छतीसगढ के बस्तर की अनजानी अनकही कहानियां : फागुन मड़ई गौरवशाली लोक परंपरा : राजीव रंजन प्रसाद

3.04.2018

राजीव रंजन प्रसाद
सांध्य दैनिक छतीसगढ में नियमित प्रकाशित

बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक  राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

दैनिक छतीसगढ सांध्य 

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दंतेवाड़ा के सांस्कृतिक परिचय को समझने के लिये यहाँ के लोकजीवन और लोकपर्वों को जानना चाहिये और इसके लिये फागुन मड़ई एक दर्शनीय लोकोत्सव है। बस्तर की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी के सम्मान में मड़ई, फागुन शुक्ल की षष्ठी से ले कर चौदस तक आयोजित की जाती है। दस दिनों तक चलने वाला यह आयोजन वर्तमान को इतिहास से जोड़ता है। फागुन मड़ई के आयोजन की प्रत्येक कडिय़ाँ भव्य और दर्शनीय हैं जो कि एक ओर आखेट प्रथा की परम्परागतता का प्रदर्शन हैं तो नाट्य विधा की पराकाष्ठा भी।

बसंत पंचमी के दिन, लगभग सात सौ वर्ष प्राचीन अष्टधातु से निर्मित, एक त्रिशूल स्तम्भ की दंतेश्वरी मंदिर के मुख्य द्वार के सम्मुख स्थापना की जाती है। इसी दोपहर को आमा मऊड रस्म का निर्वाह किया जाता है जिसके दौरान माई जी का छत्र नगर दर्शन के लिये निकाला जाता है तथा बस स्टेंड के निकट स्थित चौक में देवी को आम के बौर अर्पित किये जाते हैं। इसके पश्चात मड़ई के कार्यक्रमों का आरम्भ मेंडका डोबरा मैदान में स्थित देवकोठी से होता है जहाँ प्रात: पूरे विधि-विधान के साथ देवी का छत्र लाया जाता है। फायर करने के साथ साथ हर्षोल्लास तथा जयकारे के शोर में छत्र को सलामी दी जाती है। मंदिर के पुजारी परमेश्वरनाथ जिया एवं पं. विभूति भूषण मिश्रा दीप प्रज्जवल करते हैं एवं परम्परानुसार कलश की स्थापना की जाती है। पटेल द्वारा पुजारी के सिर में भंडारीन फूल से फूलपागा (पगड़ी) बांधा जाता है। आमंत्रित देवी-देवताओं और उनके प्रतीकों, देवध्वजों एवम छत्र के साथ माई जी की पालकी पूरी भव्यता के साथ परिभ्रमण के लिये निकाली जाती है। देवी की पालकी नारायण मंदिर लाई जाती है जहाँ पूजा-अर्चना तथा विश्राम के पश्चात सभी वापस दंतेश्वरी माता मंदिर पहुँचते हैं। इसी रात लगभग आठ बजे ताड-फलंगा धोनी की रस्म अदा की जाती है। इस रस्म के अंतर्गत ताड़ के पत्तों को दंतेश्वरी तालाब के जल से विधिविधान से धो कर उन्हें मंदिर में रखा जाता है, इन पत्तों का प्रयोग होलिका दहन के लिये होता है।    

  
राजपरिवार के उत्तराधिकारी को दंतेश्वरी देवी का प्रथम पुजारी माने जाने की लम्बी प्रथा है। प्राय: प्रधान पुजारी हरेंद्रनाथ ही पालकी के साथ नगर परिभ्रमण में सम्मिलित होते हैं किंतु कभी कभी राजा भी इसका उत्साहपूर्वक हिस्सा बनते हैं। नगर के जयस्तम्भ के पास सेवादारों द्वारा राजा का इस तरह विधिवत स्वागत किया जाता है कि देखने वालों को राजतंत्र पुनर्जीवित दिखाई पड़ता है। यहाँ से राजा अपनी कुलदेवी माँ दंतेश्वरी के दर्शन के लिये पहुँचते हैं तथा फागुन मड़ई के अन्य रस्मों में अपनी सहभागिता करते हैं। फागुन मडई अपने आगाज के पश्चात आयोजन की विविध श्रंखला से गुजरती है जिसमें पर्व के दूसरे दिन खोर खुंदनी रस्म होती है, जिसके दौरान पुन: माईजी की डोली निकाली जाती है। पर्व के तीसरे दिन नाच मांडनी का आयोजन होता है जिसमें मांदर-नगाड़े की थाप पर सेवादार माईजी के सम्मुख नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। इसके पश्चात अगले चार दिवस तक आखेट नृत्यों की परम्पराओं का निर्वहन होता है जिसके तहत लम्हामार, कोडरीमार, चीतलमार एवं गंवरमार का प्रदर्शन किया जाता है जो कि क्रमश: खरगोश, कोतरी, चीतल तथा गौर के शिकार पर आधारित आखेट नृत्य हैं। इन नृत्यों में जानवरों का स्वांग रचा जाता है जिसके लिये तूम्बे से बने मुखौटों का प्रयोग किया जाता है। 
फागुन मंडई में निभाये जाने वाले आखेट नृत्यों में सर्वाधिक लोकप्रिय गंवरमार को कहा जा सकता है जिसे देखने के लिये भारी अंख्या में दर्शनार्थी जमा होते हैं। गंवरमार नृत्य में गंवर (वन भैंसा) का प्रतीकात्मक शिकार किया जाता है। परम्परानुसार इसमे एक पात्र गंवर का स्वांग रचता है व उसका अभियन करते हुए वह शिकार के वातावरण को निर्मित कर देता है। अब इस गंवर को हाका लगाकर घेरा जाता है। स्वांग के अनुसार शिकार होने से बचने के लिये गंवर छिप जाता है। किसी सयान के इशारे पर जिसपर जिसपर देवी की कृपा हो गंवर को तलाश लिया जाता है तथा इसके साथ ही मंदिर के पुजारी द्वारा फायर कर गंवर का प्रतीकात्मक शिकार किया जाता है। आखेट जनजातीय समाज का अभिन्न हिस्सा है तथा नृत्य परम्पराओं में इसका प्रदर्शन फागुन मडई के प्रमुख आकर्षणों में से एक है। पूरी पूरी रात चलने वाले इन आखेट नृत्यों को बहुतायत संख्या में लोग देखने पहुँचते हैं।   

