हेमलता महिश्वर : दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन में प्रोफेसर हेमलता महिश्वर का कविता पाठ : प्यासा पानी और उपस्थित/अनुपस्थित

दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन में नासिरा शर्मा की अध्यक्षता में कविता पाठ.

25 .03.2018

 

कुछ दिनों पहले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में लड़कियों ने अपनी पढ़ाई के लिए पुस्तकालय तक बग़ैर किसी अवरोध के आने जाने की माँग करते हुए भयमुक्त परिसर के लिए हड़ताल, धरना, प्रदर्शन किया था। बाद में लड़के भी शामिल हो गए थे। इसी प्रदर्शन के दौरान एक लड़के को प्यास लगी तो साथी लड़की ने जवाब दिया -“प्यास लगी है तो नारा लगाओ।” मेरे लिए यह उत्तर बहुत बड़ा है। उसी को आधार बनाकर यह कविता लिखी गई।

 

 

 

 

प्यासा पानी

हॉं, प्यास लगी है
हॉं, सुनो मैं बता रही हूँ तुम्हें
मुझे प्यास लगी है
क्या तुम्हें नहीं लगी प्यास
मैं पानी मॉंग रही हूँ
मेरा पानी छिना जा रहा है
मेरा पानी छलकाया जा रहा है
मेरा पानी दूषित किया जा रहा है
मेरा पानी अटाया जा रहा है
मेरा पानी सुखाया जा रहा है
मेरा शीतल पानी कब तक शांत रहेगा?

मेरा पानी उबल रहा है
मेरा पानी खौल रहा है
मेरी ऑंच पहुँच रही है सब तक
खौलता पानी बुझाता नहीं प्यास
उबलता पानी सबको जला देता है
मैं शीतल पानी की तलाश में हूँ
सबको तलाश है शीतल पानी की
तुम्हें भी
प्यास जो लगी है
प्यास शीतल पानी से बुझेगी
अशांत, उबलते, खौलते पानी के
शीतल होने तक
प्यास लगी है तो नारा लगाओ
अपने प्यासे पानी की
प्यास बुझाओ

हेमलता महिश्वर

 

उपस्थित/अनुपस्थित – 1

चिपकी रह जाती है
झाड़न में जितनी धूल
उतना-सा भी
न रख पाईं वे
बचाकर
अपना मन
मनोंमन कई टन
झाड़कर
घर की धूल

उपस्थित/अनुपस्थित – 2

फटर-फटर
फटकती झाड़न
बस
चमकाती रहीं
घर का मन
झाड़न की तरह
गंदले होते रहे
उनके मन

उपस्थित/अनुपस्थित – 3

घर की
बेजान चीज़ों पर पड़ी
परतों को झाड़ते
धूल की
झड़ गए
ख़ुद के परागकण
एक चमक चढ़ती रही
दूसरी उतरती रही

उपस्थित/अनुपस्थित – 4

घर में
अपनी उपस्थिति का
एहसास दिलाते
वे दुनिया से
अनुपस्थित हो गईं

उपस्थित/अनुपस्थित – 5

सर्फ़ या सोडा मिलाकर
गर्म पानी में डूबाकर
फिर रगड़कर
ब्रश मारकर
निचोड़ दिया कटकटाकर
सूखाकर
कड़ी धूप में
फिर तैयार कर लिया है
स्त्री ने
झाड़न
दुबारा इस्तेमाल के लिए
अपना मन भी
यूँ ही धो-पोंछकर
फिर-फिर
रखती है
स्त्री
दुबारा धूल चढ़ाने के लिए

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हेमलता महिश्वर

 

 

 

 

 

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