बैगा जनजातीय जो पहले से संकटग्रस्त जनजातीय में आते है वो आज विस्थापन के चंगुल में फंस गए है.: गांव से सीधे रिपोर्ट :, तामेश्वर सिन्हा

बैगा जनजातीय जो पहले से संकटग्रस्त जनजातीय में आते है वो आज विस्थापन के चंगुल में फंस गए है.: गांव से सीधे रिपोर्ट :, तामेश्वर सिन्हा

 

ग्राउंड रिपोर्ट

छत्तीसगढ़(कवर्धा) छत्तीसगढ़ का पश्चिमी क्षेत्र में रहने वाले बैगा जनजातीय(आदिवासी) जो छत्तीसगढ़ के मध्यप्रदेश के सीमा में भी बसे है, बैगा जनजातीय को विशेष जनजातीय संरक्षण के तहत रखा गया है, जो राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र भी कहलाते है, बैगा जनजातीय संकटग्रस्त जनजातीय में आ anते है. भारत में 75 जनजातीय को संकट ग्रस्त श्रेणी में रखा है. जिसमे छत्तीसगढ़ प्रदेश की  5 जनजातीय शामिल हैं जो पहाड़ी कोरवा, कमार, बैगा,  अबुझमाडीया, बिरहोर शामिल है. छत्तीसगढ़ में बैगा जनजातीय के विकास के लिए बैगा विकास प्राधिकरण बनाया है. लेकिन वर्तमान में स्थिति यह है कि आज बैगा जनजातीय स्वयं का अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत है. राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहलाने वाले बैगा जनजातीय जो पहले से संकटग्रस्त जनजातीय में आते है वो आज विस्थापन के चंगुल में फंस गए है,

सरकार के राष्ट्रिय टाइगर रिजर्व, खनिज उत्खनन के चलते आदिवासियों को जंगल से बेदखल किया जा रहा है. कई पीढियों तक जंगलो में निवास करने वाले बैगा आदिवासी आज मैदानी इलाके में सरकारी विस्थापन नीति के कारण पलायन कर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है. जंगल के रहवासियों को उनकी संस्कृति-सभ्यता जीवन यापन के साधन से दूर कर दिया जा रहा है .जबकि आदिवासियों व प्रकृति तथा वन्यजीव जंतु एक दुसरे के पूरक हैं . क्योकि आज प्रकृति वन संपदा सिर्फ आदिवासी क्षेत्रों में ही बची हुई है . प्रकृति की संरक्षण संवर्धन का नैसर्गिक ज्ञान आज पुरे विश्व में सिर्फ आदिवासी समुदाय के पास ही है इस बात को विश्व के विखाय्त वैज्ञानिक भी सीकर करते हैं .

 

भोरमदेव बाघ संरक्षण आने से बैगा आदिवासियों के गाँव खाली हो रहे

2005 में बोडला क्षेत्र के 7 गाँव(टोला) बैगा आदिवासियों को बेदखल कर दिया गया. जिसमे 37 परिवारों के लगभग 300 बैगा आदिवासी निवासरत थे. वन अमले ने इस विस्थापन को लेकर कहा कि बैगा आदिवासियों ने मांग किया था कि उन्हें जंगली पशुधन से हानि पहुँच रही है जिसके चलते उन्हें गाँव से बेदखल कर अन्य गांवो में बसाया गया. लेकिन जमीनी हकीकत के अनुसार सारे बैगा आदिवासियों को उनके स्थान से वन अमले द्वारा कानून के विपरीत जानकारी देकर भय पैदा कर बेदखल किया गया. जिसका कारण यह था कि 7 गाँव राष्ट्रिय बाघ अभ्यारण  के अंतर्गत आ रहे थे जिनका विस्थापन 2005 से शुरू कर दिया गया था, जिनमे गाँव क्रमश भवरटोक, बकोदा टेडगासाले, घनडबरा, थवरझोल, दुरदुरी, प्रतापगढ़ शामिल थे बैगा आदिवासी मजबूरन भय वश जंगल के नीचे आकर लोहारा तहसील से बोडला तक मैकल पर्वत श्रंखला के निचे बसे है. जहा आज भी उनका कोई विधिक  पुर्नवास नही किया गया है. जिसके कारण नारकीय जीवन जीने विवश हैं इन्हें मानवीय मुलभुत सुविधाएँ भी नहीं दी गई हैं. 2017 में वन विभाग के द्वारा जारी बाघ विस्थापन प्रभावित क्षेत्र  जारी लिस्ट के अनुसार 39 गाँव प्रभावित क्षेत्र है जिसमे से 11 गाँव कोर प्रभावित है 28 बफर जोन प्रभावित क्षेत्र है. जिनका विस्थापन का प्रक्रिया चालु होने वाला था लेकिन बैगा आदिवासियों के संवैधानिक विरोध को देखते हुए अभी विस्थापन का कार्य चालु नही हुआ है लेकिन 7 गाँव पहले से विस्थापन कराए जा चुके है जिन्हें 13 साल बाद 10 लाख रूपये देने कि घोषणा सरकार ने की है.

