? कलगांव के आदिवासियों ने राज्यपाल से कहा हमारे संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करें , सरकार किसी कानून को नहीं मान रही : हमारी ज़मीन वापस दिलायें और निर्माण कार्य रोकें. : अंतागढ ,छतीसगढ .

कांकेर से अनुभव  शोरी की रिपोर्ट .

01.03 .2018

? ?

बडी विडंबना है कि जिस राज पर संवैधानिक हकों की रक्षा की जिम्मेदारी है वही सारे कानून के विपरीत काम कर रहा हैं , छतीसगढ शासन ने पांचवी अनुसूचित क्षेत्र अंतागढ के कलगांव की 17.68 हेक्टर ज़मीन भिलाई स्टील प्लांट को अदला बदली में छीन ली और उसपर निर्माण भी शुरू कर दिया गया.

दुर्ग में बीएसपी से यह जमीन शाशन ने प्राप्त की है ,दुर्ग सामान्य क्षेत्र है ,इसके बदले में अनुसूचित क्षेत्र की जमीन लेना सरासर कानून का उलंघन है .

कलगांव के ग्रामीण इस अन्याय का शुरू से विरोध कर रहे है ,वे मुख्यमंत्री के पास गए ,वे रायपुर में पत्रकारों के पास गये और बार बार अपने विरोध को व्यक्त किया ,लेकिन कोई कार्यवाही होती नहीं दिखी तो उन्होंने राज्यपाल को ज्ञापन देने की योजना बनाई ,क्यों कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों के लिये सर्वाधिकार राज्यपाल के पास ही होते है . उन्हें यह हक़ है कि वे इस क्षेत्र में किसी भी क़ानून को बना सकते है ,संसद या विधान सभा द्वारा पारित कानून के क्रियान्वयन को रोक सकते हैं.

 

रैली निकालने से रोका और धमकाने का आरोप .

ग्रामीणों ने जब कलगांव से अंतागढ़ एसडीएम के पास पदयात्रा करके ज्ञापन देने की तैयारी की तो पुलिस प्रशाशन ने रैली को रोकने की पूरी कोशश की ,लोगों ने बैनर पोस्टर तैयार किये तो उसे साथ नही लेजाने दिया और उनका जोर यही था कि रैली न निकलें ,इसकी जगह कुछ लोग ज्ञापन देने चले जायें .सभी के अलग अलग फ़ोटो लिए गये और बार बार पूछ ताछ की गई मानो यह रैली नक्सलियों ने की हो .

जब भी अंतागढ में किसान कोई आपत्ति या विरोध प्रदर्शन की बात करते हैं तो उन्हें नक्सलियों से जोड़कर देखा जाने लगते हैं और भारी पूछताछ की जाती है .

राज्यपाल से यह कहा ग्रामीणो ने.

ज्ञापन में लिखा गया है कि इस जमीन पर
हम पुरखों से खेती करते आ रहे है ,यह जमीन गाँव के निस्तार की भी है . उन्होंने याद दिलाया कि संविधान की पांचवीं अनुसूचि के अनुसार किसी भी परियोजना के लिये ज़मीन लेने के लिये ग्राम सभा की अनुमति जरूरी है ,वनाधिकार कानून 2006 के क़ानून की धारा 3 की उपधारा 5 और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के आदेश दिनांक 30.7.2009 के अनुसार भी किसी को भी काबिज़ वन की भूमि से अलग नहीं किया जा सकता हैं.

राज्यपाल और मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा गया हैं कि इस जमीन पर निर्माण कार्य पर रोक लगाई जाए और छीनी गई जमीन वापस की जाए . उन्होंने लिखा कि यह पहली बार हुआ है कि दुर्ग किसी दूसरे जिले में सामान्य क्षेत्र की भूमि को लेकर अनूसूचित क्षेत्र की जमीन बदले में बिना किसी प्रक्रिया के लेकर किसी उधोग को दी गई हो . उन्होने यह भी लिखा कि स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार सभी प्रकार के संवैधानिक प्रावधानों का उलंघन कर रहा है ,उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है .

राज्यपाल अनुसूचित क्षेत्र के लिये सर्व अधिकार संपन्न है ,उन्हें यह हक़ हैं कि वे आदिवासीयों के हित में कानून बना सकते हैं और एसे कानून जिसे भले ही लोकसभा या विधानसभा पास करे उसे रोक भी सकते है ,यहां तो बने बनाये कानूनों का सरासर उलंधन किया जा रहा हैं वह भी राज्य शासन द्वारा .

****

अनुभव शोरी की रिपोर्ट 

Leave a Reply

You may have missed