अंग्रेज़ी कवयित्री क्रिस्टीना रोजेटी की कविता का मूल अँग्रेज़ी से अनुवाद : सोनाली मिश्र. : दस्तक के लिए प्रस्तुति : अंजू शर्मा

आज प्रस्तुत हैं अंग्रेज़ी कवयित्री *क्रिस्टीना रोजेटी* की कुछ अनूदित कविताएँ। इन कविताओं का अनुवाद किया है युवा लेखिका *सोनाली मिश्र* ने। सोनाली काफी समय से क्रिस्टीना की कविताओं पर काम कर रही हैं। ये अनुवाद कविता कोश में मूल अंग्रेजी कविताओं सहित संकलित है

|| मृत्यु से पहले मृतक ||

ओह! परिवर्तन और अकेलापन, कितना बदलाव और कितना अकेलापन !
सूखी पपड़ाई मुस्कान और निर्जन अकेली आँखों के साथ;
बदले हुए, फिर भी वही, बहुत कुछ परिचित से, 
थोड़े बहुत परिचित से;
यह जीवन की गोधूली के बेला का वादा था !
हम अतीत के साँचों में तनतनाते हुए अकड़ते हुए बढ़ते रहे,
जीवन भर के झूठ छाया से जड़ता की परछाईं बनाते रहे,
हमने आने वाले बरसों में अच्छे दिनों के आने की उम्मीद की,
मगर वे तो रहे राजा और रानी की बीती कहानी की तरह,
समय के साथ वे आस की बंजर पंखुड़ियाँ बनते गए,
खोता गया वर्तमान और हमारा आने वाला कल,
सब कुछ खो गया, हथेली से रेत की तरह फिसलता रहा, 
इतना खोया जब तक मृत्यु ने बन्द न कर लिया खुले दरवाज़े को,
भंगुर झंकार से सदाबहार झंकार तक,
इतना निर्जन और खो गया हमेशा के लिए….
सदा के लिए ….

|| बनी रहें माँएँ हमारी ||

बनी रहीं माँएँ हमारी, कैसी बेचारी सी निरीह प्यारी, 
बहनें हमारी खनकती रहीं बन जीवन भर रमणीय सुकुमारी, 
खनकती है आज भी हमारे कानों में उनकी अनमोल यादें, 
“सुनो, सीखो न जैसे हमने सीखा ज़िन्दगी में अपने आप से, 
और तपती रहीं अपने नियमों में बँधकर कर्म पथ पर, 
चलती रहो जैसे हम चलती रहीं अपने विश्वास के बल पर, 
और जलाती रहीं, पीड़ा तले भी अपनी उम्मीदों का दिया, 
धूप में सहमती रहीं और जंग में करती रहीं खुद पे भरोसा” 
नहीं पता कि हमें देख भी पाती होंगी या नहीं वे, 
पर अगर वे देखती होंगी हमें पीड़ा से मिलते हुए, 
तो स्वर्ग से धरा पर कैसे आती होगी उनकी नज़र, 
क्या नहीं बहते होंगे आंसू, प्यारी आँखों से टूटकर 
ओह, प्रसन्न आँखें! जिनके आँसू सूख चुके हैं, 
फिर चाहे तुम हमें देख सको या नहीं!

|| झाँसी के गोलघर में ||

फड़फड़ा रही थी लौ ज़िन्दगी की,
बुझ रहे थे कई आँखों में, 
आस के हज़ारों और लाखों दिये,
आ रहे थे नज़दीक आतताइयों के झुण्ड,
लपट लिए, विध्वंस की आहट लिए,

तौला स्केने ने भय से पीली पड़ती अपनी युवा चंचल पत्नी को —
“क्या समय आ गया है?” — “हां, समय आ गया है”
ज़िन्दगी के लबालब प्याले को हर क्षण पी सकने वाले वे युवा,
सहमे और हक्के-बक्के खड़े थे उस त्रासदी से, 
उस विनाश लीला से, विस्फोटक बारूदों से,

