भगत सिंह की चिंतन परम्परा, हमारा लोक और स्वाधीनता संघर्ष. : प्रताप ठाकुर

भगत सिंह की चिंतन परम्परा, हमारा लोक और स्वाधीनता संघर्ष. : प्रताप ठाकुर

 

( प्रताप के छोटे बेटे   प्रॉमीथियस   ने उनकी डायरी से व्यवस्थित करके सीजीबास्केट में भेजा हैं  ,यह लेख   उनके पापा छोटे-छोटे हिस्सों में डायरी में लिखे थे, उन्हें एक साथ व्यवस्थित करने की कोशिश की।] 

23.03.2018

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भगत सिंह को क्या केवल एक ही दिन याद किया जाये? उनके विचारों को रोज़ याद करने की ज़रूरत है। देश विखंडन की ओर जा रहा है इसलिए उनकी प्रासंगिकता आज ज़्यादा है। हमको अपने अतीत की लगातार सफाई करते रहना चाहिए। यदि हम इतिहास के काले पन्नों को हटा नहीं सकते तो उसे अनदेखा करना चाहिए.

आज़ादी के 40-45 वर्ष तक गोपनीय या साजिशी तरीके से उनकी वैचारिकी परम्परा को दरकिनार करके उन्हें पूजा की वस्तु बना दिया गया, क्योंकि उनका महत्व इतना अधिक था कि सत्ताधारी लोगों को लगा कि इनके आगे तो हमारा महत्व ही नहीं रहेगा, परन्तु  सन 70-75 के बाद इनके विचारों को दबाये रखा नहीं जा सका और ये विचार बड़ी तेजी से उभरकर आए। विश्व पुस्तक मेला में सबसे ज़्यादा बिकने वाली पुस्तकें गांधी, अम्बेडकर एवं भगत सिंह सम्बधी थी(सर्वे रिपोर्ट 2008)
भारतीय राजनीति में भगत सिंह का अतुलनीय व्यक्तित्व था, जो मात्र 23 वर्ष में ही राजनैतिक समझ से पूर्ण, महान अध्येता, विचारक देश-प्रेम से ओत-प्रोत, आत्मबलिदान के स्वामी थे।
उस समय के लोक में गीतों में वे हमेशा मौजूद रहे। हिंदी के बुद्धिजीवियों ने उस समय उन पर कोई साहित्य नहीं रचा। बनारस के एक व्यक्ति ने शहीदे आज़म भगत सिंह के नाम पर एक पुस्तिका लिखी। अब उनके ऊपर लगातार साहित्य रचा एवं प्रकाशित किया जा रहा है।
भगत सिंह ने गहरे एवं व्यापक अध्ययन के पश्चात अपने आलेख लिखे जिनमें, मैं नास्तिक क्यों हूं, बम का दर्शन, भारतीय क्रांति का आदर्श, क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा।
लोगों के सवालों का जवाब देने के लिए उन्होंने लगातार लिखा.

देश की आज़ादी का संघर्ष हमारा आखिरी लक्ष्य नहीं बल्कि पहला पड़ाव है। उनका लक्ष्य समाज को वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न बनाना, समानता का आदर्श, पूंजीवाद के चंगुल से आज़ाद करना तथा देशी और विदेशी दोनों तरह की पूंजीवाद से था.

वे एक क्रान्तिदृष्टा थे, जो अपने समय से आगे देख पाते हैं। भगत सिंह कहते थे कि ‘गांधी जी का आंदोलन अगर ऐसे ही चलता रहा तो यह अंग्रेजों के साथ एक समझौता भर होगा।’
आगे चलकर यह सही सिद्ध हुआ.

भगत सिंह की उम्र में उन जैसा पढ़ाकू बौद्धिक होना अद्भुत है। भगत सिंह ने जेल में 3 पुस्तकें भी लिखीं लेकिन किन्हीं लापरवाहियों के कारण वो पुस्तकें आज तक अप्राप्त हैं। उन्होंने पंजाब की भाषा समस्या पर आलेख लिखा था जिस पर उन्हें प्रथम पुरस्कार 17 वर्ष की उम्र में मिला था। वे 5 भाषाओं हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी उर्दू, संस्कृत के जानकार थे। भारत मे ऐसा कोई विचारक नहीं हुआ जिसने हिंदी में लिखा जबकि उन्होंने अंग्रेजी और पंजाबी में सबसे ज़्यादा पढा था.

“मैं नास्तिक क्यों हूं” कि रचना 5-6 अक्टूबर 1930 को की थी। 27 सितम्बर को लाहौर के अख़बार ‘द पीपल’ में यह लेख प्रकाशित हुआ तथा 1934 को तमिल में प्रकाशित हुआ था।
भगत सिंह एक नया जीवन दर्शन गढ़ रहे थे जिससे हमें महरूम होना पड़ा। भगत सिंह के साहित्य को प्रत्येक कॉलेज-स्कूल के छात्रों के बीच पहुंचाया जाए। उनकी याद में देश मे सबसे बड़ी लायब्रेरी खोली जानी चाहिये। हमें भगत सिंह की अध्ययन शीलता उनकी वैचारिकी को जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश करनी चाहिए, यही सही श्रद्धांजलि होगी.

“भगत सिंह का साथ देना सूरज का ताप झेलना है”।
“भगत सिंह ध्रुव तारे की तरह हैं।”
वन्दे मातरम के लोकप्रिय नारे के स्थान पर उन्होंने ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ का नारा दिया था।
हम अपने देश में उस भगत सिंह की खोजने की कोशिश कर रहे हैं जो ख़ो गया है जिसके रास्ते पर चलने की हम कोशिश करना चाहते हैं.

प्रताप ठाकुर को कुछ महीने पहले इस दुनियां से चले ग़ये .

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