कोयला संसाधन एक जन-संपदा हैं जिनका उपयोग केवल जन–हित में होना चाहिए न कि निजी मुनाफे के लिए : केंद्र सरकार का यह निर्णय वनों  व पर्यावरण के भारी विनाश के साथ आदिवासियों के विस्थापन को बढाएगा – छतीसगढ बचाओ आंदोलन .

रायपुर / 21.02.2018

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कोयला उत्खनन को निजी हाथों में सोपने के अपने पूर्व इरादे पर चलते हुए मोदी सरकार ने एक और कार्पोरेट परस्त निर्णय लेते हुए कामर्सियल माइनिंग में निजी कंपनियों को अनुमति प्रदान की l इस निर्णय के अनुसार अब कोई भी निजी खनन कंपनी कोल ब्लॉक हासिल कर खुले बाजार में कोयला बेचने के लिए स्वतंत्र होगी l कोयला खनन ( विशेष प्रावधान) अधिनियम 2015 में केंद्र सरकार ने कामर्सियल माइनिंग का प्रावधान किया था, जिसके तहत ही निजी कंपनियों को भी इसमें अनुमति प्रदान की गई हैं l इस निर्णय के बाद निजी कंपनिया कोयला उत्खनन कर देश के अन्दर तथा विदेशों में भी कोयला आपूर्ति कर सकेंगी l

केंद्र सरकार के इस निर्णय का छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन पुरजोर तरीके से विरोध करता हैं, क्यूंकि कोयला संसाधन एक जन-संपदा हैं जिनका उपयोग केवल जन–हित में होना चाहिए न कि निजी मुनाफे के लिए l इस निर्णय से एक  तरफ तो सार्वजनिक क्षेत्र की खनन कम्पनी कोल इण्डिया को कमजोर कर कोयला उत्खनन निजी हाथो में सोपने की तैयारी वहीँ दूसरी और बहुमूल्य खनिज संपदा की लूट व व्यापार  के आधार पर चुनिन्दा कार्पोरेट घरानों के मुनाफे को सुनिश्चित करने की दिशा में लिया गया निर्णय हैं l कुछ दिन पूर्व ही केंद्र सरकार द्वारा तैयार किये गए अपने विजन डॉक्यूमेंट 2030 में कहा गया हैं कि सिर्फ पाइपलाई परियोजनाओ को ही आगे बढाया जायेगा, नई खनन परियोजनाओं की आवश्यकता नहीं हैं l फिर कोयला उत्पादन बढाने की ऐसी क्या जल्दी कि अंत–उपयोग को नजरंदाज कर कामर्सियल माइनिंग की अनुमति प्रदान की गईं ?  

इस निर्णय से छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में जहाँ पहले ही हजारों हेक्टेयर क्षेत्रों में खनन जारी हैं, में और अधिक नई कोयला खदाने शुरू होंगी जिससे बड़े पैमाने पर घने जंगलो व पर्यावरण का विनाश होगा l इसके साथ ही पीढियों से निवासरत आदिवासी समुदाय जिनकी आजीविका पूर्णता जंगल – जमीन पर आश्रित हैं का भी विस्थापन बढेगा l छत्तीसगढ़ में वर्तमान में दो बड़े कोयला क्षेत्र हैं हसदेव अरण्य एवं मांड रायगढ़ l  ये दोनों  आदिवासी बाहुल्य, सघन वनक्षेत्र हैं जिसमे समृद्ध जैव विविधता वन्य प्राणियों का आवास और कई महत्वपूर्ण जलाशय और नदियों का केचमेंट हैं l पर्यवार्नीय संवेदनशील इन क्षेत्रों के संरक्षण की प्राथमिकता को नजरंदाज कर सिर्फ कार्पोरेट मुनाफे के लिए कोल ब्लाको का आवंटन किया जा रहा हैं l खनन का ही दुष्परिणाम हैं की प्रदेश में सैकड़ो गाँव विस्थापित हो चुके हैं और वन्यप्राणी आवासीय क्षेत्रों में आकर ग्रामीणों को मार रहे हैं l आज लगभग 17 जिले गंभीर रूप से हाथी मानव संघर्ष की स्थिति हैं l

छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन पुनः इस निर्णय का पुरजोर तरीके से विरोध करते हुए केंद्र सरकार से इस पर पुनर्विचार की मांग करता हैं जिसमे कोयला उत्खनन सिर्फ अंत –उपयोग के लिए ही होना चाहिए न कि सिर्फ मुनाफा कमाने कामर्सियल माइनिंग .

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छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन

                                              

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