 

बैगा आदिवासियों का मूलतः जीविका का साधन प्रकृति पर निर्भर है जैसे हर्रा ,बेहडा, आंवला तेंदू, शहद, लकड़ी  आदि का संग्रहण कर जीवन-यापन चालते है खेती में बैगा आदिवासी नाला,पानी या उसी के आस-पास बस जाते थे और बेवर खेती(एक बार इस्तेमाल) कर अपना जीवन-यापन करते थे बैगा आदिवासियों को उनके मूल स्थान से हटा कर दुसरे जगह विस्थापन करने से उनके आजीविका ,रहन-सहन,संकृति व जैविकीय क्षमता में सीधा प्रभाव दिखाई दे रहा है . विशेष संरक्षित जनजातीय पहले से विलुप्ति के कगार पर है सरकार के मातहतों की असंवैधानिक  कारनामो से बैगा आदिवासी अब ढूंढे नही मिलेगे. आज भी बैगा आदिवासी जंगल में अपना जीवन आराम से व्यतीत कर रहे है जंगल के बिना आदिवासियों की कोई कल्पना नही किया जा सकता या यू कहे आदिवासी जल,जंगल,जमीन के बिना अधूरे है.

 

टाइगर रिजर्व के विरोध में उतरे आदिवासी

 

वन अमले के द्वारा जैसे ही टाइगर रिजर्व के तहत प्रभावित गांवो की सूची दी गई स्थानिय कोयतुर आदिवासी समिति ने 9 मार्च को हाईकोर्ट बिलासपुर में 120 किमी पैदल मार्च कर टाइगर रिजर्व के विरोध में जनहित याचिका लगाईं है. दूसरा आन्दोलन गाँव बचाओ आन्दोलन के बैनर तले 500 बैगा आदिवासियों ने 15 मार्च को पैदल लांग मार्च कर विरोध जताया.अब संसद द्वारा बनाई विधि ग्रामसभा(अनुच्छेद २४३ क ) की संवैधानिक भुतलक्षी आत्मा वंहा के लोगों के द्वारा ही उन्ही के लिए नीति बनाकर शासित होने की शक्तियों का प्रयोग कर राष्ट्रपति व राज्यपाल व अटर्नी जनरल ऑफ़ इंडिया तक बात करना चाहते हैं .  

 

बैगा आदिवासियों में भय का माहौल

हालांकि पुरे टाइगर रिजर्व प्रस्तावित बैगा आदिवासी गांवो में एक भय का माहौल निर्मित है. पहले तो उन्हें मालूम नही था कि वो अब गांवो से बेदखल होने वाले है लेकिन विभिन्न माध्यमो से पता चलने के बाद वो डरे हुए है. किसी भी हालात में अपना घर छोड़ना नही चाहते है जानकार बताते है बैगा आदिवासियों को बेदखल करने के लिए वन अमला द्वारा विधि विरुद्ध डराया-धमकाया जाता है. हाल ही में सुर्खिया भी बनी थी की बैगा आदिवासी के घरो को फारेस्ट के लोगो ने आग लगा दिया. हालंकि बैगा आदिवासी विस्थापन का पूरा विरोध कर रहे है और किसी भी सुरत में जल.जंगल.जमीन को छोड़ कर जाने को तैयार नही है.  बोडला ब्लाक के टाइगर रिजर्व कोर प्रभावित गाँव मछियाखोना जहा 25 बैगा आदिवासी परिवार और 12 गोंड आदिवासी परिवार निवासरत है वंहा  के ग्रामीण नैन सिंह गोंड कहते है कि हम किसी भी हालत में अपनी जमीन(माँ / आधार ) नही छोड़ेंगे, हमारे पास राजस्व का पट्टा भी मौजूद है वो आगे कहते है कि मध्यप्रदेश स्थित कान्हा टाइगर रिजर्व कोर प्रभावित रानवाही-बिठली के बैगा आदिवासी परिवारों का विस्थापन हुआ था जिन्हें सरकार से 10 लाख रूपये मात्र मिले थे आज उनका कोई ठिकाना नही है और उनके परिवार शहरी वातावरण में अनुकूलित नही होने के कारण वंश समाप्ति की और है वैसी स्थिति में हम जीना नही चहाते है.यह भारत के संविधान के अनुच्छेद २१ का उलंघन कर हत्या के समान ही है . मछियाखोना की ही बैगा आदिवासी महिला सोनती बैगा कहती है कि हम अपनी जमीन से डोलेंगे तक नही.सरकार की यह कैसी नीति है की मानव समुदाय जो हजारों वर्षो से वन संपदा जिव जंतुओं को बचाकर रखे हैं उन्हें ही जीवन से वंचित करने की कैसे सम्विधान है ?

