लाल श्याम शाह एक आदिवासी की कहानी : कनक तिवारी 

लाल श्याम शाह एक आदिवासी की कहानी : कनक तिवारी 

11.03.2018

 

मन में यादों के कुछ तहखाने बनते जाते हैं। कई यादें दरवाजे के पीछे पड़े कूड़े या कमरे की छत पर लगे मकड़जालों की तरह निगाहों से छूट जाती हैं। कभी उन्हें कमरे में बंद कर हम ताले की चाबी गुमा देते हैं। यक-ब-यक वह चाबी कभी मिल जाती है। तो उन अंधेरे तहखानों में यादों की सीढ़ी दर सीढ़ी उतरते एक तरह का रोमांच होता है। वर्षों कैद पुरानी हवा का भभका उठता है। वह वर्तमान की ताजा हवा ज्यादा जीवनदायक लगती है। सब कुछ धीरे धीरे दिखाई, सुनाई याद आते ही यादों की धरोहर और ताले की चाबी को अपनी छाती से लगा लेता है। भूला हुआ अतीत याद रहे अतीत से ज्यादा प्यारा होता है। जैसे कोई खोया हुआ बच्चा या बुजुर्ग वर्षों बाद किसी मेले ठेले में मिल गया हो। ताले की उस चाबी का नाम है लाल श्याम शाह-एक आदिवासी की कहानी। चाबी हमसे गुम गई थी। सुदीप ठाकुर ने उसे ढूंढ़ निकाला। भूगोल इतिहास में तब्दील हुआ.

मेरा घर पैतृक शहर राजनांदगांव के नाभिकेन्द्र में है। बाईं ओर शहर का सबसे पुराना और बेहतरीन सिनेमा घर श्रीराम टाॅकीज और उससे लगा हुआ 1952 की भयानक आग के बाद बिना दरवाजे का लोकप्रिय होटल मानव मंदिर। दाईं ओर शहर की बौद्धिक सियासी और श्रमिक गतिविधियों का केन्द्र जयस्तंभ चौक। उससे लगा सब्जी बाजार। दोनों केन्द्रों के बीच में मेरे घर के सामने मेरे मित्र और सुदीप के चाचा विद्याभूषण ठाकुर का ठाकुर बुक डिपो। विद्याभूषण उतनी ही धीमी आवाज में बोलने वाले जैसे रायपुर के वी.के. मुंशी एडवोकेट याने हमारे मिंटो भइया। बेलौस बिंदास तरह तरह के नेता और सदाबहार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और कभी कभी मुक्तिबोध का वह पड़ाव। उसके पड़ोस में मेरे चचेरे भाई शिवकुमार शास्त्री का घर। वे ज्योतिषी, सियासतदां और आलू की सब्जी की तरह लोकप्रिय नागरिक। एक बड़े से तखत पर अपनी चौकी के सामने बैठते। सामने लोहे की बेंच। न जाने कितनी बार लाल श्याम शाह से वहां बात हुई होगी। 1957 से राजनांदगांव छूटा। फिर लौटकर जा ही नहीं पाया। 1972 में नौकरी छोड़ने के बाद फिर कभी कभार मिलना होता रहा। कई बार बात करते उन्होंने अपने हाथ से मेरे कंधे को दबाकर कुछ बताने की कोशिश की। एक खास नीली कमीज आधे बांह की कुरते की लम्बाई की वे जब पहनते तब मुझे ज्यादा खूबसूरत लगते। ऐसा मैं उनसे कहता था। यह कहने में गुरेज नहीं है कि आदिवासी समस्याओं की उनकी बाल प्राइमर का मैं भी एक छात्र था.

आज उनके बारे में कुछ नहीं। सुदीप की किताब के बारे में भी फिर कभी। बोलूंगा नहीं लिखूंगा। आज तो भूमिका लेकर रामचंद्र गुहा की सलाह कि लाल श्याम शाह की विरासत को आगे बढ़ाने के बारे में सोचें। पूरी कौरव सभा का नाम अब इलेक्ट्राॅनिक मीडिया है। कोई कृष्ण नहीं होता और न ही आदिवासी महिला कोई द्रौपदी है। जिस लाल श्याम शाह की किताब का आज विमोचन है। और जो सुदीप के लेखन को लेकर मेरी पसंद के लेखक रामचंद्र गुहा ने उम्मीद जताई है। हम और आप जैसे कुछ पागल इस लड़ाई में दफ्न भले हो जाएं लेकिन कुदरत के नायाब तोहफे आदिवासी समाज का राजनीतिक और आर्थिक शोषण रोकने में कम से कम उस टिटहरी की भूमिका तो जरूर करें जो चित लेटकर अपने पैरों से आसमान को थामने की कोशिश तो करती है। सरकार और कारपोरेटियों का विकास हमारा मुगालता तोड़ सकता है लेकिन टिटहरी का आत्मविश्वास और हौसला उसे कभी मरने भी तो नहीं देता।

**

CG Basket

Related Posts

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account