देश का सबसे ईमानदार और चरित्रवान राजनेता माणिक सरकार अपनी सारी अच्छाइयों के बावजूद इस लोकतंत्र में चुनाव हार सकता है, यह एक राष्ट्रीय त्रासदी का विषय है – कनक तिवारी ने आज के दिन एक साल पुरानी मुलाकात को याद किया कुछ इस तरह .

3..3.2018

करीब 1 साल पहले मैं और मेरी पत्नी त्रिपुरा के तत्कालीन मुख्यमंत्री माणिक सरकार से उनके घर पर मिले थे ।हमने कई पार्टी कार्यकर्ताओं और त्रिपुरा के सांसद से भी बात की ।देश का सबसे ईमानदार और चरित्रवान राजनेता माणिक सरकार अपनी सारी अच्छाइयों के बावजूद इस लोकतंत्र में चुनाव हार सकता है। यह एक राष्ट्रीय त्रासदी का विषय है ।विचार के स्तर पर राजनीति के स्तर पर ऐसा कुछ नहीं था कि उस व्यक्ति के विरुद्ध पराजय का ठीकरा फोड़ा जा सकता। लेकिन वह भी हम से कह रहे थे कि धनबल बाहुबल और तरह-तरह के प्रलोभन सब कुछ का उन्माद त्रिपुरा में शुरू कर दिया गया है।

मुझे भविष्य के बारे में गहरी आशंका है। उन की आशंका सही निकली। भारतीय लोकतंत्र यूरोप और अमेरिका से आयातित है ।सब कुछ होने के बाद भी हम लोकतंत्र को मजबूत और परिपक्व नहीं बना पा रहे हैं ।गरीबी अशिक्षा लालच फरेब जातिवाद और तरह तरह की गंदगी भारतीय लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा बन गई हैं और उसमें कारपोरेट का वायरस घुस गया है ।जाने क्या क्या हो रहा है। कैसे बचेगा लोकतंत्र जहां अच्छे लोग जीत कर आएं यह 1 साल पुरानी पोस्ट में आपके पढ़ने के लिए डाल रहा हूं।।

 

1.  माणिक सरकार की कथा

अभी-अभी त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने करीब 1 घंटे का वक्त दिया। तमाम विषयों पर बातचीत की। इतना सरल सादगीपूर्ण मितव्ययी और सलीके का मुख्यमंत्री देश में न जाने कौन और होगा? उनमें विनम्रता तो है लेकिन देश-प्रदेश और लोगों के लिए कुछ करने का जज्बा स्वाभिमान और आत्मविश्वास की हद तक है। लगता ही नहीं था हम मुख्यमंत्री से मिल रहे हैं ।किसी भी अजनबी व्यक्ति को जिसका त्रिपुरा की राजनीति बल्कि राजनीति से ही कुछ लेना देना नहीं है इतना वक्त सम्मान और सरोकार देना कोई माणिक सरकार से सीखे। सादगी में भी इतना अभूतपूर्व व्यक्तित्व हो सकता है ।वह इस का जीता जागता उदाहरण है ं।

 

गांधी जी ने कहा था जीवन के तीन मकसद होने चाहिए ।स्वैच्छिक सादगी स्वैच्छिक धीमी गति और स्वैच्छिक गरीबी ।बापू तुम कहां हो ।तुम्हारे जाने के बाद भारत में सत्ता के केंद्र में बैठा कोई भी व्यक्ति इस तरह का तो नहीं दिखाई पड़ा। क्या यह सब तुमने माणिक सरकार के लिए भविष्यवाणी की शक्ल में कहा था?

 

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मैंने सीताराम येचुरी जी से अनुरोध किया कि वे मुझे नहीं जानते फिर भी मेरी मदद करें। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार से मिलना चाहता हूं ।येचुरी जी ने जवाब दिया कि आप मेरे लिए अजनबी नहीं है ।मैं आपको अच्छी तरह जानता हूं ।आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें। थोड़ी देर बाद ही उनका संदेश आया कि मुझे सीपीएम दफ्तर में कॉमरेड गौतम दास से बात करनी है ।कामरेड गौतम दास का नंबर मिलने पर मैंने उससे बात की ।वह बेहद खुश हुए और उन्होंने कहा कि आज शाम को ही मुख्यमंत्री से हमारी मुलाकात बहुत आसानी से तय कर दी जाएगी। गौतम दास जी से बात करना बहुत सुखद था। उन्होंने बहुत आसानी से मुख्यमंत्री से बात करके हमारी मीटिंग तय कर दी ।नियत समय पर शाम को हम सीपीएम दफ्तर पहुंचे बेहद साधारण लेकिन सुरुचिपूर्ण दफ्तर । अन्य पार्टियों के दफ्तरों में अनावश्यक वैभव और टीम टाम होता है ।फिर पता चला आज मुख्यमंत्री अपनी विधानसभा के क्षेत्र में गए हुए हैं वहां एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का उन्होंने लोकार्पण किया है।

इसलिए हमें दफ्तर से सीधे मुख्यमंत्री के निवास तक पहुंचा दिया गया।मुख्यमंत्री के निवास के आसपास कहीं कोई सरकारी आतंक नहीं था। हम बहुत आसानी से अंदर चले गए.

