्वतःस्फूर्त्त भौतिकवाद,(2) ,16वीं से19वीं सदी के पूर्वार्द्ध के विचारकों का आध्यात्मक भौतिकवाद,(3) 19वीं सदी के प्रजातंत्रवादियों का भौतिकवाद(4) द्वंद्वात्मक भौतिकवाद। पिछले तीन हजार वर्षों का दर्शन का इतिहास आदर्शवाद और भौतिकवाद के मध्य संघर्ष का इतिहास है।इन तीनों रुपों का ऐतिहासिक एवं द्वंद्वात्मक विकास है मार्क्स की द्वंद्वात्मक पद्धति।यह संज्ञान की पद्धति है तथा सामाजिक जीवन का क्रांतिकारी रुपान्तरण है। इसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद कहते हैं।इस पद्धति का आध्यात्मिक पद्धति से विरोध है। दर्शन के इतिहास में वर्गीकरण के लिए यह पद्धति उपयोगी है।
दर्शन के इतिहास में विवरणात्मक और परिचयात्मक लेखन को द्वंद्ववादी पद्धति का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। ‘दर्शन –दिग्दर्शन’ मूलतःविवरणात्मक पद्धति के आधार पर लिखी गयी किताब है। इस किताब का ऐतिहासिक महत्व है। पर इसे मार्क्सीय दृष्टिकोण से लिखी किताब नहीं कह सकते। यह किताब मूलतः पुनरुत्थानवादी नजरिए का विरोध करने लिए लिखी गयी। स्वाधीनता संग्राम के दौरान जो विवेकवादी नजरिया विकसित हुआ उसकी इसमें अभिव्यक्ति नजर आती है। विवेकवाद और बुद्धिवाद को प्राथमिकता देना इस किताब का मूल लक्ष्य है। राहुलजी के युग में दर्शन के इतिहास के अधिकांश अध्ययन सिद्धान्तों के बीच बढ़ते अन्तर्विरोधों पर जोर देते हैं।राहुलजी ने इस भिन्नता में व्याप्त तादात्म्य को खोजा है। वे दर्शनो में व्याप्त सह-अस्तित्व,संघर्ष और अन्तर्विरोधों की भी चर्चा करते हैं।
मार्क्सीय दृष्टि से दर्शन के इतिहास में प्रणाली का महत्व है। प्रणाली से रहित तत्व निरुपण में कोई भी वैज्ञानिकता नहीं हो सकती।सही दार्शनिक प्रणाली की दूसरी मूल विशेषता है उसके संघटक सिद्धान्तों की एकता।यह एकता वहीं तक संभव है जहां तक विशिष्ट,पृथक् सिद्धान्त निरपेक्ष न माने जायें तथा इस वजह से वे एक दूसरे के मुकाबले में नहीं रखे जा सकते। प्रणाली की धारणा को सबसे पहले मार्क्स ने खोजा। प्रणाली की पूर्व-मार्क्सवादी अवधारणाओं का महत्व बहुत ही सीमित तथा अन्वेषणात्मक था,क्योंकि वे इस कल्पना से आगे नहीं बढ़ीं कि अपरिवर्तनीय तत्वों का अस्तित्व है। प्रणाली अध्ययन को अपरिवर्तनीय संघटकों के संभव संयोजनो के विश्लेषण के रुप में समझा गया। माना जाता था कि समष्टि को दूसरे तत्व निर्धारित करते हैं।लेकिन संघटक अंगों की स्थिति में परिवर्तनों अर्थात् संरचनात्मक परिवर्तनों ने उन्हें कोई नया गुण प्रदान नहीं किया। प्रत्येक प्रणाली विशेष के तत्वों की संख्या को भी सदा के लिए अपरिवर्तनीय तथा स्थापित मान लिया गया। अतःप्रणाली को भी संतुलित मान लिया गया। प्रणाली के विकास के बारे में अवधारणा प्रणाली की अवधारणा बेमेल प्रतीत हुई। प्रणाली की उत्पत्ति के प्रश्न को यदा-कदा ही उठाया गया।वर्तमान समय में प्रणाली की अवधारणा ने सार्विक महत्व प्राप्त कर लिया है। अतःइसे सभी दर्शनों पर लागू किया जाना चाहिए।
