कांकेर : अंतागढ के गरदा गांव की कहानी : न रोड न राशन , पानी और न स्वास्थ्य सुविधा ! गंभीर अभावग्रस्त है गांव गरदा . कोई नही लेता सुध .

कांकेर : अंतागढ के गरदा गांव की कहानी : न रोड न राशन , पानी और न स्वास्थ्य सुविधा ! गंभीर अभावग्रस्त है गांव गरदा . कोई नही लेता सुध .

8.04.2018

गरदा अंकुर तिवारी की रिपोर्ट 

बस्तर के आदिवासियों की क्यों सुध नहीं लेते सरकार ?

जब हम लोकतंत्र की बात करते हैं, तो पहली नजर में उसकी एक छवि हमारे ज़ेहन में बनती है कि वहां पर सरकार अंतिम व्यक्ति के उत्थान के लिए कार्य करती है और सभी तबकों के लोगों को साथ लेकर चलती है। लेकिन क्या ये व्यवस्था छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग के कांकेर ज़िले के लिए कोई मायने रखती है? 

कांकेर ज़िले में रहने वाले आदिवासियों के जीवन को समझने की कोशिश की जाए तो लोकतंत्र की हक़ीक़त आपके सामने आ जाएगी। अंतागढ़ ब्लॉक मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर दूर स्थित है गरदा गांव, घने जंगलों और पहाड़ के बीच बसे ग्राम पंचायत हिमोड़ा का आश्रित गांव गरदा को बाहरी दुनिया से जोड़ने के लिए एक कच्ची सड़क तक नहीं है, जिसके कारण ग्रामीणों को पगडंडी के रास्ते गांव आना-जाना पड़ता है। 


घरेलू उपयोग की चीजों के लिए पास की दुकानें 15 किलोमीटर दूर अंतागढ़ में है। और पीडीएस से मिलने वाला राशन के लिए ग्रामीणों को 5 किलोमीटर दूर हिमोड़ा ग्राम पंचायत जाना पड़ता है। ग्रामीणों के मुताबिक दिसंबर महीने में पीडीएस योजना का चावल मिला ही नहीं। और पीडीएस दुकान के संचालक ने चावल वापस जाने की बात कह कर हितग्राहियों को भगा दिया। लेकिन गांववालों की समस्या यही खत्म नहीं होती। रास्ते में एक नदी पड़ती है, जिसे बरसात के दिनों में पार कर राशन-पानी लाना संभन नहीं होता है। ऐसे में इन आदिवासियों की मुश्किल भरी जिंदगी का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल तो नहीं ही है। 

 


गरदा गांव में बिजली नहीं है और चिमनी जलाने के लिए मिलने वाला एक लीटर मिट्टी तेल हर रात अंधेरे से लड़ने के लिए पर्याप्त नहीं होता। यही कारण है कि गांव के अधिकांश घरों में रात में अंधेरा पसरा रहता है। यहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है, कोई बीमार पड़ जाये तो उसे गांव के ही दवा-दारू पर निर्भर रहना पड़ता है। गांव से अस्पताल तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। मरीजों को खाट पर लादकर बड़ी मुश्किल से दूर के अंतागढ़ अस्पताल लाया जाता है। तब तक मरीज की हालत और भी खराब हो जाती है। गांव में चिकित्सक नहीं आते है, और जिला प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं देता है। 

ऐसे में सरकार भले ही इस इलाके के विकास के लिए करोड़ो रूपये भेजती हो मगर आदिवासी समुदाय को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। और यही कारण है कि गरदा गांव में आदिवासियों का जीवन अभिशाप बन गया है। गांव में पेयजल के लिए एक सरकारी हैंडपंप लगाया गया है, उसमें से फ्लोराइड और आयरन युक्त पानी आता है। जिसके कारण यहाँ के आदिवासी झरिया का पानी पीने के लिए मजबूर है, गर्मी के दिनों में यह हैंडपंप सूख जाता है। 


ग्राम पंचायत हिमोड़ा के उपसरपंच चंपालाल मंडावी कहते हैं कि सदियों से हमारे पुरखे यही पानी पीते आए हैं, और अब हम लोग बीमारियों का शिकार हो रहें है। क्योंकि झरिया के पानी में मेंढक और दूसरे जीव तैरते रहते है। कई बार उल्टी-दस्त, मलेरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियां भी जकड़ लेती हैं। 

छत्तीसगढ़ सरकार ने गरदा गांव के आदिवासी बच्चों के लिए प्राथमिक स्कूल खोल रखा है, जिसमें कक्षा पांचवी तक की पढ़ाई ही हो पाती है। इसके बाद विद्यार्थियों को अपना गांव-घर छोड़कर 5 किलोमीटर दूर हिमोड़ा गांव में रहकर कक्षा 6 वीं से 8वीं तक की शिक्षा हासिल करनी पड़ती है। और फिर हिमोड़ा छोड़कर अंतागढ़ के आश्रमों में पढ़ाई करनी पड़ती है। इस गांव के कई बच्चों को बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी है। क्योंकि उनके घरवाले उन्हें गांव से दूर भेजने के लिए तैयार नहीं है और न ही बच्चें अपना गांव छोड़कर बाहर जाना चाहते है।  

यह कहना गलत नहीं होगा कि आदिवासी बहुल इलाकों में तमाम सरकारी योजनाओं के बाद भी दावों की हकीकत कागजों में दम तोड़ दे रही है। ज़ाहिर है इस इलाके में सरकार, मीडिया और कुछ एनजीओ के दावों से लगता है कि यहां विकास की ऐसी बयार आई हैं, जिसमें नागरिकों को ज़मीन पर ही मोक्ष मिल गया है। ऐसे में चिंता वाली बात ये हैं कि इस इलाके में बद से बदतर होते हालात की वजह से आदिवासी समुदाय को अपना कोई भविष्य नज़र नहीं आ रहा है।

आदिवासी इलाकों में मानवाधिकार हनन

बस्तर में मानवाधिकार हनन कोई नई बात तो नहीं है। लेकिन यहां के बहुत से गांवों में नागरिकों को मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जिंदगी गुजर बसर करना पड़ रहा है। गांवों में पीने के लिए साफ पानी भी मयस्सर नहीं हो रहा। भीषण गर्मी में शहरी इलाकों में पानी की कमी से जनता बेहाल हैं। वहीं, बस्तर के गांवों में आदिवासी समुदाय के लोगों को झरिया का दूषित पानी पीकर अपनी प्यास बुझाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। नागरिकों को साफ पानी उपलब्ध कराने का दायित्व सरकार का है। उसके बाद भी आदिवासी समुदाय के लोग साफ पानी के लिए तरस रहे हैं। जबकि पीने के लिए साफ पानी हर मनुष्य का संवैधानिक अधिकार है। पानी को मानवाधिकार के दायरे में तो रखा ही गया है।

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अंकुर तिवारी स्वतन्त्र पत्रकार 

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