? || मेरा हद भी रंग अनहद भी रंग || ” प्‍यारेलाल वडाली को नमन ” ✍? दस्‍तक के लिए यूनुस खान : प्रस्तुति : अनिल करमेले 

11.03.2018

जाने माने गायक प्‍यारेलाल वडाली विदा हो गये। पूरनचंद वडाली और प्‍यारेलाल वडाली दोनों को मिलाकर बनते थे वडाली बंधू। वडाली बंधुओं से मेरा परिचय बहुत पुराना नहीं है। उतना पुराना नहीं जितना लता आशा या रफी से है। असल में करीब पंद्रह बीस बरस पहले उन्‍हें टीवी पर गाते हुए सुना देखा था। और लगा ये तो कमाल हैं। फिर जी म्‍यूजिक ने एक बेहतरीन अलबम रिलीज किया और उसके आसपास तो वो फिल्‍मों में भी आ गये। 

अगर आपने ना सुना हो तो अमृता प्रीतम के उपन्‍यास ‘पिंजर’ पर बनी चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्‍म ‘पिंजर’ के दो गाने सुनिए। गुलज़ार का लिखा—‘दर्दा मारया माहिया, मेरे दर्द छुड़ा….किस्‍मत अंधी बावरी, मेरा हाथ छुडा’। फिल्‍म में इस मोड़ पर गाना आता है कि आपको बेचैनी के भँवर में फंसा लेता है। गुलज़ार के अलफ़ाज़ और वडाली बंधुओं के स्‍वर का जादू है कि दिल में फांस सी चुभती हैं ये पंक्तियां—‘किकली कलीर की/ जां जाए हीर की/ जागे भी जगाए भी/ खांसी बूढ़े फकीर की’। 

इसी फिल्‍म में एक और गीत था वडाली बंधुओं का। ‘वारिस शाह नू’। ये अमृता प्रीतम की रचना है। और बहुत ही मार्मिक है। अगर हम पंजाबी नहीं जानते तो बहुत मुश्किल नहीं है, इंटरनेट पर इसका अनुवाद खोजना और समझना। 

‘उठ दर्द मंदा-दियां दर्दिया 
उठ तक अपना पंजाब 
आज बेले लाशां विशियां 
ते लहू तो बाली चढ़ाव।‘ 

ये अमृता की चिट्ठी है वारिस शाह को। कि उठो,तुमने प्रेम का पाठ पढ़ाया था ना वारिस शाह। देखो क्‍या हाल है तुम्‍हारे पंजाब का। वो खून से सना है। इसे गाने के लिए दर्द के जिस समंदर की ज़रूरत होती है—वो वडाली बंधुओं में था। पंजाब के गायकों में दर्द और मस्‍ती का बेमिसाल जोड़ होता है। वहां की मिट्टी ही ऐसी है। 

वडाली बंधू जिस दर्द को शक्‍ल देते हैं—उससे गुज़रकर यकीन करना मुश्किल होता है कि वो जिंदगी भर पहलवान ही रहे। गाना तो देर से शुरू किया जब वालिद साहब यानी ठाकुरदास वडाली का आदेश हुआ। फिर तो सुरों का एक सफर शुरू हो गया। बहरहाल… बात फिल्‍मों में वडाली बंधुओं की गायकी की चल रही थी तो आपको बता दें कि अश्‍विन चौधरी की फिल्‍म‘धूप’ में भी उन्‍होंने गाया था। इसे निदा फाजली ने लिखा था। इस गाने में निदा साहब लिखते हैं—‘इक पलड़े में प्‍यार रख दूजे में संसार/ तोले ही से जानिए किसमें कितना भाव’। 

इसके अलावा उन्‍होंने शाहिद कपूर वाली फिल्‍म‘मौसम’ में ‘इक तू ही’ गाना गाया था। इसे इरशाद कामिल ने लिखा था। ‘कांच पे चलना आंच में जलना’… अदभुत है ये गाना। इस गाने का एक संस्‍करण हंस ने भी गाया है। वडाली बंधुओं ने फिल्‍मों में कम ही गीत गाये। पर जो गीत मुझे अद्भुत लगता है वो मित्र राजशेखर का लिखा गीत है—‘ओ रंगरेज़ मेरे’… जो ‘तनु वेड्स मनु’ में गाया था। 

‘मेरी हद भी रंग, सरहद भी रंग दे 
अनहद भी रंग दे 
मस्जिद मंदिर मैकद भी रंग दे’। 

वडाली बंधुओं ने बाबा फरीद की रचनाओं का एक खास अलबम ‘फरीद’ भी किया था। ‘तू माने या ना माने दिलदारा असां तो तैनूं रब मनया’, ‘दम दम करो फरीद’, ‘टुरया टुरया जा फरीदा’, ‘तुम इधर देख लो या उधर देख लो’जैसी नायाब रचनाओं से सज़ा ये अलबम सचमुच अलग ही तरंग चढ़ा देता है।

मैंने अपने रेडियो प्रोग्राम में भी यही कहा था कि वडाली बंधु कुछ भी गायें- यूं लगता है प्रार्थना में हमारे दोनों हाथ उठ गये हैं। वो मुझे प्रार्थना का पवित्र स्‍वर लगते हैं। प्‍यारेलाल वडाली के जाने से हमारी दुनिया अपूर्ण हो गयी है।
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