हेल्थ फॉर आल के लिए पब्लिक हेल्थ पर काम करने की जरूरत / स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए कारगर नहीं है हेल्थ इंश्योरेंस… :  डॉ. अजय खरे स्मृति व्याख्यान में जन स्वास्थ्य के मुद्दों पर आज हुए व्याख्यान :  रिपोर्ट राहुल शर्मा .

 

4 मार्च 2018 

भोपाल 

देश में हेल्थ सेक्टर में क्यूरेबल हेल्थ पर जोर दिया जा रहा है, जबकि पब्लिक हेल्थ पर जोर दिया जाना चाहिए। ऐसी परिस्थितियों कोनिर्मित करना जरूरी है, जिसमें लोगों को बीमारियां नहीं हो और यह तभीसंभव है, जब राजनीतिक एवं आर्थिक संदर्भों में स्वास्थ्य के मुद्दों को देखाजाए। ये बातें आज डॉ. अजय खरे स्मृति व्याख्यान 2018 में जन स्वास्थ्यविशेषज्ञों ने कही। व्याख्यान का आयोजन जन स्वास्थ्य अभियान, मध्यप्रदेशएवं आल इंडिया फैडरेशन आफ गवर्नमेंट डाक्टर्स एसोसिएशन द्वारा संयुक्तरूप से हिन्दी भवन में किया गया। व्याख्यान में ‘‘वर्तमान परिस्थितियों मेंसार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल की चुनौतियां एवं विकल्प’’ के तहत दोविषयों पर वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए।

 

सामाजिक अर्थशास्त्री एवं जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ रवि दुग्गल ने ‘‘सार्वभौमस्वास्थ्य देखभाल और स्वास्थ्य बीमा’’ विषय पर मुख्य वक्तव्य देते हुए कहाकि यूएसए और भारत में ही मार्केट आधारित हेल्थ केयर है। यूएसए मेंइंश्योरेंस के बावजूद एक बड़ी आबादी स्वास्थ्य सुविधा से वंचित है। इसकाअर्थ है कि हेल्थ इंश्योरेंस कारगर नहीं है। पूंजीवादी देशों में भी स्वास्थ्यराज्य के जिम्मे है। आल्माआटा में सभी के लिए स्वास्थ्य की बात की गईथी। 1982 में पहली बार स्वास्थ्य के सार्वभौमिकीकरण की बात भारत मेंहुई। जीडीपी में बढ़ोतरी हुई और ग्रामीण एवं दुरस्थ आबादी को लाभ मिला।उस दौर में सभी स्वास्थ्य केन्द्रों में डॉक्टर्स भी होते थे। स्थिति बेहतर थी।उस समय सरकारी कंपनियां दवाइयां बनाती थी। ड्रग्स प्राइज पर नियंत्रणथा। लेकिन नब्बे के उत्तरार्द्ध में हेल्थ केयर में यूजर चार्जेज लगने लगा।उसके बाद सरकारी क्षेत्र में डाक्टर्स कम होने लगे। हेल्थ केयर में कार्पोरेट केप्रवेश के बाद निजी का हस्तक्षेप बढ़ा। न्यू टेक्नालाजी के आने पर निजी क्षेत्रज्यादा बढ़े।

 

निजी इंश्योरेंस कंपनियों के आने के बाद स्वास्थ्य का निजीकरणतेजी से बढ़ा। भारत में जीडीपी का ढाई फीसदी खर्च करने पर भी गुडप्राइमरी हेल्थ एंड रेफरल केयर हो सकता है। नीति आयोग का नजरिया हैकि क्यूरेटिव केयर से सरकार को हट जाना चाहिए। इससे स्वास्थ्य कीस्थिति में ज्यादा गिरावट आएगी। मध्यप्रदेश में प्रति व्यक्ति हजार रुपएस्वास्थ्य पर खर्च होता है। आज स्वास्थ्य देखभाल पूरी तरह से सप्लायर्सयानी मार्केट पर आश्रित है। एनएचपीएस यानी इंश्योरेंस में कई समस्याएं है।कंपनियां सोशल काॅज के लिए नहीं है। वे कमाई करेंगी। सरकार जो पैसाइंश्योरेंस कंपनियों को देना चाहती है, उसके बजाय उतना खर्च वह हेल्थसिस्टम को बेहतर करने में लगाए। कम्युनिटी मॉनिटरिंग सिस्टम को इंप्रूवकरने की जरूरत है। प्रति व्यक्ति कम से कम 3500 रुपए खर्च किया जानाचाहिए।

