राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 धारा-3 की उपधारा (3) लागू करने के पीछे आखिर क्या है मंशा ? साम्प्रदायिक सौहार्द्र के बहाने रासुका लगाने का अधिकार कलेक्टर को: .सरकार की मंशा पर उठे संदेह .

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 धारा-3 की उपधारा (3) लागू करने के पीछे आखिर क्या है मंशा ?  साम्प्रदायिक सौहार्द्र के बहाने रासुका लगाने का अधिकार कलेक्टर को: .सरकार की मंशा पर उठे संदेह .

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 धारा-3 की उपधारा (3) लागू करने के पीछे आखिर क्या है मंशा ? साम्प्रदायिक सौहार्द्र के बहाने रासुका लगाने का अधिकार कलेक्टर को: .सरकार की मंशा पर उठे संदेह .

 

जावेद अख्तर, सलाम छत्तीसगढ़…

(https://salaam36garh.blogspot.in/2018/04/1980-3-3.html?m=1)

रायपुर  07 अप्रैल 2018

 छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के सभी 27 जिलों के जिला दण्डाधिकारियों को 01 अप्रैल 2018 से 30 जून 2018 तक (तीन माह की अवधि में) में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 धारा-3 की उपधारा (3) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए अधिकृत किया है। आवश्यक होने पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 की धारा तीन के तहत प्रदत्त विशेष अधिकार देने के पीछे राज्य सरकार ने साम्प्रदायिक सौहार्द्र और लोक व्यवस्था बनाए रखने का हवाला दिया है। छत्तीसगढ़ के सारे जिलों के कलेक्टर अब रासुका का उपयोग कर सकेंगें। हालांकि यहां पर ये भी तर्क दिया जा रहा है कि सांप्रदायिक सौहार्द्र कायम रखने हेतु प्रशासन ने बड़ा कदम कदम उठाया है।

लेकिन क्या वास्तविक रूप में सरकार की मंशा साम्प्रदायिक सौहार्द्र और लोक व्यवस्था बनाये रखना है अथवा सरकार अपने सशक्त विरोधियों को इस कानून के सहारे निपटाने की मंशा रखती है? कहीं ना कहीं जरूर दाल में कुछ तो काला है।

   सवाल तो बनता ही हैं 

ये प्रश्न इसलिए भी वाजिब है क्योंकि छग के किसी भी क्षेत्र में ना तो साम्प्रदायिक तनाव या हिंसा होने की संभावना दिखाई दे रही और ना ही पूर्व में ऐसी हिंसात्मक घटनाएं कारित हुई हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को छोड़कर। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पहले से ही सुरक्षा बलों की बटालियन तैनात है.

अब लोक व्यवस्था को बिगाड़ने के तथ्य को देखें तो आधे से अधिक छत्तीसगढ़ ग्रामीण एवं आंचलिक क्षेत्रों में बसता है, इन इलाकों में रहने वाला गरीब आदिवासी, सतनामी एवं ओबीसी समुदाय का है, इनमें से आधे से भी अधिक खेती किसानी करतें हैं यानि किसान है। 
नगरीय क्षेत्रों में भी रहने वाला वर्ग, अभी तक हिंसा का पुट कहीं से भी सामने नहीं आया है, व्यापारी, दुकानदार, छोटा कारोबारी एवं सरकारी व गैरसरकारी नौकरी पेशा वाला है, नवयुवा वर्ग शिक्षा एवं बेरोजगारी से जरूर त्रस्त है किंतु आज तक हिंसा करते नहीं पाया गया है। नगरीय क्षेत्रों का आधा वर्ग अन्य राज्यों से रोज़ी रोटी कमाने के लिए आया है इनसे हिंसा की आशा बेमानी होगी.

मज़दूर वर्ग रोज़ कमा कर पेट पालता है इसलिए इस वर्ग से भी हिंसा की आशा करना गलत ही होगा।

  छग का ग्रामीण हिंसा से कोसों दूर .

अब बचता है राजनीति व राजनेताओं का समर्थकों का वर्ग, इसमें में गौर करने की बात है कि पिछले पंद्रह सालों से सत्ता पर भाजपा ही काबिज़ है हालांकि कांग्रेस, छजकां, आप एवं अन्य दलों का समर्थक वर्ग, तो जो दल पंद्रह सालों से सत्ता पाने के बेताब है वो चुनावी मानसून में हिंसा कर अपना जनाधिकार खोने की गलती करने से रहा, वैसे भी सत्तासीन दल के अलावा अन्य दलों का समर्थक वर्ग अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों का है, ग्रामीण क्षेत्रों के निवासी नगरीय क्षेत्रों में आकर हिंसा करने का साहस फिलहाल छग राज्य में तो नहीं रखता है क्योंकि अगर इतना साहस रखता होता तो भू माफियाओं और पूंजीपतियों द्वारा किए जा रहे अत्याचार का मुंहतोड़ जवाब सबसे पहले देता।

