क्या मैं राजद्रोह की बातें कर रहा हूँ ? शायद हां . : महेंद्र सिंह – लेखक पुलिस अधिकारी है

क्या मैं राजद्रोह की बातें कर रहा हूँ ? शायद हां . : महेंद्र सिंह – लेखक पुलिस अधिकारी है

अनुवाद  : हिमांशु कुमार 

7.04.2018

***

माओवादीयों से नफरत करी जानी चाहिये क्योंकि वो लोगों की हत्या करते हैं.

हम इस बात से 100% सहमत हो सकते हैं.

हिंसा से और लोगों की हत्या से किसी समस्या का समाधान नहीं होगा बल्कि वे समस्याएं और भी बढ़ जायेंगी .

लेकिन कितने लोगों की हत्या करी है माओवादियों नें ?

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2015 में माओवादियों नें 226 लोगों की हत्या करी है.

अब इससे जुड़ा प्रश्न यह है कि इसी अवधि के दौरान सरकार नें कितने लोगों की हत्या करी ?

कुछ देर के लिए उन् 23 लाख बच्चों को भूल जाइए जो पांच साल के नीचे के थे और ऐसी बीमारी से मरे जिनसे उन्हें बचाया जा सकता था

जैसे दस्त, बुखार, उल्टी इत्यादी ( भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े ) .

उन मौतों को भूल जाइए जो कुपोषण से होती हैं या बाल मजदूरों की मौत, या गर्भवती माओं की मौत जो राज्य की संरचनात्मक हिंसा से होती है.

इसमें फसल खराब होने की वजह से होने वाली किसानों की मौतें या जाति हिंसा में होने वाली मौतों की संख्या शामिल नहीं करी जा रही हैं. वरना यह संख्या बहुत भयानक तौर पर बड़ी हो जायेगी.

हम सिर्फ हिरासत में हुई मौतें और पुलिस द्वारा सीधे तौर मारे गए लोगों की संख्या ही लेंगे .

इसमें मुठभेड़ में, कानून व्यवस्था को लागू करने में और आत्म रक्षा के लिए मारे गए लोगों की संख्या ही ली गयी है .

सबसे पहले सिर्फ पुलिस हिरासत में मारे गए लोगों की संख्या लेते हैं .

2007 से 2012 के बीच पुलिस हिरासत में मारे गए लोगों की संख्या 11,820 थी .

यह आंकड़े सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमित्र ए एम् सिंघवी द्वारा एस एस निज्जर और एफ एम् खालिफुल्लाह की बेंच के सामने 24 नवम्बर 2013 को पेश किये गए हैं.

इसका सालाना औसत 2,364 हत्याएं प्रति वर्ष बैठता है जो माओवादियों द्वारा करी गयी हत्याओं का साढ़े दस गुना ज़्यादा है . इसमें पुलिस द्वारा गोली चलाने और लाठी चार्ज में मारे गए लोगों की संख्या भी जोड़ लीजिए .

अब सन 2015 में आते हैं .अभी सिर्फ आठ महीनों के आंकड़े ही उपलब्ध हैं .

इस अवधि में 111 मौतें पुलिस हिरासत में हुई हैं और 330 मामले पुलिस हिरासत में हुई हिंसा के हैं .

( यह आंकड़े गृह राज्य मंत्री किरेन रिजजू द्वारा एक सवाल के जवाब में लिखित उत्तर में 8 दिसंबर 2015 को दिए गए हैं)

इन आंकड़ों के औसत को अगर साल भर के लिए मानें तो 167 हिरासती मौतें और 445 मामले हिरासत में हुई हिंसा के हुए हैं.

इसी उत्तर में गृह मंत्री नें लोकसभा को बताया है कि शुरुआती 11 महीनों में 24,916 मामले पुलिस ज्यादतियों के हुए हैं .

राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक सन 2013 में पुलिस को 684 अवसरों पर गोली चलानी पड़ी .

जिसमें 103 नागरिकों की मौत हुई . इनमें 47 पुलिस कर्मी भी मारे गए . मौत तो मौत है तो कुल 150 मौतें हुईं .

और याद रखिये यह सिर्फ राज्य पुलिस के आंकड़े हैं . इसके अलावा 28 विभाग और भी हैं, जिनमें सशस्त्र बल हैं , केन्द्रीय अर्ध सैनिक बल हैं , सीबीआई है , एनआईए है, आर्थिक सतर्कता निदेशालय , आई बी , रा , और अन्य बहुत सारी एजेंसियां हैं जो नागरिकों को हिरासत में ले सकती हैं और उन्हें जान से मार सकती हैं .

