होली ⚫ आपको भी बुरा नहीं लगना चाहिए ,अगर आपकी बिटिया के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा हो तो… अनुज श्रीवास्तव

/ फोटो गूगल से प्राप्त /

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मैं उनत्तीस की हूँ,

अब तक 15-20 फगुए खेल लेने चाहिए थे,

लेकिन बामुश्किल 4-5 ही खेल पाई।

होली बहुत पसंद है मुझे,

हर बार जी चाहता की बाहर निकलूं,

पिचकारी चलाऊ,

होली के गानों पे नाचूं,

पर अब चाह कर भी हिम्मत नहीं कर पाती।

मैं आठवीं कक्षा में थी,

शरीर से भी और मन से भी बड़ी हो रही थी।

रंग लगाने के बहाने उसने…सीने पे…गन्दा सा लगा

मैं बोलना चाहती थी,

डांटना चाहती थी लेकिन…बुरा न मानो होली है।

किसी को हैप्पी होली नहीं बोला उस दिन मैंने,

भूलने की भी कोशिश की,

अपने आप को समझाया भी कि सब ऐसे नहीं होते।

अगली होली…

गुलाल सनी मन ललचाती सड़कें,

सुन्दर हो के भी डरा रही थीं,

बाख बचा के अपनी सहेली के घर पहुची,

कहते हैं घर सुरक्षित होते हैं।

पिता सामान अंकल को गुलाल का टीका लगाया,

पैर भी छुआ,

मगर

उन्होंने सर पर नहीं,

जांघों के बीच आशीर्वाद की थपकी दी मुझे,

सिहर गई थी मैं…बहुत बुरा लगा,

मैं बोलना चाहती थी,

डांटना चाहती थी,

लेकिन

बुरा न मानो होली है।

राह चलता कोई मेरा स्तन दबा दे,

पर मुझे बुरा नहीं लगना चाहिए।

जिसे मैं भाई कहती हूँ,

वो भले मेरी कुर्ती में हाथ ड़ाल दे,

लेकिन मुझे बुरा नहीं लगना चाहिये।

मेरा वो शरीर जिसे मैं चुन्नियों से छिपाए रहती हूँ,

लोग उसे जबरन उघाड़ना चाहें,

तो भी मुझे बुरा नहीं लगना चाहिए,

क्योकि यह होली है और होली में सब चलता है।

आपको भी बुरा नहीं लगना चाहिए

अगर आपकी बिटिया के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा हो तो…

क्योंकि

बुरा न मानो होली है

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अनुज श्रीवास्तव

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