परंपरागत दार्शनिक प्रणालियों तथा सामान्य दर्शन का मार्क्सवादी निषेध एक नये किस्म की दार्शनिक प्रणाली का आधार है।इसे द्वंद्वात्मक भौतिकवादी प्रणाली कहते हैं। मार्क्सवादी दर्शन सत्तामीमांसा तथा किसी भी ज्ञान की व्याख्या ज्ञानमीमांसीय ढ़ंग से करता है और उसके जरिए इसे जड़सूत्र नहीं बनने देता तथा इसके आगे के विकास को प्रोत्साहित करता है। साथ ही मार्क्सवादी दर्शन निरपेक्ष ज्ञान को अस्वीकार करता है, पर, निरपेक्ष ज्ञान और निरपेक्ष सत्य यानी मूर्त्त ज्ञान के बीच भेद करता है,जिसका विषय न केवल विशेष,बल्कि सार्विक भी हो सकता है।
विश्वदृष्टिकोण की वैज्ञानिक प्रणाली के रुप में मार्क्सवाद वैज्ञानिक ज्ञान की प्रणाली के रुप में मार्क्सवाद वैज्ञानिक ज्ञान की प्रणाली में दर्शन के स्थान में गुणात्मक परिवर्तन को स्वीकार करता है।इस क्रम में वह विज्ञान का सहयोग भी लेता है।इसी अर्थ में मार्क्सीय दर्शन इतिहास लेखन संपूर्णता का बोध पैदा करता है और सामाजिक परिवर्तन का मार्ग दिखाता है। राहुलजी की कृति ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ को उपरोक्त नजरिए से देखें तो पाएंगे कि दर्शन की परंपरा के मूल्यांकन का उनका नजरिया गैर-मार्क्सवादी है।जबकि सर्जनात्मक साहित्य में वे वैज्ञानिक नजरिए के करीब हैं,वहीं साहित्यालोचना में यांत्रिक मार्क्सवादी हैं,पर, समाज के इतिहासलेखन की दृष्टि पूर्णतःमार्क्सवादी है और यही उनकी इतिहासदृष्टि का सार है।
देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय के अनुसार भारतीय प्रणाली में सबसे पहले ‘वाकोवाक्य’की प्रणाली मिलती है जिसमें प्रश्नोत्तर के रुप में विवाद करते हैं।यह प्रणाली यूनानी पदबंध ‘डायलेक्टिक’ से मिलती-जुलती है।कालांतर में चिकित्साशास्त्र में यह पद्धति सुरक्षित रही।दर्शन में ‘न्यायसूत्र’ कृति में इसका विकास हुआ।यह इस पद्धति से लिखी पहली कृति है।इसकी रचना ईसापूर्व दोसौ साल पहले हुई थी। इसके रचयिता गौतम अक्षपाद थे।इसकी विस्तृत व्याख्या पांचवीं शताब्दी में वात्स्यायन ने की। किसी दर्शन की “अंतिम जांच-पड़ताल’ विवेचनात्मक नजरिए से करनी चाहिए। जब हम किसी कृति या दर्शन की परीक्षा करें तो ‘संदेह’ को आधार बनाएं। ‘संदेह’ के बिना विश्लेषण संभव नहीं है। इसे हिन्दी में ‘विमर्श’ या ‘संशय’ भी कहते हैं। वात्यास्यायन के अनुसार ‘संदेह’ पाँच किस्म के होते हैं,जिनमें तीसरा रुप है-‘विप्रतिपत्ति’-जन्य-संशय’ अर्थात् अन्तर्विरोधी आग्रहों से उत्पन्न संदेह,यह दार्शनिक जांच की पहली शर्त है। वात्स्यायन ने लिखा है कि ‘विवेचनात्मक परीक्षण’ और कुछ नहीं,संदेह उत्पन्न करने वाले पक्ष और प्रतिपक्ष के टकराव के माध्यम से ‘अंतिम-जांच-पड़ताल’ है।