इन में फर्ज़ी मुठभेड़ों और रिपोर्ट ना हुए मामलों की संख्या शामिल नहीं हैं . तो 167 + 150=317. यानी नक्सलियों से डेढ़ गुना ज़्यादा लोगों को सरकार ने मारा .

मुझे नहीं पता कि अब मेरे सहकर्मी ज़्यादा कुशल कानून का पालन करने वाले और सभ्य हो गए हैं या कुछ और खेल है 2012 तक हिरासत में मौतों की संख्या 2,364 मौतें प्रति वर्ष थी . ( क्या अब आंकडें जान बूझ कर छुपाये जाने का खेल शुरू हो गया है ?)

कोई भी आराम से यह कह सकता है कि सरकार व्यापक हित में लोगों को मारती है

ताकि कानून व्यवस्था को बनाए रखा जाय .लेकिन कभी अपने सोचा है कि यह व्यापक हित क्या है ?

किसका हित है यह ?

इससे किसका हित होता है ?

किसके लिए कानून व्यवस्था को बनाये रखा जाता है ?

राज्य के हितग्राही कौन हैं ?

राज्य के ताकतवर बाजू पुलिस और अर्ध सैनिक बल किसके लिए है ?

क्या मैं राजद्रोह की बातें कर रहा हूँ ?

– लेखक पुलिस अधिकारी है

महेंद्र सिंह 
( अनुवाद – हिमांशु कुमार )

( चित्र : अंकुर तिवारी )

Am I talking Sedition? Probably YES
” Maoists are hate-able because they kill people.” 100% agree; rather cannot agree more. Violence and killing people cannot solve any problem; it creates more problems rather than solving these.
But how many? Data of Ministry of Home Affairs , Government of India says in year 2015, they have killed 226 persons. Now the pertinent question is how many did the state kill in the same period. For a moment forget about all the 23,00,000 deaths of children under 5 years of age dying of preventable diseases like diarrhoea, fever, vomiting etc. ( Again GOI and WHO data) , forget about all the deaths caused by malnutrition, Deaths of child labourers , of pregnant mothers, and so many other variants of deaths caused due to structural violence including deaths and suicides due to crop failure and caste violence by including which the data will become simply obnoxious . Simply take data of custodial deaths and persons killed by the police directly- ( it includes a rubric – Encounter, maintenance of law and order, private defence and so on). First -Have a look only at custodial deaths only. The number of custodial deaths between 2007 to 2012 was 11,820 as presented by amicus curiae A M Singhvi before the Supreme Court Bench of justices S S Nijjar and FM I Kalifulla on November 24, 2013, coming to average 2,364 custodial deaths per year almost 10.5 times of persons killed by Maoist. Add in this persons killed in police firing, lathi charge etc.
Come to year 2015-Till now data of only first 8 months are available – 111 custodial deaths and 330 cases of custodial torture (The data presented by Minister of State for Home Affairs Kiren Rijiju in Lok Sabha, on December 8, 2015 in response to a written question) extrapolate this to full year-167 custodial deaths and 445 cases of torture. In same response the Minister told the Loksabha that in first 11 months of the year 24,916 cases of atrocities by police have been reported. As per data of NCRB ,in year 2013 police had to fire on 684 occasions leading to death of 103 civilians and 47 police personnel ( Death is Death -So 150 deaths) . And mind , these are data of only state polices- There are more than 28 other state agencies including Armed forces, Central Para Military Forces , CBI, NIA, Directorate of Revenue Intelligence , IB , RAW and many more which can arrest and kill the citizens. And these data not at all include fake encounters and cases not reported. So , 167 + 150=317 . Almost 1.5 times of persons killed by naxals.
I do not know whether my fellows all of sudden have become more law-abiding , civilised and efficient or something else is at play. As mentioned earlier , just up to year 2012,the number was 2,364 custodial deaths per year .
One can very well claim that state is killing in greater common good, to maintain law and order . But have you ever thought further- what is that greater common good? Who’s good is that? Who get benefitted from that? For whom the law and order is maintained? Who are the greatest beneficiaries of the state, its doles and strong arms of the state- the police, paramilitary forces and the army?
Am I talking Sedition?

Mahender Singh

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