एक हवेली की कहानी, तस्वीरों की ज़ुबानी ! –शीबा असलम फ़हमी

10.03.2018

बरसों की बेरुख़ी, तन्हाई, बेनूरी का ‘शिकवा’, जैसे सूद समेत दूर कर दे कोई,
जैसे सदियों की हक़तल्फ़ी का कफ़्फ़ारा कोई एक लम्हे में अदा कर दे,
जैसे कोई अपना सब कुछ लुटा के माशूक़ा को संवार दे,
जैसे कोई लाचार दोशीज़ा को मल्लिका ए आलिया बना दे!

एक इश्क़ की तख़लीक़ देख के आये हैं कल हम. दीवानो को तो पता नहीं होता की अपनी कैफ़ियत में वो क्या कर गुज़रते हैं, अलका और शारिक़ रज़ा भी अपने जूनून में क्या कर बैठे है उन्हें पता नहीं है. इन दोनों ने मिल के अपने पुरखों की उजाड़ दहलीज़ को संवारने का ख़्वाब देखा, और देखते ही देखते उसे दुल्हन बना दिया. तेरहवीं सदी की एक हवेली, जो माज़ी की परतों में छुप कर बे-नामों-निशाँ हो जाने वाली थी, उसे ईंट दर ईंट, मंज़िल दर मंज़िल, न सिर्फ़ जवान कर दिया बल्कि बेनज़ीर ख़ूबसूरती से आरास्ता कर दिया.

और की खूबसूरती और हुनरकारी भी इन्होने कांठा की अपनी इस आबाई विरासत में ला कर जमा कर दी है. अलग-अलग मुल्कों का फ़र्नीचर, परदे, शीशे, क़ीमते पत्थर, मास्क, मॉडल, क़ालीनें, ख़ूबसूरत तोहफ़े बड़ी ज़ौक़मंदी से हवेली के अलग अलग हॉल, कमरों, दालान और गलियारों में सजाए गए हैं. कुल 8 बेडरूम्स जो मेहमानो को दिए जाते हैं, में अलग अलग थीम की सजावट है.
छत पर यमुना को ताकती नक़्क़ाशीदार बुर्जी ऐसी दिलकश की बस दिल चाहे की तानसेन वापिस आ के आसन जमा लें और सितार छेड़ दें.
ये जगह एक प्यारी सी जन्नत है जिसमे बाग़ ए बहिश्त भी है.
हवेली की मालकिन अलका रज़ा ट्रेनिंग और पेशे से सहाफ़ी हैं, लेहाज़ा उनकी फ़िक्रों में आसपास का समाज शामिल है. इस बेपनाह ख़ास हवेली के दरवाज़े इलाक़े के उन बच्चों के लिए खुले हैं जिन्हे अपनी तालीम में खास मदद की ज़रुरत है. इस वक़्त 80 बच्चे हवेली में खास ट्यूशन पाते हैं और इन बच्चों की क्लास में कारकर्दगी का पूरा ट्रैक ख़ुद अलका रखती हैं. इसके अलावा इलाक़े की उन ख़्वातीन के हुनर और इल्म से एक सेंटर भी चल रहा है जिन्हे सहारे की ज़रुरत है. आप को देख के ख़ुशी होगी की एक क़स्बे में रहते हुए ये लोग कैसा फैशनेबुल सामान तैयार कर रही हैं जो किसी भी दिन ‘फ़ेब इण्डिया’ के टक्कर का है.

फ़िलहाल इस हवेली के दरवाज़े ख़ास महमानो के लिए ही खुलते हैं. मेरी दुआ है की अलका और शारिक़ अपने इस ख़ूबसूरत जुनून को मंज़र ए आम करने की हिम्मत जुटा सकें, उन्हें एक ऐसा बिज़नेस मॉडल मिल जाए जो इस नाज़नीं हवेली की परवरिश और हिफाज़त दोनों कर सके. अभी तो ये सिर्फ़ उनके दीदार के लिए है जो इसमें उस नज़ाकत और नरमी से क़दम रखें और बरतें जिससे ना हवेली पर ज़र आये न इस ख़्वाब की ताबीर करनेवालों के दिल लरज़ें. अल्लाह इस नगीने को नाक़दरे और बे-ज़ौक़ महमानो से महफूज़ रखे.
मैंने इजाज़त नहीं ली थी इसलिए मिसेज़ और मिस्टर रज़ा की तस्वीर और पूरा पता यहाँ नहीं दे रही, फिर भी जिन्हे इश्तियाक़ हो वो ढूंढ ही लेंगे.

**हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा**
– इक़बाल

 

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शीबा अस़लम फ़हमी का कैमरा और शब्द

निम्न फोटो के  Photographar ka naam hai OMAIR FEHMI 

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