हमारी टैक्सी डेढ़ घंटे उनके परिसर में ही खड़ी रही। किसी ने हड़काने धमकाने या भगाने की कोशिश नहीं की। मणिक सरकार जब अंदर आए तो ऐसा लगा कि जो टेलीविज़न में अखबारों में हमने यहां तक देखा है वह पूरे का पूरा व्यक्ति हमारे सामने खड़ा है। यह बेहद सहज सरल और मिलनसार स्वभाव के व्यक्ति हैं.

 

उसके बाद हमारी बातचीत शुरू हुई मुझे तो कई बार ऐसा लगा कि मेरा घर इन के घर से ज्यादा तड़क-भड़क वाला है उसकी याद कर मुझे शर्मिंदगी महसूस होने लगी। एक बहुत जिम्मेदारी के पद पर इतनी सादगी और किफायत के साथ रह सकता है आश्चर्य हुआ। काजी नजरुल इस्लाम का चित्र उनके सिर के पीछे है।

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के दो चित्र हैं जो दुर्लभ चित्र हैं। विवेकानंद के चित्र हैं इसके अतिरिक्त और किसी किसम की कोई सजावट नहीं है चलिए फिर आगे और बात करेंगे।

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माणिक सरकार के सरकारी आवास में दस फुट गुणित दस फुट की बैठक है। उनकी छोटी सी कुर्सी के पीछे बंगाल के यशस्वी कवि काजी नजरुल इस्लाम का चित्र है। आगंतुक को लगातार यह चित्र देखना नसीब होता है। नजरुल को आधुनिक कबीर की तरह पढ़कर अभिभूत होता रहता हूं। उनकी दांई तथा बांई ओर की दीवारों पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के खूबसूरत रेखाचित्र हैं। एक तो इतना कि बहुत ध्यान से देखने पर उनकी भावपूर्ण भंगिमा समझ आती है। दो चित्र विवेकानंद के भी हैं। किसी साम्यवादी विचारक का चित्र नहीं हैं

मैं उन्हें उलझन में नहीं डालना चाहता।इसलिए इस मुद्दे पर चुप रहता हूं। मानिक सरकार बंगाल के पुनर्जागरण आंदोलन से प्रेरणा लेते राममोहन रॉय से लेकर कई नामों का उल्लेख करते हैं। अचानक वे डेरोजियो की याद करते हैं।बंगाल के बाहर के अधिकतर बुद्धिजीवी इसअद्भुत कवि एक्टिविस्ट से अपरिचित होंगे। पुर्तगाली पिता और अंग्रेज मां का यह बेटा १८०९ में पैदा हुआ और १८३१ में मर गया। वह मेरे लिए पहला राष्ट्र कवि रहा है। उसने सती प्रथा जातिप्रथा पर्दाप्रथा धार्मिक आडंबर वगैरह के खिलाफ बगावतें कीं। हिंदू कॉलेज के अध्पापक पद से हटाया गया। उसके हमउम्र छात्रों ने यंग बंगाल मूवमेंट नाम का आंदोलन ईजाद किया। ठर्र राजनेताओं ने तो कबीर तक को नहीं पढ़ा होगा।

यह मुख्यमंत्री बंगाल का आधुनिक सांस्कृतिक इतिहास पढ़ा रहा है। वह राष्ट्रवाद की थ्योरी पर गुरुदेव के निबंध की उल्था कर रहा है। वह समझा रहा है कि वर्ग संघर्ष को समझने वाले जाति धर्म सांप्रदायिकता के साथ आश्वस्त होकर संघर्ष रत रहेंगे ही। विवेकानंद के भगवाकरण को वह विकृत बुद्धियों काषड्यंत्र मानता है। जिस देश में आधी आबादी से ज्यादा कुपोषण निरक्षरता बेकारी गरीबी से पीडित लोग वहां उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणामों को वह लोकतंत्र का पीछे हटना समझकर भी पीछे हटकर संघर्ष को और तेज करने की राष्ट्रीय जरूरत महसूस कर रहा है। वह साफ कहता है कि विजय पराजय से अलग हट कर जनता के पास जाने का अभियान जारी रहना चाहिए। जनता को नेता के पास क्यों आने की जहमत पालना चाहिए? जनदर्शन कराते तमाम मुख्यमंत्री मर गए सामंतवाद के उत्तराधिकारी ही तो लगते हैं। यह लगभग अनोखा और अकेला क्यों है?

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