अपनी बाँहों को उसकी बाँहों के नज़दीक लाकर,
अपने गालों को उसके गालों से सटाकर,
उसकी भवों के करीब अपनी पिस्तौल लगाकर,
“ओह, प्रभु, उसके लिए उसे माफ़ करना”

“क्या बहुत दर्द होगा?- ‘नहीं मेरे स्वामी:’
काश मैं हम दोनों की पीड़ा ख़ुद ही पी सकती,
काश मैं सारी वेदना ख़ुद में ही समेट सकती,
हिम्मत करो, प्रिय, क्यों काँप रहे हाथ तुम्हारे,
मैं तैयार हूँ, प्रिय संग तुम्हारे चलने को 

चुम्बन और चुम्बन : ‘यह पीड़ा नहीं है,
चुम्बन करते-करते मरना है,
एक चुम्बन और – ‘और एक और’
अलविदा………. अलविदा

|| गाया था उन तीनों ने एक साथ प्रेम को ||

गाया था उन तीनों ने एक साथ प्रेम को, 
भिगोया एक ने अपने लाल रसीले होंठों पर प्रेम को,
और बहने दिया प्रेम को उत्तेजना के पीलेपन से देह के पोरों तक,
फिर सहेजा एक बर्फ़-सी कोमल लड़की ने प्रेम को,
नुमायशी काग़ज़ी ताज़ा फूलों की तरह,
तो प्रेम के बाद सिमट गया नीलापन असन्तुष्टि का किसी में,
वीणा के अधूरे अतृप्त तारों के अधूरे स्वर की तरह,
गीत गाती आवाज़ों पर प्रेम का क्या बोझ रहा,
एक का प्रेम डूब गया निर्लज्जता की ओढ़नी तले,
और एक बन नामालूम पत्नी चखती रही स्वादहीन प्रेम,
और एक का नीलापन हो गया समाहित मृत्यु के अन्धेरे में,
बन गयी दो कहानियाँ प्रेम में, मृत्यु की अंकशायिनी, और पाया
उसे हर विवादों के बाद, 
और एक बन सन्तुष्ट परजीवी डूबी रही झूठी मिठास में,
प्रेम की देहरी पर तीन कहानियाँ दम तोड़ती रहीं, 
अधूरी ही मरती रहीं

*|| संगम ||*

जैसे गहरे सागर से मिलकर नदियाँ होना
चाहे एकाकार,
खो जाना चाहे गहराई में,
हाँ, मैं भी चाहती हूँ दुबकना,
उसमें कहीं दूर.
जैसे उफनती नदियाँ मचाती हैं शोकाकुल शोर,
अपने अकेलेपन का,
मैं भी विलाप करती हूँ,
अकेलेपन के उत्सव का।

जैसे सूरज के साथ मिलकर
एक सुकुमार गुलाब,
खिला देता है ख़ुद को,
खोल देता है अपनी देह के द्वार,
वैसे ही मैं खोल देती हूँ, अपने ह्रदय के द्वार,
उस के लिए,
हो जाती हूँ, मैं अनावृत्त
पूरी तरह से उसी के लिए।

जैसे खो जाती सुबह की पवित्र ओस,
सूरज की पहली किरण में,
हो जाती हैं मुक्त,
वैसे ही चाहती हूं मैं भी मुक्त होना,
जैसे नहीं छोडती ओस कोई निशानी,
धरती के हरे चेहरे पर,
सुनो मेरी भी कोई भी छाप नहीं,
उसके चेहरे पर,

जानती हैं नदियां कि आखिर जाना उन्हें कहाँ हैं.
ओस भी खोज लेती ही है रस्ता अपना,
धूप दुलार कर हँसाती है, खिलाती है
गुलाब को,
तो क्या मेरे अकेले बीते हुए कल में,
वह दस्तक देने आएगा?
दुखद बीता हुआ कल,
उसे अन्तत: पाएगा?

*मूल अँग्रेज़ी से अनुवाद : सोनाली मिश्र*

साभार कविता कोश से

⭕ *दस्तक के लिए प्रस्तुति : अंजू शर्मा*

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