फासिज्म की पहली प्रयोगशाला त्रिपुरा: लेनिन की मूर्ति को बुलडोजर से गिराने के निहितार्थ और  हमले के समय वाम की रक्षा में जनता चुप क्यों ? :  जगदीश्वर चतुर्वेदी

फासिज्म की पहली प्रयोगशाला त्रिपुरा: लेनिन की मूर्ति को बुलडोजर से गिराने के निहितार्थ और  हमले के समय वाम की रक्षा में जनता चुप क्यों ? :  जगदीश्वर चतुर्वेदी

 6.03.2018

 

 

जगदीश्वर चतुर्वेदी की वाल से 

कल खबर आई कि त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति बुलडोज़र चलाकर गिराई गई। यह निंदनीय और फासिस्ट घटना है। लेनिन का भारत से गहरा संबंध रहा है । लेनिन ने स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारत की जनता और यहां के स्वाधीनता सेनानियों की जमकर मदद की ,भारत की पहली विदेश में बनी सरकार को उस समय मान्यता दी जिस समय दुनिया में कोई हमारे साथ न था।

मोदी एंड कंपनी के पीछे पूरी फासिस्ट मशीनरी जमीनी स्तर पर काम कर रही है।भाजपा के किसी भी नेता की बंगाल या दूसरे किसी भी राज्य में कम्युनिस्टों ने कभी मूर्ति नहीं गिराई उलटे बंगाल में संघीनेताओं की मूर्तियाँ तो लगवाईं।

सवाल यह है ये मूर्तियाँ क्यों लगाते हैं ? लेनिन -मार्क्स-माओ आदि की मूर्ति क्यों लगाते हैं ? क्योंकि इन नेताओं के विचारों और आचरण से हजारों लाखों लोग प्रेरणा लेते हैं ये नेता आज भी कम्युनिस्टों के सम्माननीय नेता हैं और कम्युनिस्ट पार्टियाँ वैध ढंग से काम कर रही हैं।जनता के जनादेश के बाद सरकार बनाकर या नगरपालिका या पंचायत चुनाव जीतकर काम करती रही हैं ।इसलिए जब वे लेनिन की मूर्ति गिरा रहे थे तो जनादेश ,जनाकांक्षा और संविधान की सीधे अवहेलना कर रहे हैं।

लेनिन की मूर्ति यदि सामान्य मूर्ति है और उसका कोई अर्थ नहीं है तो फिर उसको बुलडोज़र से गिराने की जरूरत क्यों पडी ? वे जानते हैं कि वे जब लेनिन की मूर्ति गिरा रहे थे तो असल में त्रिपुरा की शांतिकामी -क्रांतिकारी जनता के सपनों को तोड रहे थे , लेनिन असाधारण क्रांतिकारी थे ,उनसे हमारे देश के अनेक विचारक-स्वाधीनता सेनानी और क्रांतिकारी गहरे प्रभावित थे। लेनिन ने किताबी क्रांति को वास्तविक क्रांति में साकार किया।लेनिन पर चला बुलडोज़र सारे देश के कम्युनिस्टों के लिए खुली चुनौती है कि वे अब खुलकर जनता में जाएं और बताएँ फासिज्म की पहली प्रयोगशाला त्रिपुरा होने जा रहा है

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हमले के समय वाम की रक्षा में जनता चुप क्यों ?

 

त्रिपुरा में अभी जिस तरह की हिंसा फूटी है ममता सरकार के पहले कार्यकाल में ठीक वैसी ही हिंसा और गुंडोंके हमले माकपा के दफ़्तरों ,कार्यकर्ताओं के घरों पर हुए ,हजारों परिवार तबाह हुए।दिलचस्प पहलू यह कि चौंतीस साल शासन करने के बाद यदि हर मुहल्ले में ३४लोग भी पार्टी की हिमायत के लिए नहीं निकले तो इसके कारणों की गंभीरता से पड़ताल करनी होगी।

 

बंगाल में जिस तरह के बर्बर जुल्म माकपा के कार्यकर्ताओं ने झेले है वह अकल्पनीय है।ठीक यही स्थिति त्रिपुरा की होने जा रही है। वहाँ जुल्म कुछ ज्यादा होगा साम्प्रदायिक और पृथकतावादी संगठन खुलकर अपने ढंग से मनमाने हमले करेंगे।

आश्चर्य की बात यह माकपा बंगाल में सत्ता से जाते ही इस कदर कमजोर हो गयी कि हरेक गुंडा हमले करता चला आ रहा था।आज सच्चाई यह है कि माकपा की सांगठनिक रीढ़ को ममता ने तोड दिया, अनेक लोग टीएमसी में चले गए या उसके समर्थक बन गए या फिर उन्होंने राजनीति ही छोड दी।इसका दुष्परिणाम यह निकला कि संगठन खाली हो गया। जबकि वहाँ जो लोग माकपा को वोट देते थे अब माकपा के अलावा किसी को भी वोट देने को तैयार हैं ।

सवाल यह है पार्टी की जनता में साख क्यों गिर गई ? इस सवाल का उत्तर पार्टी आज तक नहीं खोज पाई है।
यही हालात त्रिपुरा में पैदा हो गए हैं।संभावनाएं यही हैं जिस तरह बंगाल में माकपा को जिंदा दल के रुप में नहीं देख पा रहे हैं, ठीक कुछ समय बाद त्रिपुरा में यही हाल होगा।

मैं वर्षों से एक सवाल का उत्तर खोज रहा हूं कि माकपा इस दशा को क्यों प्राप्त हुई ? सरकार में रहते हुए संगठन और जनता ये दोनों माकपा के पास से कैसे चले गए ? चुनाव हारना सामान्य बात है, लेकिन ऐसा क्यों होता है जब विपक्ष हमले करने लगे तो क्रांतिकारी जनता भी साथछोड दे ?
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