पास में ही स्थित कोर प्रभावित गाँव बालसमुंद के भूतपूर्व उप सरपंच जोहर गोंड कहते है कि मेरे पास 5 एकड़ जमीन है जहा चना,मसूर,धान गेंहू का खेती करते है हम अपनी खेती कहा छोड़ के जाएंगे गाँव में 60 आदिवासी परिवार रहते है जिसमे 48 बैगा आदिवासी परिवार निवासरत है.

मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ की सीमा में लगा हुआ कोर प्रभावित गांव सिंघनपूरी के गाँव वाले कहते है की वन विभाग वाले हाल ही में गाँव का विकास करने की बात कह कर हस्ताक्षर करा लिए है. तो ६८ साल तक क्या विनाश कर  रहे थे ? गांवो में लगातार वन विभाग सर्वे कर रहा है, गाँव में दहशत का माहौल है. लेकीन हम आगे की संवैधानिक लड़ाई लड़ेंगे अपनी जमीन किसी भी हालत में नही छोड़ेंगे.

 

टाइगर रिजर्व घोषित होने से सरपंच ने भाजपा से नाता तोड़ा

टाइगर रिजर्व की जानकारी मिलने से अंजना ग्राम के भाजपा सरपंच नेकलाल मरावी ने भाजपा की पार्टी छोड़ दिया, वो कहते है की सरकार हम सब को बेवकूफ बना रही है, हमे हमारे मूल माटी से खदेड़ा जा रहा है, लोगो को बहला-फुसलाकर ग्रामसभा  सहमती प्रस्ताव में हस्ताक्षर करा लिया जा रहा है, पंडरीपानी पंचायत, शीतलपानी पंचायत में ऐसे ही वन विभाग वालो ने हस्ताक्षर करा लिया है.

जमीन के पट्टे नही बैगा आदिवासियों के पास

आप को बता दे कि कई पीढियों से बैगा आदिवासी जंगल में नैसर्गिक रूप से रह रहे है . यह तक की जब फारेस्ट विभाग जैसा कोई विभाग भी अस्तित्व में नही आया था तब से आदिवासी जंगल में रह रहे है. लेकिन अभी तक आदिवासियों के सामुदायिक वन पट्टे नही बने है, अब जंगल विभाग जंगल की जमीन होने का हवाला देकर बैगा आदिवासियों को उनके स्थान से खदेड़ देती है . टाइगर रिजर्व में भी विस्थापन होने पर मात्र 10 लाख देकर उस स्थान से बैगा आदिवासियों को हटाया जा रहा है उनके पुनर्स्थापन का सरकार के पास अभी कोई ठोस साधन नही है.आदिवासियों को प्राकृतिक रूढ़िगत संशाधनो के साथ पुनर्स्थापन नही किया जाता है तो विशेष संरक्षित जनजाति की विलुप्ति प्रकृति का अनुकूलन का नियम के अनुसार तय है.

सरकार के एक आंकड़े के अनुसार व्यकतिगत वन अधिकार पट्टे में कबीरधाम जिले के बोडला ब्लाक में विशेष पिछड़ी जनजातीय बैगा आदिवासियों को अप्रेल 2016 से मार्च 2017 तक 219 वन अधिकार पट्टा दिया गया है. विकासखंड पंडरिया में 45, लोहारा में 6 वन अधिकार पट्टे सरकार ने वितरित किए है

 

 

सरकार के विकास से मोहताज बैगा आदिवासी

आजादी के 70 वर्ष बाद भी बैगा आदिवासियों को सरकार मुलभुत सुविधाए मुहैया नही करा पाई है.सडक,बिजली, पानी से आज भी आदिवासी मरहूम है. एक जगह से दुसरे जगह अपना ठिकाना बनाना उचित मुलभुत सुविधा नही मिलने का कारण है . बोडला ब्लाक के बरेंडीपानी गांव के 200 जनसंख्या वाले बैगा आदिवासी पहाड़ी से निचे उतर के रहने लगे है. ऐसे ही कुमान,बन्दुकन्न्बा जेसे दर्जनों बैगा आदिवासी गांव है. बरेंडीपानी के शिक्षक शामे नेताम बताते है कि गाँव में स्कुल तो था लेकिन सडक पानी बिजली जैसी सुविधाए नही थी जिसके चलते अंजना गाव के सडक के पास आ के बस गए. कुमान गाँव के बैगा आदिवासी समनापुर आ के बस गए. सरकार आदिवासियों तक विकास नही पंहुचा पाने के चलते भी आदिवासी एक जगह से दुसरे जगह पलायन कर रहे है. सरकार की ६८ साल की आदिवासी विकास हेतु अनुच्छेद २७५ की दुरूपयोग की सम्भावना को बल मिलती है.

