निजी व्यापार हेतु कोयला खनन व उर्जा नीति, दुष्प्रभाव एवं भविष्य की चुनोतियाँ, एक दिवसीय परिचर्चा दिनांक 9 अप्रैल 2018, वृन्दावन हॉल, सिविल लाइन, रायपुर समय सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक : छतीसगढ बचाओ आंदोलन

3.04.2018

रायपुर 

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मोदी सरकार ने अपने चुनिन्दा कार्पोरेट घरानों के मुनाफे के लिए एवं सम्पूर्ण कोयला क्षेत्र को निजी हाथों में सोपने के उद्देश्य से व्यापार हेतु कोयला उत्खनन की अनुमति प्रदान की हैं l दिनांक 20 फरबरी 2018 को कामर्सियल कोल माइनिंग निति को घोषणा की गई जिसके अनुसार कोयला खदानों का आवंटन निजी कंपनियों को किया जाएगा जिसमें अंत-उपयोग का या कोयले की ज़रुरतों का कोई प्रावधान नहीं होगा | निजी कंपनियां अब बिना रोक-टोक और बिना सवाल खनन कर इस कोयले को राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में बेचकर निजी मुनाफ़ा कमा सकेंगी | इस निर्णय ने यह पूर्णतया सिद्ध कर दिया है की मोदी सरकार को देश की जनता के औद्योगिक या सामाजिक विकास की, बहुमूल्य खनिज संपदा, सघन दुर्लभ वन्यक्षेत्रों का संरक्षण, या जनता के संवैधानिक अधिकारों की कोई चिंता नहीं है, अपितु सिर्फ चुनिन्दा कॉर्पोरेट को लाभ पहुंचाना एकमात्र उद्देश्य बन गया है |

 

यह नीति पूर्णतया 2014 में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध है जिसमें खनिज के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत का विवरण किया था – “खनिज देश के जनता की बहुमूल्य सम्पदा है जिसका उपयोग केवल जन-हित में और केवल ज़रुरत के आधार पर ही किया जाना चाहिए” | कमर्शियल मीनिंग नीति ने इस सिद्धांत की ना सिर्फ अनदेखी की है बल्कि मानो उसे सिरे से पलटकर सन्देश दिया है की खनिज केवल सरकार के प्रिय पूंजीपतियों की निजी संपत्ति है जिसमें देश का या देश की जनता का कोई अधिकार ही नहीं है |

 

इस निति के द्वारा वर्ष 1974 में कोयला के राष्ट्रीयकरण के प्रावधान को भी पुर्णतः ख़त्म कर दिया गया l हालाँकि 1992 में इस क्षेत्र का आंशिक निजीकरण हुआ, तब भी यह महत्वपूर्ण प्रावधान रखा गया की निजी कंपनियों द्वारा कोयला खनन केवल निर्दिष्ट किये अंत उपयोगों जैसा की ऊर्जा, सीमेंट, लौह-इस्पात, या एल्युमीनियम उत्पादन के लिए ही किया जा सकता है और केवल उतनी ही मात्रा में जितना अंत-उपयोग के लिए अत्यंत आवश्यक है l राष्ट्रीयकरण का प्रावधान और माननीय सुप्रीम कोर्ट की मंशा स्पष्ट रूप से थी कि बहुमूल्य कोयला व्यर्थ ना जाए और उसके उत्खनन के कारण जंगल-जमीन-जलस्रोतो एवं पर्यावरण के विनाश या जन-पलायन को सीमित किया जाए |

यहाँ महत्वपूर्ण हैं कि जनवरी 2018 में कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा प्रकाशित “कोल विज़न 2030” के अनुसार भारत के 2030 तक के कोयला की ज़रुरत की आपूर्ति करने के लिए कोई भी नए खदान के आवंटन या नीलामी की ज़रुरत नहीं है | इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2020 तक लगभग 900-1000 एम.टी.पी.ए. की कोयला मांग होगी जोकि 2030 तक बढ़कर अधिकतम 1300-1900 एम.टी.पी.ए. तक पहुँच जायेगी | इस मांग की पूर्ती के लिए वर्तमान चालू एवं अभी तक आवंटित खदानों की क्षमता 1500-1600 एम.टी.पी.ए. है, जोकि मांग-पूर्ती के लिए पर्याप्त है | यदि मांग अधिक भी रही तो वर्तमान खदानों की क्षमता में बढ़ौत्री की संभावना भी है | ऐसे में सरकार द्वारा प्रकाशित यह रिपोर्ट खुद ही कहती है की कम से कम तक वर्ष 2022 – 2025 से पहले किसी भी नई खदान की ज़रुरत नहीं है l सौर्य उर्जा के गिरते दामों के प्रभाव से और सभी बिजली उपकरणों की उर्जा कार्य क्षमता में इज़ाफे से, कोयले की मांग और भी कम हो सकती है जिससे वर्तमान में आवंटित खदानें भी आर्थिक संकट में आ सकती हैं |
इन्हीं सब विषयों पर चर्चा के लिए और कमर्शियल माइनिंग की नीति एवं उससे वन एवं खेती पर निर्भर समुदाय की आजीविका और पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभाव समझ और एक साझा रणनीति तैयार करने के लिए छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन एक दिवसीय परिचर्चा का आयोजन किया जा रहा हैं जिसमे आप सादर आमंत्रित हैं

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छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन
आलोक शुक्ला विजय भाई नंदकुमार कश्यप, रिनचिन

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