भारतीय दार्शनिक अध्ययन विधि में सबसे पहली समस्या है औचित्य प्रतिपादन की। औचित्य प्रतिपादन के बाद तर्क-वितर्क होता है,इस क्रम में समस्या के संबंध में सही संशय को उजागर किया जाता है अर्थात् यह प्रस्तुत किया जाय कि दो परस्पर विरोधी स्थितियां विद्यमान हैं। ये स्थितियां पक्ष (थीसिस) और विपक्ष(ऐण्टीथीसिस) कहलाती हैं।राहुलजी ने इस पद्धति का प्रयोग नहीं किया और नहीं मार्क्सीय पद्धति का ही प्रयोग किया है।
आत्मकथा और जीवनी साहित्य के मानदण्ड –
नामवर सिंह ने बड़े ही तरीके से राहुलजी पर लिखते समय “आत्मकथा” विधा के बुनियादी मानदण्ड को उद्घाटित किया है। वह इस विधा के मूल्यांकन का प्रस्थान बिन्दु हो सकता है। इसमें तीन महत्वपूर्ण बिन्दु हैं।1.ऐतिहासिकता,2. सत्य, 3. आत्मालोचक भावबोध । इन तीन तत्वों को राहुल सांकृत्यान ने जीवन और आत्मकथा लेखन में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया है। वे जब भी किसी व्यक्ति पर लिखने जाते हैं तो इन तीन तत्वों का खासतौर पर ख्याल रखते हैं। यहां तक कि स्वयं पर लिखते समय भी इन तीनों तत्वों का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। इस क्रम में उन तमाम तत्वों की गहरी छानबीन करते हैं, मूल्यांकन करते हैं,जिनका व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया से संबंध है। नामवरजी ने उनके व्यक्तित्व से संबंधित जिन तीन बातों के बारे में लिखा है, वे तो महत्वपूर्ण हैं ही,इसके अलावा भी कई बातें हैं जिनका नामवरजी ने जिक्र किया है। नामवरजी ने लिखा है, ‘ अनेक स्मृतियाँ हैं। पर केवल तीन बातें उनके व्यक्तित्व के बारे में कहना चाहूँगा।आज के सन्दर्भ में उनका व्यक्तित्व ही बहुत प्रासंगिक है। जब भी मैं उनसे मिलने गया,उन्हें काम करते देखा। पूछने पर उन्होंने कहा, “ पुनर्जन्म में तो विश्वास है नहीं।एक ही जन्म मिला है।इसलिए, इस जन्म में जो करना है,कर लो। किसी को हिसाब देना हो , न देना हो स्वयं अपने सामने तो देना है।” उन्होंने एक जगह कहा है-“ मैं हर सेकंड का तो नहीं ,लेकिन हर मिनट का हिसाब दे सकता हूँ ।” … “ दूसरी बात मैंने राहुलजी से सीखी है- निरंतर कर्म की ।’ … ‘ तीसरी बात सीखी वह यह कि कभी उनको उत्तेजित नहीं पाया।’
नामवरजी ने राहुल के विचारधारात्मक नजरिए का मूल्यांकन करते हुए निष्कर्ष निकालते हुए लिखा,विचारधारा ‘ जिस हद तक काम आए ,इस्तेमाल करो।काम जब न आए ,छोड़ दो। जो बेहतर चीज हो ,उसे ले लो।’ अपने नजरिए के बारे में इस तरह का अनाशक्त भाव उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी और इसे उन्होंने महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं से ग्रहण किया था। राहुलजी के इस नजरिए की धुरी हैं महात्मा बुद्ध, ‘ मेरी जीवन यात्रा’ के आरम्भ में उन्होंने जो कहा है उसे नामवरजी ने उद्धृत किया है। राहुलजी ने बुद्ध का एक वचन पालि में उद्धृत किया है-