येनेपोया मेडिकल कालेज, मैंगलौर, कर्नाटक के प्रोफेसर डा. अनुराग भार्गवने ‘‘भारत में महामारी के संदर्भ में जन स्वास्थ्य के मुद्दों की समीक्षा’’ विषयपर मुख्य वक्तव्य देते हुए टीबी और डायबिटिज पर चर्चा करते हुए भारत मेंजन स्वास्थ्य की स्थिति की समीक्षा की।

उन्होंने कहा कि डॉक्टर कोबीमारियों के साथ-साथ लोगों में भी रुचि रखना चाहिए। भारत में स्वास्थ्यमंत्रालय सिर्फ हेल्य केयर का काम कर रहा है, लेकिन वह जन स्वास्थ्य परकाम नहीं कर रहा है। जन स्वास्थ्य गड़बड़ होने पर बीमारियां होती हैं। देशमें स्वास्थ्य के केन्द्र में नीति एवं सेवाएं हैं और समाज एवं लोग परिधि पर हैं।डॉक्टर को इलाज के अलावा पाॅलिसी पर भी नजर रखनी चाहिए। फोकसचेंज करने पर स्थिति में बदलाव आएगा। भारत की टीबी को लेकर दुनियाको चिंता है, लेकिन भारतीय नीति निर्माताओं को चिंता नहीं है। डायबिटिजएवं बीपी अब ग्रामीणों में भी आम होता जा रहा है। वर्तमान दौर में बीमारव्यक्ति को उपभोक्ता की तरह देखा जा रहा है। आज गरीबी के कारणबीमारी हो सकती है और बीमारी के कारण गरीबी हो सकती है। यह एकदुश्चक्र है। पब्लिक सर्विसेस जो योजनाबद्ध तरीके से खत्म किया जा रहा है।क्लाइमेट चेंज को हम हल्के में ले रहे हैं, जबकि यह जन स्वास्थ्य का बड़ामुद्दा है। गरीबी में पैदा होने पर जीवन प्रत्याशा 11 साल कम हो जाती है।टीबी से साल में लगभग 5 लाख लोग मर रहे हैं। यह जन स्वास्थ्य का एकसंकेतक है। यदि जन स्वास्थ्य बेहतर होगा, तो टीबी के मरीज कम होजाएंगे। टीबी एक सामाजिक बीमारी है। मेडिकल की पढ़ाई का नजरिया भीबदलने की जरूरत है। बायोमेडिकल मॉडल या बिहैवियरल मॉडल केबजाय सोशल-पोलिटिकल अप्रोच पर जोर देना चाहिए, क्योंकि बीमारीरोकथाम में इस मॉडल की भूमिका ज्यादा है।

 

कार्यक्रम की अध्यक्षता जन स्वास्थ्य अभियान, मध्यप्रदेश के एस.आर.आजाद ने की। श्री आजाद ने कहा कि डॉक्टर अजय खरे देश भर में जनस्वास्थ्य के मुददे पर सक्रिय थे। वे मध्यप्रदेश मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष थे और वे स्वास्थ्य को जनोन्मुखी बनाने पर जोर देतेथे। एक सड़क हादसे में उनकी असमय मृत्यु हो जाने से जन स्वास्थ्यआंदोलन को नुकसान उठाना पड़ा। जन स्वास्थ्य अभियान, मध्यप्रदेश केअमूल्य निधि ने अतिथियों का परिचय देते हुए व्याख्यानमाला की रूपरेखाके बारे में बताया। कार्यक्रम का संचालन राहुल शर्मा ने संचालन करते हुएडॉ. अजय खरे की स्मृतियों को याद किया। आज के व्याख्यान में शरीर की वसीयत के बारे में भी बार की गयी और इसकी एक वेबसाइट(sharirkivasiyat.com) का लोकार्पण किया गया. व्याख्यान केअंत में ऑलइंडिया फैडरेशन ऑफ़ गवर्नमेंट डॉक्टर एसोसिएशन के डॉ. माधव हसानी ने आभार व्यक्त किया। इस मौके पर डॉ शशि खरे, डॉ. योगेशकुमार, डॉ. एच.एस. यादव, डॉ. उमाशंकर शर्मा, सुश्री आरती शर्मा,जसविन्दर सिंह, अनवर जाफरी, जन स्वास्थ्य अभियान के राकेश सहित कईगणमान्य एवं बुद्धिजीवी शामिल हुए |

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