  सोहाद्र कोन बिगाड़ रहा है 

कुल मिलाकर साम्प्रदायिक सौहार्द एवं लोक व्यवस्था बिगाड़ने की हिमाकत वह वर्ग ही कर सकता है जिसके पास पर्याप्त धन एवं राजनीतिक रसूख हो अथवा हिंसा के पीछे कोई विशेष मकसद हो।

   सत्तासीन दल से नाराज हुए छत्तीसगढ़ी –
यहां पर काबिलेगौर है कि पंद्रह सालों से सत्तासीन दल से छग राज्य का अधिकांश वर्ग खुश नहीं है, चाहे वो नगरीय क्षेत्र का हो या फिर ग्रामीण क्षेत्र का। वहीं सत्तासीन दल के एक वरिष्ठ पदाधिकारी द्वारा आलाकमान को हाल ही में सौंपी गई सर्वे रिपोर्ट में भी बताया गया है कि इस बार छग में सत्तासीन दल से अधिकांश आम लोगों का वर्ग नाराज़ है और इस बार के चुनाव में संभवतः सत्तासीन दल पच्चीस सीट का आंकड़ा भी पार करना मुश्किल और मुमकिन नहीं.

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण सत्तासीन दल को लगातार सघन दौरा एवं समाधान शिविरों में आने वाले शिकायतकर्ताओं एवं आमजनों से मिलनी वाली प्रतिक्रियाओं से भी समझ आने लगा है।

  विपक्षीय दलों को मिल रहा अच्छा रिस्पांस –

विपक्षीय दलों ने अपने अपने लिए अच्छा खासा माहौल तैयार कर लिया है जिससे ये तो साफतौर पर दिखाई भी देने लगा कि आमजनों का समर्थन तथा झुकाव भी अन्य दलों की ओर अधिक हो गया है.

पंद्रह सालों से सत्तासीन दल को भी ये सबकुछ दिखाई दे रहा है जिससे सत्तासीन दल के साथ ही आलाकमान भी चिंतित है, होना भी चाहिए क्योंकि कौन सा दल सत्ता खोने की चाह या इच्छा रखता है।

   सरकार वादों को पूरा नहीं कर पाई –

चूंकि तीन बार विकास, रोज़गार, किसान, आदिवासी एवं विकसित छग या सुदृग के आधार पर सत्ता हासिल करने में सफल रहा है, हालांकि ये तथ्य अलग है कि न तो छग के किसान विकसित हुए और ना ही आदिवासी समुदाय, न तो छग विकसित हो पाया और ना ही बेरोज़गारी कम हुई।

  आशंका प्रबल है –

यहां पर स्वाभाविक है कि सत्तासीन दल, सत्ता अपने हाथों में बनाए रखने के लिए पूरा पूरा प्रयास करेगा, इसलिए तिकड़म लगाएगा, येन केन प्रकारेण तमाम तरह के प्रपंच रचेगा ही। 
अतः चौथी बार भी सत्ता पाने के लिए, सत्तासीन दल के पास तुरूप का पत्ता यानि धार्मिक कार्ड के अलावा कोई बड़ा विकल्प है नहीं, इसलिए धार्मिक कार्ड खेलने की संभावना सबसे प्रबल है।

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 धारा-3 की उपधारा (3) लागू करने से धार्मिक कार्ड के तथ्य को अधिक बल मिल रहा है।

  ग्रह विभाग का आशय, मगर किसे ?

गृह विभाग द्वारा इस आशय की अधिसूचना मंत्रालय से जारी कर दी गई है। यह अधिसूचना साम्प्रदायिक सौहार्द्र और लोक व्यवस्था बनाए रखने की दृष्टि से जारी की गई है। अधिसूचना में कहा गया है कि राज्य सरकार के पास ऐसी रिपोर्ट है कि कतिपय तत्व साम्प्रदायिक मेल-मिलाप को संकट में डालने और लोक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए सक्रिय हैं या उनके सक्रिय होने की संभावना है। लेकिन पूरी तरह से किसी भी तथ्य को स्पष्ट नहीं किया गया है।

  धार्मिक हिंसा की संभावना प्रबल .

