निरीह और निर्दोष के जातीय रिश्तों का कानूनी बीजगणित : कनक तिवारी

निरीह और निर्दोष के जातीय रिश्तों का कानूनी बीजगणित   : कनक तिवारी

निरीह और निर्दोष के जातीय रिश्तों का कानूनी बीजगणित : कनक तिवारी

5.04.2018

रायपुर

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर अत्याचार का अपराध करने का निवारण करने के लिए, ऐसे अपराधों का विचारण करने के लिए रचित अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार) निवारण अधिनियम की समीक्षा करते हुए फैसला सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को दिया है। प्रतिक्रिया में दलित आक्रोश का उभार क्वथनांक पर पहुंचा। आनन फानन में भारत बंद का आह्वान हुआ। कई झड़पें और कुछ मौतें हुईं। सरकारी और निजी संपत्तियों का नुकसान भी हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने तीन चार मार्गदर्शी निर्देश विधायन को स्पष्ट करते तय किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जो अवधारणा विकसित, विस्तारित और व्याख्यायित करते अधिनियम की मूल भावना के संदर्भ में उसकी व्यावहारिकता को बूझने की कोशिश की, उसमें पेंच भी है। अभिमत निर्धारित किया कि इस अधिनियम के अधीन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के तहत यदि दुर्भावना के कारण आरोप लगाया गया है तो अभियुक्त को अग्रिम जमानत की पात्रता होगी। सैकड़ों प्रकरणों में अग्रिम जमानतें दी गई हैं।

 

प्रकरण में वरिष्ठ अधिवक्ता अमरेंद्र शरण को न्याय मित्र बनाया गया। केन्द्र सरकार की ओर से अतिरिक्त साॅलिसिटर जनरल मनिन्दर सिंह ने पक्ष समर्थन किया। प्रकरण में हस्तक्षेप करते विपरीत पक्षकारों के अधिवक्ता भी स्वयमेव आए। उनके तर्क कि प्राथमिकी दर्ज नहीं करना, अन्वेषण और चार्जशीट में देरी, मुकदमे में ढिलाई, सजा में नरमी वगैरह के चलते अधिनियम की असफलता पर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नहीं कहा। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमित्र से सुना कि पीड़ित दलित या आदिवासी शिकायत या प्राथमिकी के साथ और कोई साक्ष्य नहीं दे पाएं तो महज उस पर भरोसा करना न्यायसंगत नहीं होगा। आरोप में अज्ञात और दूषित कारण भी हो सकते हैं। यक्ष प्रश्न है दलित को अपशब्द कहे जाएं या मारा पीटा जाए और घटना स्थल पर कोई परिचित गवाह नहीं हो तो मामला कैसे बनेगा।

 

शिकायतें होती हैं निजी संबंधों में किसी खटास, स्वभाव की उद्दंडता या नेतागिरी का चस्का होने पर और दलितों आदिवासियों के प्रति अंतर्निहित घृणा या तिरस्कार के कारण। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करते माना कि अधिकतर प्रकरणों में आरोपी न्यायालयों से बरी हो गए। पूछा जा सकता है निचली अदालतों में अपराधियों के छूटने का प्रतिशत केवल दलित आदिवासी परिवादियों के संदर्भ में ही नहीं अन्य अपराधों के संबंध में भी कमोबेश वैसा ही है। सीबीआई तक के प्रकरणों में सजा मिलने का प्रतिशत उत्साहवर्धक नहीं है। केन्द्र सरकार ने कहा धारा 18 के प्रतिबंधों के बावजूद मुनासिब प्रकरणो में अग्रिम जमानत दी जा सकती है। केन्द्र के अधिवक्ता ने फिर उलटबांसी की। कहा 19 मार्च 2015 को केन्द्र सरकार ने प्रेस विज्ञप्ति निकाली कि झूठे मुकदमे दायर करने वालों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत कार्यवाही करने पर कोई रोक नहीं है। इसके बाद केन्द्र की ओर से पुनर्विचार याचिका दलित दबाव के बवंडर के चलते लगाई गई लगती है।

