खामोश किए जा रहे असहमति के सुर -एल इस हरदेनिया

खामोश किए जा रहे असहमति के सुर -एल इस हरदेनिया

खामोश किए जा रहे असहमति के सुर




14, SEP, 2015, MONDAY
एल इस  हरदेनिया 
[देशबन्धु ]
पिछले कुछ दिनों में हमारे देश में ऐसी घटनाएं घटी हैं और केंद्र और राज्यों में ऐसे फैसले किए गए हैं जिनसे हमारे प्रजातंत्रात्मक समाज की नींव कमजोर होना अवश्यंभावी है। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण कर्नाटक के एक महान क्रांतिकारी चिंतन की निर्मम हत्या है। 
30 अगस्त को प्रात: 8:30 बजे कर्नाटक के धारवाड़ नगर में प्रोफेसर एम.एम. कलबुर्गी की उन्हीं के निवास स्थान पर हत्या कर दी गई। उस दिन सुबह-सुबह दो युवक आए। उन्होंने घर की घंटी बजाई, अपना परिचय छात्रों के रूप में दिया। प्रोफेसर कलबुर्गी ने दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही हत्यारों ने गोली चलाई और उनकी हत्या कर दी गई।
यहां यह उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षों से कर्नाटक में सांप्रदायिक शक्तियों ने अनेक घिनौनी करतूतें की हैं। इन शक्तियों का विश्व हिंदू परिषद व बजरंग दल से सीधा संबंध है। 
एक सौ तीन पुस्तकों और 400 से ज़्यादा विचारोत्तेजक लेखों के सर्जक, साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त कन्नड़ साहित्यकार शिक्षाविद् और समाज सेवी डॉ. एम.एम. कलबुर्गी की धर्मान्ध सांप्रदायिक तत्ववादियों द्वारा नृशंस हत्या की देश के लेखकों, कलाकारों, रंगकर्मियों, बुद्धिजीवियों ने तीव्र भत्र्सना की है। भोपाल में भी आयोजित एक सभा में उन्हें भावभीनी श्रृद्धाजंलि दी गई। सभा में कहा गया कि यह दुर्भाग्यजनक है कि दो साल में तीन विचारकों की नृशंस हत्या की गई। अंधविश्वास और अंधश्रृद्धा विरोधी नरेन्द्र दाभोलकर की पुणे, तर्कशील शोधकर्ता और शिवाजी के जीवनी लेखक डॉ. पंसारे की कोल्हापुर और अब डॉ. कलबुर्गी की कर्नाटक में हत्या की गई। इनमें से किसी के हत्यारे आधिकारिक तौर पर पकड़े नहीं गए हैं। गौरतलब है कि ये हत्याएं भाजपा-शिवसेना शासित महाराष्ट्र और भाजपा के दक्षिण में प्रवेश द्वार कहे जाने वाले कर्नाटक में हुई हैं। 
धर्म के नाम पर स्वतंत्र चेता व्यक्तियों की हत्याएं की जा रही हैं। बंद दिमागी के विरुद्ध उठने वाली आवाजें खामोश की जा रही हैं। यह हमला केवल व्यक्तियों पर नहीं है, हमले की जड़ में विचार, स्वतंत्र विवेक और विचारधारा तो है ही, स्वतंत्रता, समता, न्याय, प्रगति समावेशी वैज्ञानिक चेतना वाले मूल्य भी हैं जो भारतीय संविधान की मूल प्रतिज्ञाओं में सन्निहित हैं। ये हमले लोकतंत्र की मूल आत्मा पर भी हैं।  ये हमले उस मिथक को भी ध्वंस करते हैं जिसमें हम अपने को सहिष्णु समाज और देश कहते आए हैं। असहिष्णु हमलावरों के संगठन बनाए जा रहे हैं। ये वे हैं जो असहमति या मित्र दृष्टिकोण को नाकाबिले बर्दाश्त मानते हैं और तर्क से असहमति को या विचार को खारिज करने की बजाय बंदूक से आवाजों को खामोश कर रहे हैं। 
अफसोस है कि इन हत्यारी प्रवृत्तियों को केंद्र के सत्तारूढ़ गठबंधन, भगवा राज्य सरकारों और कथित संघ परिवार के गठजोड़ का संरक्षण मिला हुआ है। सांविधानिक मूल्यों के इन हत्यारों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी तकलीफदेह ही नहीं निंदनीय भी है।  यह एक कटु सत्य है कि केंद्र में भाजपा की सरकार के गठन के बाद देश में एक ऐसा वातावरण तैयार हो गया है जिसका अप्रत्यक्ष प्रभाव बोलने और लिखने की आ•ाादी पर भी पड़ रहा है। न सिर्फ यह किसानों और मजदूरों के वर्षों के संघर्ष के बाद हासिल किए गए अधिकारों को भी छीना जा रहा है। 