“कुल्लुपमं देसेस्यामि वो भिक्खिवे धम्मं
तरणत्थाय नो गृहणत्थाय।।”
“ हे भिक्षुओ ! यह धर्म मैं छोटी सी नाव के समान दे रहा हूँ पार उतरने के लिए ।पार उतर जाने के बाद,सिर पर रखकर ढोने के लिए नहीं।”
राहुल की जीवनी के पहलुओं पर रोशनी डालते हुए नामवरजी ने बहुत मार्के की बात कही है, नामवरजी ने लिखा है , ‘ साधारण जनों के लिए राहुल के विचारों या उनकी किताबों से ज्यादा महत्वपूर्ण है- राहुल का जीवन,जीवन-यात्रा,जीवन-संघर्ष। ’ राहुल के क्रांतिकारी व्यक्तित्व , या फिर कहें कि किसी भी लेखक के व्यक्तित्व निर्माण में बचपन की घटनाओं की बहुत बड़ी भूमिका होती है। नामवरजी के अनुसार ‘राहुलजी ने घर से भागने , उसे छोड़ने के सिलसिले में लिखा है।1904 की गरमियों में जब राहुलजी की उम्र 11वर्ष की थी ,अचानक काफी बहसा-बहसी के बाद तिलक हुआ,शादी हुई। राहुलजी ने लिखा है “ उस वक्त 11वर्ष की अवस्था में मेरे लिए यह तमाशा था। ” और फिर उसके बाद पहली उड़ान उन्होंने भरी । उन्होंने जीवन-यात्रा में लिखा है कि 16वर्ष की उम्र (1909) में पहली बार घर छोड़ा। लिखते हैं ,“ जब मैं सारे जीवन पर विचारता हूँ ,तो मालूम होता है,समाज के प्रति विद्रोह का प्रथम अंकुर पैदा करने में इसने ही पहला काम किया।…1909 के बाद घर शायद ही कभी जाता था,1913 के बाद से तो मैं गृहत्याग का बाकायदा अभ्यास करने लगा।… 1909 के बाद घर शायद ही कभी जाता था,1913 के बाद तो वह भी खत्म-सा- हो गया और 1917 की प्रतिज्ञा के बाद तो आजमगढ़ जिले की भूमि पर पैर तक नहीं रखा।” यह स्थिति लगभग 1943 तक थी।बार-बार घर छोड़कर कभी कलकत्ता गए,कभी हरिद्वार गए,लगातार घर से जो भागते रहे और इस भागने की प्रक्रिया में वह क्षण जब उन्होंने व्रत लिया, “ ये कहना ही काफी नहीं है कि घर नहीं जाऊँगा। जिस आजमगढ़ जिले में घर है उसकी सीमा पार करने में भी खतरे हैं।” आप जानते हैं कि घर से लोग भागकर जाते हैं और खींच लिये जाते हैं। वह मार्मिक प्रसंग राहुलजी ने लिखा है। पिता के साथ अंतिम घटना। आर्यसमाज के प्रचारक के नाते उस समय मिर्जापुर के पास अहिरौरा नाम की जगह में थे वहाँ से आर्यसमाज के प्रचार कार्य के लिए अन्यत्र जाने वाले थे। पिता पता लगाते हुए पहुँचे और जैसे ही पिता आए तो वे देख करके उसी समय वहाँ से भागे। स्टेशन पर देखा कि लगभग 9-10 मील तक गोवर्धन पंडित दौड़ते हुए स्टेशन पर पहुँचे और स्टेशन पर पहुँच करके जोर-जोर से विलाप करने लगे,क्यों मुझे मारने पर तुले हुए हो। स्वयं राहुलजी के शब्दों में उस घटना का एक चित्र आपके सामने ,देना चाहता हूँ : “ जिसका डर था ,आखिर वही बात हुई ।अभी टिकट बँटने न पाया था कि