गंवरमार प्रथा के दूसरे दिन अर्थात त्रयोदशी को उत्सव पूर्वक मड़ई आयोजित की जाती है। इस दौरान मांईजी के छत्र के साथ दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी को पालकी में बिठाकर नगर का  भ्रमण कराया जाता है। इस परिभ्रमण में छत्र, सैकड़ों देवी-देवताओं के देवलाट आदि के साथ साथ बहुत बड़ी संख्या में ग्रामीण भी सम्मिलित होते हैं। अगले आयोजन के रूप में आंवरामार का आयोजन उल्लेखनीय है। इस दिन प्रथमत: मांईजी की पालकी में आंवला फल अर्पित किया जाता है जिसके पश्चात पुजारी, सेवादार, बारह-लंकवार व जनसामान्य दो समूहों में बंटकर एक दूसरे पर इसी आंवले से प्रहार करते हैं। यह जन-मान्यता है कि आंवरामार विधान के दौरान प्रसाद स्वरूप चढ़े इस फल की मार यदि शरीर पर पड़ती है तो व्यक्ति वर्ष भर निरोगी रहता है। इस आयोजन के दूसरे दिन सुरक्षित रखे गये ताड़ के पत्तों से होलिका दहन किया जाता है।

 दंतेवाड़ा के होलिकादहन की भी असामान्य कहानी है जो होलिका से न जुड़कर उस राजकुमारी की स्मृतियों से जुड़ती है जिसका नाम अज्ञात है, लेकिन कहा जाता है कि किसी आक्रमणकारी से स्वयं को बचाने के लिये उन्होंने आग में कूद कर अपनी जान दे दी थी। दंतेवाड़ा के ख्यात शनिमंदिर के निकट ही सति शिला स्थापित है जिसे इस राजकुमारी के निधन का स्मृतिचिन्ह मान कर आदर दिया जाता है। इसके सम्मुख ही परम्परागत ताड़ के पत्तों से होलिका दहन होता है एवं उस आक्रमणकारी को गाली दी जाती है जिसके कारण राजकुमारी ने आत्मदाह किया था। 
होली के पर्व पर ग्रामीण राजकुमारी की याद में जलाई गई होलिका की राख और दंतेश्वरी मंदिर की मिट्टी से रंगोत्सव मनाते हैं। एक व्यक्ति को फूलों से सजा कर होलीभांठा पहुंचाया जाता है जिसे लोग लाला कहते हैं। अब माईजी के आमंत्रित देवी-देवताओं के साथ होली खेलने का समय है। पुजारी सहित सभी सेवादार देवी-देवताओं के साथ सति-शिला स्थल से होलिका दहन की राख लेकर मेंढका डोबरा मैदान स्थित मावली गुड़ी पहुँचते हैं। यहाँ  रंगभंग रस्म का निर्वहन होता है जिसके बाद शंकनी-डंकनी नदी के संगम पर पादुका पूजन किया जाता है। इसी दौरान उपस्थित समुदाय पर अभिमंत्रित जल से छिड़काव कर उनका शुद्धिकरण इस मान्यता के साथ किया जाता है कि मेले में आयोजन के दौरान जाने अनजाने में हुए अपकारों के दुष्प्रभावों से शरीर मुक्त हो सके। पर्व के अंतिम चरण में आमंत्रित देवी-देवताओं की विदाई के साथ ही दक्षिण बस्तर का प्रसिद्ध फागुन मंडई महोत्सव संपन्न होता है।

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राजीव रंजन प्रसाद 

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