? भिलाई, कम्युनिस्ट और लेनिन : ज़ाकिर हुसैन

? भिलाई, कम्युनिस्ट और लेनिन : ज़ाकिर हुसैन

?

( फोटो भिलाई के रशियन कांप्लेक्स की 14 साल पुरानी है, इस पेंटिंग की रंग अब और ज्यादा उड़ चुकी है)

 

(कहानी बड़ी और टुकड़ों में है,निष्कर्ष आप खुद निकाल सकते हैं)

1. भिलाई में स्टील प्लांट की स्थापना के लिए तत्कालीन सोवियत संघ के साथ समझौते के बाद प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को खुफिया ब्यूरो (आईबी) ने एक रिपोर्ट भेजी। जिसमें आशंका जताई गई थी कि सोवियत संघ के कम्युनिस्टों के भिलाई आने पर उस वक्त तेलंगाना में सुलग रहे कम्युनिस्ट आंदोलन को खाद-पानी मिलेगा और कम्युनिस्ट आंदोलन का विस्तार छत्तीसगढ़ में भी हो सकता है। इससे देश की आंतरिक सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। पं. नेहरू ने इस रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया।

2. पं. नेहरू ने कई सीनियर आईएएस को दरकिनार कर एक युवा आईएएस एमकेके नायर को डीजीएम (एडमिनिस्ट्रेशन) बना कर भिलाई भेजा, ताकि भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के काम में प्रशासनिक दिक्कतें दूर हो। नायर भिलाई में अपना काम कर रहे थे लेकिन तत्कालीन मध्यप्रदेश विधानसभा में कांग्रेसी विधायकों ने पं. नेहरू के नाम एक चिट्ठी तैयार की। जिसमें नायर पर प्रांतवाद को बढ़ावा देने के साथ आरोप यह भी लगा कि वो सोवियत इंजीनियरों और केरल में कम्युनिस्टों के बीच की संपर्क मजबूत करने कड़ी के तौर पर काम कर रहे हैं। पं. नेहरू ने नायर को दिल्ली तलब किया और अपने ऑफिस में कांग्रेसी विधायकों की वह चिट्ठी दिखाई। इसके बाद नायर के सामने ही वह चिट्ठी फाड़ कर डस्टबिन में डाल दी।

3. भिलाई स्टील प्रोजेक्ट में भर्ती होने वाले शुरूआती दौर के सभी इंजीनियरों को सोवियत संघ के अलग-अलग स्टील प्लांट में तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया। भिलाई से जाने वाले सभी इंजीनियरों के लिए ट्रेनिंग के साथ-साथ सबसे जरूरी काम होता था मॉस्को में सुरक्षित रखा गया लेनिन का शव (ममी) देखना। हमारे यहां ताजमहल के दीदार की तरह वहां भी लंबी लाइनें लगती थी। 1956 में रूस में ट्रेनिंग लिए रिटायर अफसर नरेंद्र सिंह छत्री बताते हैं तब भिलाई के इंजीनियरों को सोवियत अफसर लाइन से अलग व्यवस्था कर ममी दिखवाने ले जाते थे।

4. लेनिन की ही तरह उनके उत्तराधिकारी जोसेफ स्टालिन (निधन-1953)के शव को भी ममी बना कर मास्को में रखा गया था। लेकिन 1961 में इस ममी को ‘डेड’ करना पड़ा। तब लेनिन की बराबरी का मान स्टालिन को अमर करने की कोशिश खत्म कर उनका शव प्रसिद्ध क्रेमलिन वॉल के हवाले कर दिया, जहां तमाम सोवियत नायकों के स्मारक एक ही जगह पर हैं। सोवियत संघ में ट्रेनिंग लिए भिलाई के रिटायर इंजीनियर वीएन मजुमदार बताते हैं रूस में ममी सिर्फ लेनिन की है और बाकी तमाम प्रमुख नेताओं के स्मारक क्रेमलिन वॉल में ही है। वहां लेनिन का बुत तोड़े जाने की खबरें जरूर आईं थी लेकिन ममी आज भी वहां रखी है और आज भी वहां हजारों लोग जाते हैं।