पिताजी प्लेटफॉर्म पर पहुँच गए। वह हाँफ रहे थे। उन्होंने 9-10 मील की यात्रा साँस लिये दौड़ते या तेजी से चलते तय की थी,नहीं तो इतनी जल्दी कैसे पहुँच सकते थे ? … वह मुझे देखते ही फूट-फूटकर रोने तथा उलाहना देने लगे। प्लेटफॉर्म पर लोग जमा हो गए। वह चिल्ला रहे थे –क्यों मुझे मार रहे हो ? मुझे भी अपने साथ ले चलो आदि। उनकी बातों में पिछले साल की अर्धविक्षिप्तता का भी हल्का-सा असर था,नहीं तो रोने और चिल्लाने में अपनी स्वाभाविक गम्भीरता का परित्याग कर वह उतने अधीर और कातर न बनते। मैंने एक बार हिम्मत बाँधकर कहा-आखिर ,कब तक आप मुझे इस प्रकार बाँधकर रखेंगे…। मैंने महेशपुरा की ओर यात्रा स्थगित की और दो टिकट लेकर बनारस की ओर रवाना हुआ। ट्रेन में और उससे भी ज्यादा बनारस स्टेशन पर मैंने ठंडे दिल से समझाना शुरु किया-मैं आपके भावों को,आपकी बेकरारी को समझता हूँ, किन्तु साथ ही मेरा जीवन भी किसी भविष्य की लालसा रखता है,जिसकी अस्फुट झाँकी मुझे मिल रही है,उसके कारण जबरदस्त से जबरदस्त खतरे ,मृत्यु के साक्षात दर्शन तक भी अब मुझको अपने पथ से विचलित नहीं कर सकते। मैं कनैला के अयोग्य हूँ,मैं आपके काम का नहीं रहा। यदि ऐसा ही करना था,तो मुझे गाय-भैंस की चरवाही में लगा दिए होते,मेरी दुनिया कनैला की सीमा से परिसीमित हो जाती। अब जोर देने का भयंकर परिणाम होगा, आपको मेरे जीवन से हाथ धोना होगा। मैंने इन बातों को धीरे-धीरे उन्हें बोलने का मौका देते हुए कहा। इसका उनके दिल पर असर हुआ। अन्तिम उत्तर जिस तरह उनके मुख से यकायक निकला, उसकी मुझे आशा नहीं हो सकती थी। उन्होंने कहा –अब मैं तुम्हारे रास्ते मैं बाधक नहीं होऊँगा,किन्तु साथ ही मैं भी कनैला न जाकर यहीं बनारस ही में अपने जीवन को बिता दूँगा अपने वचन के पूर्वार्द्ध का उन्होंने ठीक से पालन किया।यही उनका अन्तिम दर्शन था। मैंने प्रतिज्ञा की- अब से पचास वर्श की उम्र खत्म होने तक फिर आजमगढ़ जिले की सीमा के भीतर कदम न रखूँगा। ” ((आलोचना और विचारधारा,पृ.277-78) इस उद्धरण में वह पहलू उभरकर सामने आया है जिसको हम मूल्यांकन करते समय हमेशा भूल जाते हैं। मसलन्, व्यक्ति के व्यक्तितिव निर्माण में बचपन की भूमिका,परिवारीजनों के आचरण की भूमिका आदि। राहुलजी ने अने जीवनी लिखी हैं,अनेक व्यक्तित्वों का विवेचन किया है,उनकी शैली झलक देखने के लिए यहां पर हम “अकबर” नामक कृति में चित्रित दो महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों का मूल्यांकन पेश कर रहे हैं।
सम्राट अकबर –
अकबर के शासन में भारत की जो इमेज बनी वह हम सबके लिए गौरव की बात है। एक शक्तिशाली राष्ट्र के रुप में भारत को निर्मित करने में अकबर का अतुलनीय योगदान था। भारत को शक्तिशाली राष्ट्र बनाकर अकबर ने भारतीय जनता की जो सेवा की है उसके सामने सभी मुस्लिमविरोधी आलोचनाएं धराशायी हैं। भारत के मुसलमान कैसे हैं और कैसे होंगे अथवा भारत नागरिक कैसे होंगे, यह तय करने में अकबर की बड़ी भूमिका थी । राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है