⚫ भरथरी गायिका 69 वार्षिय सुरुज बाई खांडे का निधन. बिलासपुर.

⚫ भरथरी गायिका 69 वार्षिय सुरुज बाई खांडे का निधन. बिलासपुर.

10.03.2018

लोक कलाकार सुरूज बाई खांडे का  निधन आज बिलासपुर छत्तीसगढ़ केएक निजी अस्पताल में हो गया, सोवियत रुस में भारत महोत्सव मे शिरकत की थीं इन्हें मध्यप्रदेश शासन ने देवी अहिल्या बाई सम्मान से नवाजा गया.

सुरुज बाई खांडे का अन्तिम संस्कार बिलासपुर के सरकंडा स्थित मुक्ति धाम मे दोपहर तीन, चार बजे किया जावेगा उक्ताशय कि जानकारी उनके पति श्री लाखन खांडे ने दी।
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बेेेहद गरीबी मेें बीता  जीीवन उनका .

बिलासपुर. रुस, दुसाम्बे, अमला के अलावा लगभग 18 देशों में अपनी कला का डंका बजाया और लोक गायिकी को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। आज उसके सामने दो वक्त की रोटी का संकट है। आर्थिक संकटों से जूझ रहे इसपरिवार की सुध लेने वाला भी कोई नहीं है। हम बात कर रहे हैं भरथरी को अपना जीवन समर्पित करने वाली सुरूज बाई खांडे की।

आज भी भरथरी के माध्यम से अपनी कला को लोगों के समक्ष प्रस्तुत करती हैं। कई सम्मान प्राप्त करने के बाद भी सूरूज बाई को उम्मीद है कि उन्हें पद्मभूषण या पद्मश्री के सम्मान से नवाजा जाएगा। पूरा जीवन लोक गायिकी में बिताने के बाद भी आज उसे आर्थिक संकट से गुजरना पड़ रहा है। मात्र दो हजार रुपए में महीने का गुजारा करना पड़ रहा है।

 

सात साल की उम्र में शुरू की थी गायकी 

भरथरी छत्तीसगढ़ की प्रमुख लोक गीत है और अपना जीवन सूरूज बाई खांडे ने लोक कला को समर्पित किया है। सात साल की उम्र से भरथरी गाने की शुरुआत अपने नाना स्वर्गीय राम साय घितलहरे के मार्गदर्शन में किया था और आज 60 साल से अधिक उम्र के बाद भी भरथरी गा रही है।

जैसे-तैसे चलाती है घर

सूरूज बाई खांडे ने बताया कि अपने जीवन के अंतिम सास तक अपनी कला के माध्यम से प्रदेश के गौरव को बढ़ाऊंगी। गीत गाने का अवसर तो सरकार देती है लेकिन जब घर-परिवार चलाने की बात होती है तो थोड़े से पैसे में ही गुजारा करना पड़ रहा है। परिवार में पति लखन खांडे के अलावा दो बेटे व एक बेटी है। पति की उम्र भी बहुत अधिक है और बच्चों को भी नौकरी नहीं मिली है जिससे छोटा-मोटा कार्य करते हुए जीवन जीना पड़ रहा है।

अहिल्या सम्मान में मिली राशि से बनवाया घर
आज से 15 वर्ष पहले अविभाजित मध्यप्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सूरूज बाई खांडे को अहिल्या सम्मान से नवाजा था। प्रतीक चिन्ह के साथ 1 लाख रुपए नगद राशि दी गई थी। उसी राशि से छोटा सा घर बहतराई में आबादी क्षेत्र में बनवाया था और आज उस घर को तोडऩे की बात की जा रही है।

एेसे में सूरूज बाई बहुत परेशान है और अपने परिवार के लिए दूसरा घर कैसे बनाऊंगी इस बात से बहुत चिंतित है। क्योंकि उसके पास कुछ है नहीं जो भी मिलता है वह जीवन-यापन के लिए ही कम है।

विदेशों में भी दी है प्रस्तुति

सूरूज बाई ने बताया कि वह रुस, दुसाम्बे, अमला के अलावा लगभग 18 देशों में अपनी कला की प्रस्तुति दे चुकी है। इसके साथ ही देश में भोपाल, दिल्ली, इंदौर, सिरपुर, ओडिशा, महाराष्ट्र जैसे लगभग सभी राज्य में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी है। उसके साथ के लोक कलाकारों को पद्मश्री के सम्मान से नवाजा जा चुका है लेकिन अभी भी उसे उम्मीद है कि सरकार उसे पद्मश्री से सम्मानित अवश्य करेगी।

एक्सीडेंट की वजह से लिया रिटार्यमेंट

सूरूज बाई को लोक कलाकार के तौर पर एसईसीएल में चतुर्थ कर्मचारी वर्ग में नौकरी दी गई थी। लेकिन कुछ वर्ष पूर्व मोटर साइकिल से एक्सीडेंट होने की वजह से नौकरी करना संभव नहीं रहा इसलिए नौ साल पहले ही रिटायरमेंट लेना पड़ा। पेंशन के तौर पर मात्र दो हजार रुपए मिलते हैं और उस दो हजार से घर चलना महंगाई के इस दौर में शायद ही किसी के बस की बात हो।

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पत्रिका से आभार सहित 

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