? शरद कोकास की हिंदी कविता ‘अनकही ‘ उसका उर्दू और गुजराती अनुवाद.

 

 

? अनकही

वह कहता था
वह सुनती थी
जारी था एक खेल
कहने सुनने का,

खेल में थी दो पर्चियाँ
एक में लिखा था ‘कहो’
एक में लिखा था ‘सुनो’

अब यह नियति थी
या महज़ संयोग
उसके हाथ लगती रही
वही पर्ची
जिस पर लिखा था ‘सुनो’
वह सुनती रही,

उसने सुने आदेश
उसने सुने उपदेश
बन्दिशें उसके लिए थीं
उसके लिए थीं वर्जनाएँ
वह जानती थी
कहना सुनना नहीं हैं
केवल हिंदी की क्रियाएं,

राजा ने कहा ज़हर पियो
वह मीरा हो गई
ऋषि ने कहा पत्थर बनो
वह अहिल्या हो गई
प्रभु ने कहा घर से निकल जाओ
वह सीता हो गई,

चिता से निकली चीख
किन्हीं कानों ने नहीं सुनी
वह सती हो गई,

घुटती रही उसकी फरियाद
अटके रहे उसके शब्द
सिले रहे उसके होंठ
रुन्धा रहा उसका गला,

उसके हाथ कभी नहीं लगी
वह पर्ची
जिस पर लिखा था – ‘कहो’ .

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(मूल कविता 1995 में ‘नवभारत’ में तथा 1998 में ‘वागर्थ’ में प्रकाशित)

? अनकही का उर्दू अनुवाद

वो फरमा रहा था
वो समाअत कर रही थी
जारी था ये खेल
समाअत करने और फरमाने का

खेल में थे दो कुर्रे
एक में दर्ज था फरमाओ
एक में दर्ज था समाअत करो

अब ये फितरत थी
या फ़क़त इत्तेफ़ाक़
उसके हिस्से आता रहा
वही कुर्रा
जिसपर रकम था समाअत कर
वो समाअत करती रही

उसने समाअत की हुक्म
उसने समाअत की नसीहतें
बंदिशें उसके लिए थीं
उसके लिए थी सरहदें
वो जानती थी
समाअत और गोयाई नहीं हैं
फ़क़त हिंदी क़वायद में फ़ेल

बादशाह ने हुक्म दिया ज़हर पियो
वो मीरा हो गई
सूफी ने कहा संग में तब्दील हो जाओ
वो अहिल्या हो गई
मिज़ाजी ख़ुदा ने कहा घर से निकल जाओ
वो सीता हो गई
सेज़-ए-आतिश से निकलती हुई चीख
किसी गोअस ने समाअत नहीं की
वो सती हो गई

घुटती रही उसकी इल्तेजा
थम गए उसके अल्फ़ाज़
दम-ब-ख़ुद रहा उसका हलक

उसके हिस्से कभी नहीं आया
वो कुर्रा
जिस पर दर्ज था फरमाओ ।

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शाब्दिक अर्थ

फरमाना=कहना,बोलना
समाअत=सुनना
कुर्रे=पर्चियां
गोया हो=कहो
फितरत=नियति
फ़क़त=सिर्फ,केवल,मात्र
इत्तेफ़ाक़=संजोग
रक़म था =लिखा था
हुक्म=आदेश
नसीहत=उपदेश
सरहदें=सीमाएं,वर्जनाएँ
हिंदी कवायद=हिंदी व्याकरण
फ़ेल=क्रिया
सूफी=ऋषि,संत,
संग=पत्थर
तब्दील=बदलना,हो जाना
मिज़ाजी खुदा=पति,यहां भगवान राम के लिए उपयोग किया गया है
सेज़-ए-आतिश=आग का बिस्तर,चिता
गोअस=कान
इल्तिजा=फरियाद,आग्रह
अल्फ़ाज़=शब्द का बहुवचन
दम-ब-खुद=रुंध जाना
हल्क=गला

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अनुवाद : हाजी इसराइल बैग “शाद”. बिलासपुरी.

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अनकही’ का
मुकुंद कौशल द्वारा गुजराती अनुवाद

? अनकही’ का गुजराती अनुवाद
और हिंदी लिप्यान्तरण

ए कहे तो अने ए साँभड़ती
चाली रही हती रमत
कहेवा अने साँभड़वा नी

रमत मा हती बे चबरकीओ
एक पर लख्युं हतुं -बोल
अने बीजी पर लख्युं हतुं साँभड़

कोण जाणें आ प्रारब्ध हतुं
के मात्र संजोग
तेना हाथे आवती रही एज चबरकी
जेमा लख्युं हतुं – साँभड़
ए साँभड़ती रही

एणें साँभड़ी आग्नाओ
एणें साँभड़याँ उपदेशो
निषिद्धिओ तेना माटे हती
वर्जनाओ – मर्यादाओ पण
तेना ज माटे हती

ए जाणती हती
के कहेवुं अने साँभड़वुं
भाषा नी क्रियाओ मात्र नथी

राणा ए कहयुं- जेर पी जा
ए मीरा थई गई
रूशी ए कहयुं- पाषाण थई जा
ए अहिल्या थई गई
प्रभु ए कहयुं- महेल मेली ने जता रहो
ए सीता थई गई

चिता थी उठती चीसो
कोईए न साँभड़ी
अने ए सती थई गई

मुंझाती रही तेनी फरियाद
घूँटाता रह्यां तेना शब्दो
सीवाएला रह्या तेना होठ
रुंधाएलुँ रह्युं तेनु गडूं

पण तेना हाथे
क्यारेय न लागी ए चबरकी
जेमा लख्युं हतुं – बोल

शाब्दिक अर्थ

साँभड़ती = सुनती
रमत = खेल
बे चबरकीओ = दो पर्चियाँ
क्यारेय =कभी

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(इस कविता के अनुवादक श्री मुकुंद कौशल हिंदी ,गुजराती और छतीसगढ़ी के सुविख्यात कवि हैं, और दुर्ग में रहते हैं। )

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