5. 1970 में लेनिन जन्म शताब्दी समारोह मनाया गया तो भिलाई के कलाकारों ने लेनिन के आदर्शों और नीतियों की पृष्ठभूमि में भारत-सोवियत संघ के संबंधों को दर्शाती हुई एक नायाब पेंटिंग बनाई थी। यह पेंटिंग भिलाई स्टील प्लांट की ओर से सोवियत संघ की लेनिन शताब्दी समारोह समिति को भेंट की गई थी। यह पेंटिंग मॉस्को के म्यूजियम ऑफ रेवेल्यूशन में लगी हुई है।

6. उद्योगों को लेकर लेनिन की नीतियों पर उनके बाद भी सोवियत संघ चलता रहा। इसलिए भिलाई स्टील प्लांट में आज भी सोवियत तकनीक टिकाउ है। भिलाई की रेल एंड स्ट्रक्चरल मिल के एक गैर कम्युनिस्ट कर्मचारी बता रहे थे-जर्मनी की तकनीक से शुरू की गई नई यूनिवर्सल रेल मिल आए दिन हांफ रही है, जबकि 60 साल पुरानी रेल मिल आज भी सफलतापूर्वक पूरे भारत को उच्च गुणवत्ता की रेलपांत बना कर दे रही है।

7. लेनिन भिलाई के एक कोने में अभी भी हैं लेकिन रंगत उड़ी हुई है। भिलाई में रूसी इंजीनियरों के रहने के लिए सेक्टर-7 में बनाए गए रशियन कांप्लेक्स में प्रवेश द्वार पर लेनिन की बड़ी सी पेंटिंग लगी है। लेकिन सोवियत संघ टूटने के बाद भिलाई से रशियन कम होते गए और फिर इस कांप्लेक्स के आवास भारतीय इंजीनियरों को दिए जाने लगे। इस बीच लेनिन की पेंटिंग से रंग हवा होते रहे। आज बोर्ड को देख कर अंदाजा होता है कि यहां कभी लेनिन की पेंटिंग रही होगी।

 

8. मैं निजी तौर पर मानता हूं कि बुत किसी का बनना नहीं चाहिए। पिछले दिनों नक्सल हमले के शहीद सैनिक के परिवार पर एक स्टोरी करने गया तो उस शहीद की विधवा भी यही कह रही थी कि हम प्रतिमा बनवाना ही नहीं चाहते क्योंकि उससे अपमान होता है।

**
खैर, अभी देश में मूर्ति-मूर्ति खेलने का दौर आया हुआ है। इस बीच कुछ लोगों को लेनिन विदेशी और आतंकवादी भी नजर आ गए हैं। लेनिन की नीतियों पर कहना ‘बड़ी बात’ होगी लेकिन इतना तो साफ है समाज में बराबरी की सोच की वहां की नीतियों के आधार पर हमारे यहां भिलाई जैसे तमाम पब्लिक सेक्टर तैयार हुए और सफलतापूर्वक चल भी रहे हैं। अब जिनकी बिरादरी के ‘खून में ही कारोबार’ हो उन्हें पब्लिक सेक्टर या इसका विचार देने वाले लेनिन क्यों नहीं आतंकवादी या विदेशी लगेंगे? बाहर के मुल्क हमारे बहुत से राष्ट्रीय नेताओं के बुत लगे हैं और बहुत से मुल्कों में तो हमारे राष्ट्रीय नेताओं के नाम पर स्मारक, चौक या गली का नाम तक है। अगर वहां भी ऐसे ‘सु स्वा’ पैदा हो गए तो…? खुदा खैर करे।

***

CG Basket

Related Posts

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account