दरअसल सरकार के धार्मिक कार्ड के चलते ही साम्प्रदायिक हिंसा और लोक व्यवस्था बिगड़ेगी ही, इसी साम्प्रदायिक हिंसा की आड़ में विरोधियों को लपेटकर कलंकित करने, राष्ट्रहित, जनहित की सुरक्षा को लेकर बयानबाज़ी से माहौल गरमा कर प्रदेशवासियों को गुमराह किया जा सकता है। और जब लोग गुमराह होंगे तो धर्म का चोला ओढ़े दल को ही सत्ता की चाभी मिलेगी।
राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर 1980 धारा-3 लगाने के पीछे बहुत हद तक संभावना यही प्रतीत हो रही है।

   इनको दी विशेष शक्ति .

इसलिए जिला दण्डाधिकारी रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव, दुर्ग, रायगढ़, सरगुजा, जशपुर, कोरिया, जांजगीर-चांपा, कोरबा, कबीरधाम, महासमुन्द, धमतरी, जगदलपुर, दंतेवाड़ा, कांकेर, बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा, कोण्डागांव, बलौदाबाजार, गरियाबंद, बेमेतरा, बालोद, मुंगेली, सूरजपुर और बलरामपुर की स्थानीय सीमाओं के क्षेत्रों में स्थिति निर्मित होने पर समाधान हेतु प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करना आवश्यक होगा।

   ज़रा इस महत्वपूर्ण बिंदु पर गौर करें

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 (1980 का सं. 65) की धारा-3 की उपधारा (3) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग एक अप्रैल 2018 से 30 जून 2018 की अवधि में कर सकेंगे।
वहीं वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र अगस्त 2018 से आचार संहिता लागू हो जाएगी।

   इलेक्ट्रानिक एवं सोशल मीडिया से रहे सावधान –

इस पूरे ग्राफ कर देखकर समझा ही जा सकता है कि आने वाले दिनों में इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया के सहारे प्रदेश की आबोहवा एवं प्रदेशवासियों के दिल दिमाग में धर्म का ज़हर घोलने की पूरी पूरी कोशिश की जा सकती है। ये सशक्त माध्यम है सीधे दिमाग व विचार को प्रभावित करने के लिए।
संभवतः किसी ना किसी धर्म के पवित्र स्थलों को नुकसान पहुंचाने या फिर किसी के साथ जघन्य अपराध घटित होने की संभावना सबसे ज्यादा है ताकि लोगों में धार्मिक उन्माद पैदा हो, जिसको हवा दी जा सके। धर्म का मसला कितना संवेदनशील होता है ये किसी को समझाने या बताने की आवश्यकता नहीं है।

   कृपया अपील पर ध्यान दें .

इसलिए छग के प्रत्येक प्रदेशवासी से अपील है कि आने वाले दिनों में धर्म अथवा धार्मिक तथ्यों, फोटो, वीडियो और खबरों पर आंख बंदकर विश्वास ना करें और ना ही तुरंत अपना आपा खोए और ना ही उन्मादियों की भीड़ बनें। क्योंकि ‘संभावना’ क्या बन सकती है ये पूरी तरह से विस्तार में बताने का पूरा प्रत्यन किया हूं।

धार्मिक हिंसा से किसी का भी भला नहीं हो सकता है। धार्मिक हिंसा, राजनीति व राजनीतिकों का पुराना हथियार रहा है, इसके सैकड़ों प्रमाण एवं उदाहरण भरे पड़े हैं। इसलिए इलेक्ट्रानिक एवं सोशल मीडिया से बहुत ज्यादा सतर्क एवं सावधान रहें।

बहुत सारे लोग भड़काने का एवं उकसाने का कृत्य करतें हैं, इसलिए किसी के भी बहकावे में ना जाए।
राजनेता किसी भी दल, वर्ग या धर्म का हो, उनकी विवादित और भड़काऊ बयानबाज़ी को अनदेखा और अनसुना करें।

  समाज सबके मिलने पर ही बनता है

समाज सबके मिलने से ही बनता है और समाज में सौहार्द बनाए रखने की जिम्मेदारी भी सबकी है, ये किसी एक व्यक्ति विशेष से नहीं बनता है, प्रत्येक व्यक्ति की भागीदारी से बनता है़।
आदर्श और मिलनसार समाज के लिए हम सबको मिलकर प्रयत्न करना होगा ताकि किसी भी दल या राजनेता की कुत्सित मंशा को नाकामयाब किया जा सके।

छत्तीसगढ़ सदैव से शांत एवं सौहार्दपूर्वक राज्य रहा है, प्रत्येक प्रदेशवासी से निवेदन, अनुरोध, विनती है कि इस भाईचारे को बनाकर रखें। शांत और सौहार्दपूर्ण समाज से बेहतर कोई विकल्प ना था, ना है और ना ही हो सकता है।

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जावेद अख्तर, सलाम छत्तीसगढ़…

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