? अजंता देव की कविताएँ : ० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

?  अजंता देव की कविताएँ :  ० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

? अजंता देव की कविताएँ : ० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

 

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|| अर्द्धसमाप्त जीवन ||

क्या यही मृत्यु है
जबकि सब-कुछ रह गया पहले सा
मैं भी मेरा जीवन भी
रह गया लोकस्मृति में

आशा रह गई पुनर्जन्म की
खीज रह गई कुछ नहीं पाने की
शरीर गया पर रह गया अशरीर
पृथ्वी रह गई विहंगम कोण से दिखती हुई
रह गई पिपासा जो नहीं मिटेगी जल से

क्षुधा स्वयं को खा रही है
निद्रा घेर रही है चेतना को
महास्वप्न में दिख रहा है तुम्हारा चेहरा
मेघ में आकृति की तरह
अनहद के पार से
पुकार रही हूँ तुम्हें
चातक की तरह नहीं
अपनी तरह

मृत्यु भी पूर्ण नहीं कर सकी
एक अर्द्धसमाप्त जीवन ।

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|| विपरीत रसायन ||

स्त्रियाँ नहीं बन सकतीं शराबी
यह कहा होगा कवि ने
मेरे हाथ से पीकर
अगर बन जातीं स्त्रियाँ शराबी
तो पिलाता कौन

मेरे प्याले भरे हैं मद से
केसर-कस्तूरी झलझला रही है
वैदूर्यमणि-सी
कीमियागर की तरह
मैं मिला रही हूँ 
दो विपरीत रसायन
विस्फोट होने को है
मैं प्रतीक्षा करूंगी तुम्हारे डगमगाने की ।

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|| मेरा मिथ्यालय ||

आमन्त्रण निमन्त्रण नहीं 
अनायास खींच लेता है अपनी ओर 
मेरा मिथ्यालय श्रेष्ठ जनों के बीच यहीं रचा जाता है 
कलाओं का महारास 
मेरे द्वार कभी बंद नहीं होते 
ये खुले रहेंगे तुम्हारे जाने के बाद भी 

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|| देखना कविता को ||

उसने कविता लिखी
चिड़िया पर, नदी पर, पेड़ पर

और मुझसे कहा
चिड़िया तुम हो
नदी तुम हो, पेड़ तुम हो

मै तब कवितायें सिर्फ सुनती थी
मुझे मालूम न था
चिड़िया के साथ पिंजरा
नदी के साथ बाँध
और पेड़ के साथ कुल्हाड़ी होते है
मै तब सच में कवितायें सुनती थी

एक दिन अचानक मैंने खुद को देखा
हाँ सच
चिड़ियाँ मै हूँ
नदी मै हूँ
पेड़ मै हूँ
और उसी दिन से मैंने
कविता को सुनना नहीं
देखना शुरू कर दिया.

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  || अन्य जीवन से ||

किस लोक के कारीगर हो 
कि रेशे उधेड़ कर अंतरिक्ष के 
बुना है पटवस्त्र 
और कहते हो नदी सा लहराता दुकूल 
होगा नदी सा 
पर मैं नहीं पृथ्वी सी कि धारण करूं यह विराट 
अनसिला चादर कर्मफल की तरह 
मुझे तो चाहिए एक पोशाक
जिसे कांटा-छांटा गया हो मेरी रेखाओं से मिलाकर 
इतना सुचिक्कन कि मेरी त्वचा 
इतने बेलबूटे की याद ना आए 
हतभाग्य पतझर 
सारे रंग छीन गये हों 
अन्य जीवन से 
इतना झीना जितना नशा 
इतना गठित जितना षड्यंत्र 
मैं हर दिन बदलती हूं चोला श्रेष्ठजनों की सभा में 
आत्मा नहीं हूं मैं 
कि पहने रहूं एक ही देह 
मृत्यु  की प्रतीक्षा में 

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  || नया स्त्री प्रबोध -१ ||

अगर पुरुष तुम्हारी देह माँगे
तुम उसकी आत्मा माँगो
और अगर वह तुम्हारी आत्मा माँगे
तुम्हें उसकी देह माँगनी चाहिए ।

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   || नया स्त्री प्रबोध -२ ||

केश सुखाए बिना
शरीर सुखाना व्यर्थ है
तुम फिर से गीली हो जाओगी ।

✍? *अजंता देव*

*० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

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