अकबर के जमाने में हिन्दू जितने रुढ़िवादी और कूपमंडूक थे,उसकी तुलना में मुसलमान उदार हुआ करते थे। मसलन्,हिन्दुओं में इक्का-दुक्का लोग ही विदेश जाते थे जबकि मुसलमानों में बहुत बड़ा हिस्सा हज करने के बहाने मक्का यानी विदेश जाता था। अकबर के जमाने में भारत में यूरोपीय लोग गुलाम की तरह बिकते थे,यह रिवाज अकबर को नापसंद था। उसने अनेक यूरोपीय गुलामों को मुक्ति दिलाई और उनको पोर्तुगीज पादरियों के हवाले कर दिया,इनमें अनेक रुसी थे। दुखद पहलू यह है अकबर के बाद जो शासक सत्ता में आए उनमें वैसी अक्ल और विवेक नहीं था,फलतः अकबर के जमाने में पैदा हुई अनेक परंपराएं आगे विकसित नहीं हो पायीं।
अकबर को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने पहलीबार जनाना बाजार की अवधारणा साकार की,मीना बाजार का निर्माण किया।अकबर यह भी चाहता था कि भारत में बहुपत्नी प्रथा बंद हो और एकपत्नी प्रथा आरंभ हो। लेकिन वह इस मुतल्लिक कानून बनाने में असफल रहा। अकबर की धारणा थी कि भारत की औरतें आजाद ख्याल हों और उन पर कोई बंधन न हो। मीना बाजार के बहाने अकबर ने पहलीबार औरतों को पर्दे,महलों और घरों की बंद चौहद्दी से बाहर निकाला। मीना बाजार में औरतें खूब आती थीं, एक-दूसरे से मिलती थी,औरतें ही दुकानें चलाती थीं। जिस दिन जनाना बाजार लगता था उसे “खुशरोज” (सुदिन) कहा जाता था। मीना बाजार में यदि कोई लड़की पसंद आ जाती थी तो लड़का-लड़की में प्रेम हो जाता था। जैन खाँ कूका की बेटी पर यहीं सलीम आशिक हो गया था , लड़की की शादी नहीं हुई थी,मालूम होने पर अकबर ने खुद शादी कर दी। अकबर के जमाने में बाजार में प्रेम की परंपरा की नींव पड़ी,अकबर ने इसे संरक्षण दिया और आज यह परंपरा युवाओं में खूब फल-फूल रही है। पर्दा प्रथा की विदाई हुई।
अकबर की विशेषता थी कि वह दासता का विरोधी था। उसने अपने दासों को मुक्त कर दिया था। अबुलफजल के अनुसार अकबर ने सन् 1583 में दासमुक्ति का आदेश दिया। लेकिन समाज में दासों की समस्या बनी रही। अकबर के रुढ़िवादी रुप का आदर्श रुप था उसका दाढ़ी विरोधी नजरिया। अकबर और उसका बेटा दाढ़ी नहीं रखते थे। दाढियों से अनेक रुढ़ियां चिपकी हुई थीं,इसलिए अकबर ने दाढ़ी को निशाना बनाया। अकबर और उसके शाहजादे ने दाढ़ी नहीं रखी।जहाँगीर ने सारी जिन्दगी दाढ़ी नहीं रखी। लेकिन शाहजहाँ और उसके बाद के जमाने में दाढ़ी लौट आयी। अकबर के दाढ़ी न रखने का आम जनता में व्यापक असर पड़ा और हजारों लोगो ने अपनी दाढ़ियां मुडवा दीं।