 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा अधिनियम के तहत निर्देश जारी करना अनिवार्य संवैधानिक कर्तव्य होगा। अधिनियम के दुरुपयोग से समाज में जाति विग्रह नहीं बढ़ने देने की भी उसकी जिम्मेदारी है। उदात्त शब्दावली में कहा संविधान एक जातिविहीन, एकरूप और सुगठित समाज की कामना करता है। सुप्रीम कोर्ट को यह भी क्यों नहीं कह देना था कि संविधान के बावजूद धर्म और जाति सूचक सभी सपने लगातार कुचले जा रहे हैं। इन सपनों को कौन सी विचारधारा कुचलती हैं, वोट बैंक बनाती हैं इतिहास में गुमनामी की खंदकें खोदने का सायास सियासी जतन करती हैं। कोर्ट की जांच अफसरों के बंद कमरों की फाइलों से आपस की बातचीत और कर्मचारी-अधिकारी परस्पर दुराचरण से उपजती न्यायिक बुद्धि के उद्वेलन के लिए प्रेरित करती रही। करोड़ों दलित और आदिवासी सामाजिक अन्याय की चक्की में पिस रहे हैं। जांच का दायरा संविधान को हेठी से बचाने उस व्यवस्था की गरदन तक भी पहुंचना चाहिए जो वंचित वर्ग को हलक में बिना चबाए निगल लेना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट के बहुत से न्याय निर्णयों में वर्षों से ऐसा निर्झर बहता हुआ नहीं भी दिख रहा है।

 

मामले के विचारण में केन्द्रीय तत्व रहा कि किन व्यापक परिस्थितियों में आरोपी अधिकारी या नागरिक निर्दोष होने पर भी इस अधिनियम में अनावश्यक रूप से जकड़े जा सकते हैं। अपीलार्थी डाॅ. सुभाष काशीनाथ महाजन नामक तकनीकी शिक्षा के निदेशक के रूप में मातहत अधिकारियों के खिलाफ अधिनियम के अंतर्गत अभियोजन की स्वीकृति नहीं देने के दोषी बनाए गए। कोर्ट को देखना था कौन सी परिस्थितियां हैं जिनमें दलित और आदिवासी सामाजिक और प्रशासनिक घृणा और अत्याचार के शिकार हैं। कैसे अंगरेजी साक्ष्य अधिनियम के अभियुक्त-उन्मुक्ति के उदार प्रावधानों के तहत अपना मामला सिद्ध कर पाएंगे। निचली अदालतें खरीदी जाती हैं, गवाह और पुलिस भी। निर्दोष नागरिकों को न्याय और सम्मान पाने का संवैधानिक अधिकार है। हर प्रकरण झूठा नहीं होता। हर सच्चे प्रकरण में सजा भी नहीं होती। दलित आदिवासी नेतागिरी के कारण कई दफ्तरों में भयातुर वरिष्ठ अधिकारी निर्भय होकर काम नहीं कर पाते होंगे। संसद की संसदीय समिति ने भी झूठी शिकायतों को लेकर अपनी राय दी है। उसका उल्लेख सुप्रीम कोर्ट ने किया। फैसले का अमल वाला हिस्सा आरोपियों का संरक्षक छाता है। वैसा नहीं किया जाने पर संबंधित अधिकारियों और मजिस्ट्रेट को अनुशासन की कार्यवाही और न्यायालय की अवमानना के जबड़ों में लेने का अधिकार है। यही बिंदु है जहां से दलित प्रतिरोध सड़कों पर जाता हुआ राजपथ का इतिहास भले नहीं लेकिन जनपथ की पगडंडी जरूर बनाता है। सरकार की पुनर्विचार याचिका में पीड़ित पक्ष के लिए न्याय प्रक्रिया के तहत उन्हें सदियों पुराने सामाजिक उत्पीड़न से बचाने की जुगत भी सुझाई जा सके तब तो सुप्रीम कोर्ट को भी पुनर्विचार करने का संवैधानिक दायित्व निभाना अनुकूल लग सकता है।

***

कनक तिवारी ,वरिष्ठ अधिवक्ता छतीसगढ हाईकोर्ट 

CG Basket

Related Posts

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account