एक जंगल था. जैसा कि प्राचीन काल से जितने भी जंगल अब तक हुए हैं और उनमें होता रहा है वैसे ही इस जंगल में भी सालों से एक शेर का राज था और जैसा कि शेर करते रहे हैं वैसे ही ये शेर भी जानवरों को मारता ही था. लेकिन जंगल के बाकी प्राणियों की समस्या यह नहीं कुछ और थी.

खरगोश, हिरन, गधे जैसे निरीह शाकाहारी जानवरों की समस्या ये थी कि वे सालों से शेर को राजा के रूप मे देखते-देखते उकता गए थे कि भाई ये भी कोई बात हुई भला कि रोज सुबह उठो और वही राजा. रोज वही जान का ख़तरा भी. ये आलम बदलना चाहिए. उनमे राजा बदलने की बड़ी अकुलाहट थी. पर इसके आगे फिर एक समस्या खड़ी थी कि शेर नहीं तो फिर कौन?

उधर भेड़िये, सियार जैसे माँसाहारी जानवरों की समस्या ये थी जानवरों को तो हम भी मारते हैं, बल्कि ज़्यादा ही बर्बरता से मारते हैं पर साला शेर के सामने हमें कोई कुछ समझता ही नहीं! ऊपर से शेर राजा होने की वजह से हमे हमारी मर्ज़ी की करने नहीं देता. इसे बदलना पड़ेगा. हमें तो कोई राजा बनाने को तैयार होगा नहीं. तो कोई ऐसा राजा चुनना पड़ेगा जो कहने को तो राजा हो पर जिसका काम हमारे बिना न चले और हमें अपनी मर्ज़ी की करने की पूरी छूट हो. अब इनके सामने भी वही समस्या खड़ी थी कि शेर नहीं तो फिर कौन?

उधर खरगोश, हिरन आदि अभी विचार ही कर रहे थे, इधर भेड़िये, सियारों ने मिलकर एक योजना भी बना ली. उन्होंने जंगल के प्राणियों के बीच ये प्रचार कराना शुरू किया कि गिद्ध राजा के लिए सबसे उपयुक्त है. सबसे बड़ी अच्छी बात ये है कि वो आसमान में उड़ता है तो जंगल पर आने वाले ख़तरे को पहले ही देख लेगा. एक तरह से जंगल राजा नहीं अपना चौकीदार चुनेगा. फिर गिद्ध शेर की तरह आलसी नहीं भी है, कम सोता है, तो जंगल कि व्यवस्था पर अधिक ध्यान देगा. माना कि वह मांस खाता है पर शेर की तरह किसी जिंदा जानवर को मारकर तो नहीं खाता, वह तो मरे हुए जानवरों का मांस खाता है. और फिर उसके मंत्रिमंडल में, सहयोगियों में दूरदृष्टि वाली चील, बगुला जैसे तपस्वी और बंदरों जैसे फुर्तीले कार्यकर्ताओं की पूरी सेना होगी. ये लोग अगर कोई नुक्सान करेंगे भी तो बिलकुल ही पैर तले रहने वाले कीड़े-मकोड़ों का ही तो करेंगे. वैसे गिद्ध ख़ुद एक निचले तबके का है तो वह इन कीड़े-मकोड़ो का भी कोई नुकसान नहीं होने देगा. और सबसे बड़ी बात तो ये कि न गिद्ध और न ये लोग, शेर की तरह हिरन, गाय, भैंस आदि मध्यम वर्ग को तो नहीं ही मारेंगे न.
तो हुआ यूँ कि जब ये प्रचार अच्छी तरह हो गया तो गिद्ध को बतौर जंगल का राजा चुनाव में उतारा गया और वह बहुमत से विजयी हुआ. जंगल के प्राणियों ने कहा चलो अच्छा हुआ शेर से मुक्ति मिली. गिद्ध ने भी कहा न मैं किसी को मारकर खाता हूँ, न किसी और को खाने दूंगा. जंगल वासियों ने जय-जय बोला.
लोगों को भरोसा दिलाने के लिए कुछ दिन भेड़िये-सियार भी शांत रहे. मगर भूख तो भूख है. भेड़िये-सियारों को भी लगी और गिद्ध को भी. अपनी मौत कोई जानवर मरा नहीं तो खाये क्या? गिद्ध ने भेड़िये-सियारों से कहा कि भई मैं तो राजा बन गया हूँ, जनता को वचन भी दिया है, किसी को मार नहीं सकता. तुम लोग तो कुछ करो. पर मेरे रहते कुछ करोगे तो जनता मुझ पर ऊँगली उठाएगी. तो ऐसा करते हैं कि मैं आसमान का चक्कर लगाकर आता हूँ तुम भोजन का प्रबंध करो.

उसी दिन से गिद्ध आसमान की सैर पर निकल जाता है और भेड़िये-सियार रोज़ ही जंगल के कई-कई जानवरों का शिकार कर रहे हैं. गिद्ध के लिए कम, अपने लिए ज़्यादा मार-काट मचा रहे हैं. चील और बगुला को छोटी-छोटी मछलियों और कीड़े-मकोड़ो का शिकार करने में पहले भी कोई ज़्यादा परेशानी नहीं थी, अब खुली छूट है. बन्दर अब राजा के कार्यकर्त्ता थे सो उत्पात मचाने का उनका हक बनता था, जिसका वे भरपूर इस्तेमाल करते हुए जंगल तहस-नहस कर रहे हैं.

जब कई दिनों तक ये सब होता रहा तो जंगल के प्राणियों को समझ में आया कि ये तो भारी चूक हो गई, राजा बदलने के चक्कर में जंगल उजड्डों के हाथ चला गया. पर अब क्या करें? ऐसे में कुछ जानवरों ने प्रस्ताव रखा कि देखो भाई, हम सभी जानवरों के अपने-अपने दल तो हैं ही. तो ऐसा करते हैं कि अगली बार हम सब मिलकर जंगल को सँभालने कि कोशिश करते हैं. राजा भले ही कोई एक बनेगा पर मर्ज़ी का मालिक तो नहीं हो पायेगा.

जब जंगल के जानवरों की ये सभा चल ही रही थी तो ऊपर आसमान में उड़ते गिद्ध के प्रचारमंत्री कौवे ने ये देखा. उसने चील से पुछा कि ये क्या चल रहा है? चील ने आसमान में चीखते हुए कहा – “गिद्ध के उड़ने की वजह से जो हवा का दवाब बन रहा है उसे रोकने के लिए कुत्ते-बिल्ली सब इकट्ठे हो रहे हैं.”

– रजनीश साहिल.