अकबर का दिमाग पूरी तरह आधुनिक था उसने भारत में व्यापक स्तर पर बारुद का इस्तेमाल किया। बारुदी हथियारों का प्रयोग किया। जबकि बाबर ने ईरान के शाह इस्माइल के सहयोग से बारुद और तोपों के इस्तेमाल की कला सीख ली थी। तोपों का सबसे पहले प्रयोग किया। अकबर पहला ऐसा शासक था जिसको मशीनों से प्रेम था,मशीनों के जरिए आविष्कार करना उसे पसंद था। जेस्वित साधु पेरुश्ची के अनुसार “ चाहे युद्ध सम्बन्धी बात हो या शासन सम्बन्धी बात हो या कोई यांत्रिक कला ,कोई चीज ऐसी नहीं है,जिसे वह नहीं जानता या कर नहीं सकता था।” राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है “ अकबर ने महल के अहाते के भीतर भी कई बड़े-बड़े मिस्त्री खाने कायम किये थे,जिनमें वह अक्सर स्वयं अपने हाथ से हथौड़ी –छिन्नी उठाने से परहेज नहीं करता था। उसने हथियारों और यन्त्रों में कई आविष्कार किये थे,जिनका उल्लेख ‘आईन अकबरी’ में अबुलफजल ने किया है। चित्तौड़ के आक्रमण के समय उसने अपनी देख-रेख में आध-आध मन के गोले ढलवाये ।बन्दूक चलाने में वह बड़ा ही सिद्धहस्त था शायद ही उसका कोई निशाना खाली जाता था।”

सैयद महम्मद जौनपुरी –
यह एक मिथ है कि भारत के मुसलमान फंडामेंटलिस्ट हैं,यहां मुसलमानों में कोई धर्मनिरपेक्ष परंपरा नहीं है। सब कुछ शरीयत के हिसाब से होता रहा है। मुसलमानों के बारे में ये सभी बातें एकसिरे से बेबुनियाद हैं। मुगल सल्तनत के जमाने में भारत में मुस्लिम बुद्धिजीवियों की निडर धर्मनिरपेक्ष परंपरा रही है और उसकी मध्यकाल में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ये वे लोग हैं जो न तो शरीयत से खौफ़ खाते थे ,न खुदा के नाम से डरते थे, इनका हिन्दुस्तान की जनता से गहरा लगाव था। मजेदार बात यह है कबीर आदि भक्ति आंदोलन के कवि जिस समय सामाजिक न्याय की काल्पनिक बयार बहा रहे थे उस समय मुसलमानों में तीन बहुत बड़े कद के महापुरुष हुए हैं,ये हैं, सैयद महम्मद जौनपुरी,मियाँ अब्दुल्ला नियाजी और शेख अल्लाई । हिन्दी के महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इन तीनों को मुस्लिम साम्यवादी कहा है।
राहुल सांकृत्यायन ने “अकबर”(1957) में लिखा है “ यह आश्चर्य की बात नहीं है कि यदि हिन्दू नहीं ,बल्कि ये मुस्लिम सल्तनतें हमारे प्रादेशिक साहित्य के निर्माण में सबसे पहले आगे आईं। इस्लाम –प्रभावित हिन्दी अर्थात् उर्दू का साहित्य बहमनियों के समय शुरु हुआ। बंगाल की भी यही बात है। जौनपुर की शर्की-सल्तनत ने हमें कुतुबन,मंझन और जायसी जैसे रत्न प्रदान किए। जौनपुर ने हमारी धरती में बहुत नीचे तक घुसने की कोशिश की। 15वीं सदी में, एक सौ साल ऊपर तक, वर्तमान उत्तरप्रदेश और बिहार की सांस्कृतिक और राजनीतिक राजधानी जौनपुर रही। उसके महत्व को बहुत कम लोग समझते हैं। इसी जौनपुर में सैयद मुहम्मद जौनपुरी का जन्म हुआ था। इनकी मृत्यु 1505-6 ई.(हिजरी911) में हुई। जान पड़ता है ,यह 15वीं शताब्दी के मध्य पैदा हुए। उनकी जवानी के समय देश की अवस्था बड़ी ही दयनीय थी। चारों ओर बदअमनी छाई हुई थी। जौनपुर ने काफिरों के साथ अपना घनिष्ठ सम्बन्ध जोड़कर कुफ्र की ओर एक कदम उठा लिया था। हिन्दू-मुस्लिम शासक या धर्माचार्य पसन्द नहीं करता था । चावल-उड़द की तरह उनका मेल हो,इसके मानने वाले भी बहुत नहीं थे,तो भी उसका उतना विरोध नहीं होता था।शेरशाह ने जौनपुर में हिन्दू मुसलमान की एकता देखी ,वहीं उसका बचपन बीता था। यही शेरशाह प्रायः हर बात में अकबर का मार्ग-प्रदर्शक रहा।”