भूमि अधिग्रहण विधेयक के द्वारा केन्द्र सरकार ने किसानों के अधिकारों पर कुठाराघात करने का प्रयास किया था।  प्रस्तावित विधेयक में यह प्रावधान किया गया था कि बिना सहमति प्राप्त किए सरकार, किसानों की जमीन अन्य उपयोग के लिए ले सकती है। चूंकि यह विधेयक संसद में पारित नहीं हो सकता था इसलिए बार-बार अध्यादेश से उसे कानून का रूप देने का प्रयास किया गया। किसानों के अधिकार छीनने वाले इस विधेयक का पूरे देश में जमकर विरोध हुआ।     
संसद के मानसून सत्र के बाद एक बार फिर से अध्यादेश के माध्यम से भूमि अधिग्रहण विधेयक को कानून का रूप देने का प्रयास किया गया। परंतु पूरे देश में इस कानून के विरोध ने व्यापक रूप ले लिया। कांग्रेस के नेतृत्व में अनेक दलों और संगठनों ने इसका विरोध किया। नतीजे में केंद्र सरकार ने फिर से अध्यादेश जारी करने का इरादा त्याग दिया। सच पूछा जाए तो यह देश के किसानों की महान विजय है।
इस तरह मजदूरों ने भी उनके अधिकारों पर हुए कुठाराघात का जोरदार विरोध करना प्रारंभ किया। इस विरोध के चलते भारत बंद का आह्वान किया गया। पिछले 2 सितंबर को हुआ भारत बंद अद्भुत रूप से सफल रहा। बंद में सम्मिलित मजदूर संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि मजदूर विरोधी कानून को वापस नहीं लिया गया तो एक लंबी अवधि के विरोध के कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई जाएगी।  
कुल मिलाकर केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद देश की जनता से वह सब कुछ छीने जाने का प्रयास किया जा रहा है जो उसने फ्रांस, रूस और अमेरिका की क्रांतियों से प्रेरणा पाकर हासिल किया था। केंद्र की सरकार ने कुछ ऐसे निर्णय लिए हैं जिनसे मीडिया के अधिकारों का भी हनन हो रहा है। केंद्र सरकार की ओर से एक ऐसा आदेश जारी किया गया है कि जिसके चलते अब दिल्ली के मंत्रालयों में पत्रकारों के प्रवेश के अधिकार सीमित हो गए हैं। 
अभी कुछ दिन पहले केंद्र सरकार ने तीन इलेक्ट्रॉनिक्स चैनल्स को चेतावनी दी और उनसे यह जानना चाहा कि उन्होंने क्यों कुछ विशेष समाचार प्रसारित किए। केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद देश में असहिष्णुता का वातावरण निर्मित हो रहा है।
मध्यप्रदेश में एक ऐसा कानून बन गया है जिसके माध्यम से अब एक जनहित याचिका पेश करना कठिन हो जाएगा। यदि आप कोई जन याचिका पेश करते हैं तो अदालत महाधिवक्ता से पूछेगी कि क्या इस याचिका पर विचार किया जाए? यदि महाधिवक्ता की राय विपरीत होती है तो उस याचिका पर विचार नहीं होगा। न सिर्फ यह बल्कि अदालत को यह भी अधिकार दिया गया है कि यदि कोई व्यक्ति बार-बार याचिका पेश करता है तो उस से यह अधिकार सदा के लिए छीन लिया जाएगा। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि इस कानून के माध्यम से राज्य की सरकार ने इस तरह के व्यक्तियों की अपील करने के अधिकार को भी छीन लिया है। 
महाराष्ट्र सरकार ने भी कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जिससे वहां के नागरिकों के अभिव्यक्ति के अधिकारों पर प्रतिकूल असर पड़ा है।
आ•ाादी न सिर्फ आम नागरिकों की छीनी जा रही है बल्कि अभी कुछ घटनाएं ऐसी हुईं हैं जिनसे केंद्रीय मंत्रिपरिषद के अधिकारों पर भी अंकुश लगाया गया है। 
संसदीय परंपरा के अनुसार प्रधानमंत्री को समान व्यक्तियों के बीच प्रथम माना जाता है। अर्थात् मंत्रिपरिषद के सभी सदस्य बराबर के अधिकार रखते हैं। प्रधानमंत्री सिर्फ मंत्रिपरिषद में प्रथम स्थान रखता है। अंग्रेजी में प्रधानमंत्री को फस्र्ट एमंग इक्वल कहा जाता है। परंतु नरेंद्र मोदी ऐसा नहीं सोचते हैं। अभी हाल में उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के मंत्रालय को जो सचिव दिया है उसे पदस्थ करने के पूर्व उन्होंने राजनाथ सिंह की राय को जानना उचित नहीं समझा। यहां तक कि जो अधिकारियों के नाम राजनाथ सिंह ने सुझाए उनमें से एक को भी उन्होंने गृह मंत्रालय का सचिव नहीं बनाया

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