जंगल हमारा दाई है, शेर हमारा भाई है

कोयतुर समिति के अनुसार शेर जंगली पशु उनकी प्राकर्तिक आस्था में सुरक्षित रख कर बाघ की संरक्षण संवर्धन करना पीढियों से चला आ रहा है. आदिवासी समुदाय में टोटेम का प्रावधान 8 हजार वर्षों से एक जंतु ,पेड़ व पक्षी को संरक्षित करने का यूनिवर्सल नियम है इसका पालन पुरे विश्व के आदिवासी करते हैं . बैगाओ में भी टोटेम कुल गंड व्यवस्था है जिसके तहत कुछ टोटेम धारियों की वंश जिव बाघ है वे बाघ को कुलदेवता मानते है व् सेवा अर्जी करते है. आदिवासियों की कुल गंड व्यवस्था दुनिया की बेहतरीन प्रकृति संतुलन करने की वैज्ञानिक पद्धति है . यह विज्ञानं समत खाद्य श्रृंखला पर आधरित है. इतनी महत्वपूर्ण सिस्टम किसी भी समुदाय के पास नही है. परन्तु सरकार को जानकरी नही है व् वैज्ञानिको ने अब तक इसकी अध्ययन नही किये हैं .  परन्तु टाइगर प्रोजेक्ट में काम करने वाले सरकार अधिकारी आदिवासियों को शेर के संरक्षण के लिए विस्थापित किया जाना आवश्यक बता कर शेर के भाई आदिवासियों को अलग किया जा रहा है कई पीढियों से आदिवासी शेर के साथ रहे है. प्राक्रतिक जीवन, भोजन श्रंखला रहन-सहन में पशु-पक्षी, जीव जंतु पेड़ पौधे पहचानो की रक्षा संरक्षण संवर्धन प्राकृतिक पर्यावरण संतुलन आधार पर किया उसे आत्मसात कर आदिवासियत को बनाया रखा है.

घट रही है बैगा आदिवासियों की जनसंख्या.

2005-2006 के  जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ के पांच जिलो कबीरधाम, बिलासपुर, कोरिया, राजनांदगांव, मुंगेली में बैगा आदिवासियों की कुल जनसँख्या 71,862 थी जो अब घट कर  2011 -12 के जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ में बैगाओं की जनसँख्या 42, 838 मात्र रह  गई है. इनकी जनसँख्या लगातार घट रही है.जानकारी के अनुसार विशेष जनजातीय संरक्षण के तहत इनका नसबंदी कराना मनाही है लेकिन सरकार ने मनाही के बावजूद बैगा आदिवासियों के नसबंदी की खबर समय-समय पर आते रहती है. जबकि प्रशासन को इनकी जनसंख्या को अन्य समुदाय की जन्म दर वृद्धि के समान बनाये रखने के लिए समुचित कार्ययोजना बनाकर कार्य करनी चाहिए

गोदना बैगा आदिवासियों का सांस्कृतिक पहचाना .

बैगा आदिवासियों का सांस्कृतिक पहचान महिलाओं द्वारा हांथ पांव, माथे पर चेहरे पर, सीना में , गले पर,पिट के पीछे  गोदना गोदाया जाता है. उनके अनुसार यह उनका संस्कार है. बैगा आदिवासी बादी जाती के लोग गोदना गोदते है. जो कांटे का उपयोग कर गोधा जाता है, मशीन का उपयोग नही किया जाता, पारम्परिक रूप से ही गोधाया जाता है पुरुष लम्बे बाल रखते है है, और इनकी दाढ़ी भी बहुत कम आती है, पगड़ी भी बांधते है. गोदना विश्व के अन्य आदिवासी समुदाय में भी प्रचलित संस्कार है इसकी वजह सामाजिक परम्परा के साथ ही साथ आदिवासियों की पुरखो की प्राकृतिक वैज्ञानिक दक्षता  की ओर इशारा करती है . गोदना शरीर की श्रृंगार ही नही वरन पुरे समुदाय की सामुदायिक पहचान होती है .

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बैगा गांव से तामेश्वर सिन्हा की  रिपोर्ट 

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