यही वह माहौल है जिसमें पहला मुस्लिम साम्यवादी सैयद महम्मद जौनपुरी जन्म लेता है और नए विचारों की रोशनी मशाल लेकर सामने आता है। वह कबीर का समकालीन था । उस समय शासकों के खिलाफ धर्म की आड़ में बगावत का साहित्य लिखा गया। यही बाद में अन्त-ल्-मेहदी ( तू मेहदी है) के नाम से मशहूर हुए। राहुल ने लिखा है “ मेहदी का शब्दार्थ शिक्षक या अंतिम है। इस्लाम में हजरत महम्मद के बाद आने वाले सबसे अन्तिम पैगम्बर को मेहदी कहा जाता है। मेहदी का इस्लाम में वही स्थान है जोकि हिन्दुओं में कल्कि अवतार का । मुल्लों के लिए यह बड़ी कड़बी घूँट थी।सौभाग्य से सैयद महम्मद दिल्ली में नहीं, जौनपुर में पैदा हुए जहाँ अधिक खुलकर साँस ली जा सकती थी।”
अतीत की इन बातों की ओर ध्यान दिलाना इसलिए भी जरुरी है जिससे हम यह समझ सकें कि भारत में इस्लाम की परंपरा वही नहीं है जिसको शरीयत के कट्टरपंथी व्याख्याकारों ने बनाया है। बल्कि भारत में इस्लाम की परंपरा भिन्न रही है। बल्कि कई परंपराएं रही हैं।
राहुलजी ने लिखा है “ मेंहदी के प्रचार का ढ़ंग और उनकी बातें ऐसी थीं कि लोग उनकी तरफ आकृष्ट होने लगे। अनुयायियों को बढ़ते देख इस्लाम के झण्डेबरदार चुप कैसे रह सकते थे ? जौनपुर में उनका रहना असम्भव हो गया । वह वहाँ से चलकर गुजरात पहुँचे ।गुजरात में भी दिल्ली से बागी होकर जौनपुर की तरह की ही एक सल्तनत कायम हुई थी। वहाँ मेहदी के उपदेशों का प्रभाव केवल मुस्लिम जनसाधारण पर ही नहीं पड़ा, बल्कि अबुल फजल के अनुसार सुल्तान महमूद स्वयं उनका अनुयायी हो गया। बहुत दिनों तक वहाँ भी वह टिक न सके। अन्त में वहाँ से अरब गए।मक्का-मदीना देखा। घूमते-घामते ईरान में निकल गए। वहाँ पर भी उनके पास भक्तों की भीड़ लगने लगी। शाह इस्माइल ने ईरान की राष्ट्रीयता को उभाड़ने के लिए और उसके द्वारा अपने राजवंश को मजबूत करने के लिए शिया धर्म को राजधर्म स्वीकृत किया था। शिया धर्म ने कट्टर इस्लाम की बहुत-सी बातें छोड़ दीं थी। मेहदी जौनपुरी वहां एक और शाख लगाना चाहते थे । यह न पसन्द कर शाह इस्माइल ने कड़ाई की। सैयद को ईरान छोड़ना पड़ा। ईरान के मज्दक के अनुयायी जिन्दीक के नाम से उस समय भी मौजूद थे ,इसलिए अपने विचारों को मेहदी जौनपुरी के मुँह से सुनकर वह यदि उनकी शिष्यमण्डली में शामिल होने लगे तो ,तो आश्चर्य नहीं। और पीछे भी मेहदी से मिलती-जुलती विचारधारा यदि ईरान में मौजूद रही ,तो उसका श्रेय मेहदी को नहीं ,बल्कि मज्दकी कुर्बानियों को देना होगा।”

जगदीश्वर   चतुर्वेदी  लेखक  

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