स्कूल-कॉलेज में गीता पढ़ाने की मांग में जनहित क्या है ? सुनील कुमार ,छतीसगढ सांध्य दैनिक

स्कूल-कॉलेज में गीता पढ़ाने की मांग में जनहित क्या है ?  सुनील कुमार ,छतीसगढ सांध्य दैनिक

स्कूल-कॉलेज में गीता पढ़ाने की मांग में जनहित क्या है ? सुनील कुमार ,छतीसगढ सांध्य दैनिक

सुनील कुमार 

संपादक, दैनिक छतीसगढ सांध्य 

 

18.02.2018

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छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही है जिसमें एक संगठन ने अदालत से ऐसा आदेश जारी करने की मांग की है कि स्कूल-कॉलेज के कोर्स में गीता पढ़ाई जाए। यह कहा गया कि जब अदालत तीन तलाक के मामले में सरकार को नीति और कानून बनाने का आदेश दे सकती है, तो फिर इस मामले में क्यों नहीं?

बहस के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि ऐसा करने पर हो सकता है कि कुरान और बाइबिल को भी कोर्स में शामिल करने की मांग उठे, और तब क्या होगा? इसके जवाब में वकील ने गीता को कुरान और बाइबिल से अलग किस्म का ग्रंथ बताते हुए उसके कुछ हिस्से पढ़कर बताए।

आज देश में जैसा धार्मिक उन्माद छाया हुआ है, उसके चलते इस बात में कुछ अटपटा नहीं लग रहा कि लोग किसी एक धर्म को स्कूल-कॉलेज के बच्चों पर लादने के लिए ऐसी कानूनी कोशिश करें, क्योंकि इस मकसद से देश के कई लोग तो तरह-तरह की गैरकानूनी कोशिश भी कर रहे, यह कम से कम कानून के रास्ते तो है। लेकिन सवाल उठता है कि स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई में धर्म का क्या काम है? हिन्दुस्तानी बच्चों को वैसे भी क्लासरूम की पढ़ाई, और होमवर्क से इस कदर लादा गया है कि उनकी सीखने और सोचने-समझने की क्षमता पूरी तरह कुचलकर रख दी जाती है। आज ही सुबह सोशल मीडिया पर एक अमरीकी डॉक्यूमेंट्री मेकर की फिनलैंड की पढ़ाई पर बनाई गई एक छोटी फिल्म दिख रही थी जिसमें उस देश को दुनिया का सबसे उम्दा पढ़ाई वाला देश बताया जा रहा था, और अमरीका का नंबर 29वां था। फिनलैंड में स्कूल-कॉलेज के बच्चों को घर पर कुछ नहीं करना होता, और हफ्ते में बीस घंटे से अधिक की कोई पढ़ाई नहीं होती।

हिन्दुस्तान में किताबों के बोझ को बढ़ाकर ज्ञान और समझ दोनों को बढ़ाने की खुशफहमी पाल ली जाती है, लेकिन इस बोझ से होता इसका ठीक उल्टा है।

लेकिन यहां का मुद्दा स्कूल-कॉलेज के कोर्स में धर्म के कुछ पाठ से बढऩे वाले बोझ का मुद्दा नहीं है, इस चर्चा का मुद्दा यह है कि पढ़ाई में धर्म की कोई दखल क्यों होनी चाहिए? और आज अगर इस धर्मनिरपेक्ष देश में गीता को शामिल किया गया, तो जैसा कि जजों ने सवाल किया है, कुरान और बाइबिल को कैसे मना किया जा सकेगा? और फिर बुद्ध की नसीहत, जैन दर्शन, गुरूग्रंथ साहब जैसी और बहुत सी अलग-अलग धर्मों की बातों को किताबों से बाहर कैसे रखा जा सकेगा? धर्म को लेकर एक बहुत ही कट्टर और दकियानूसी जिद हिन्दुस्तानी सोच पर लादी जा रही है, और ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि आबादी के बहुमत का धर्म ही राजकीय और राष्ट्रीय धर्म है। इस तरह की बातें करते हुए, और कानूनी पहल करते हुए इस बात को पूरी तरह अनदेखा किया जा रहा है कि गीता को मानने वाले लोगों के पांवों तले कुचलकर दलित और आदिवासी दूसरे धर्मों की तरफ जाने पर मजबूर हुए थे, और आज भी हैं। आदिवासियों का मूल धर्म एक अलग तरह का प्रकृति-पूजक धर्म है, न कि हिन्दू या सनातनी धर्म। दूसरी तरफ सनातनी जिद और ज्यादती के चलते हुए ही दलितों का एक बड़ा तबका कहीं पर बौद्ध बना, कहीं पर मुस्लिम हुआ, और कहीं ईसाई भी हुआ। कोर्स की किताबों में धर्म को घुसाने की यह कोशिश इस बात को पूरी तरह अनदेखा करती है कि दुनिया के बाकी देशों की तरह हिन्दुस्तान में भी बहुत से लोग नास्तिक हैं, और उन पर कोई भी धर्म पढऩे की मजबूरी क्यों लादी जाए?

यह देश में धार्मिक उन्माद को बढ़ाने वाली एक जनहित याचिका है, और हमें थोड़ी सी हैरानी इस बात को लेकर है कि किसी एक धर्म को स्कूल-कॉलेज की किताबों में शामिल करने की मांग को अदालत ने जनहित याचिका माना, और उस पर सुनवाई करते हुए देश के शैक्षणिक संस्थानों से जवाब भी मांगा है। यह बात हैरान करती है कि अदालतों के पास ऐसी बात की सुनवाई के लिए वक्त दिख रहा है, और किसी एक धर्म की जिद को, दूसरे धर्मों के समानता के अधिकार के ऊपर रखने को जनहित याचिका माना गया।

खैर, अदालत की अपनी सोच हो सकती है, लेकिन यह एक बड़ा खतरनाक खेल है, देश में धार्मिक समानता के खिलाफ तो यह है ही, स्कूल-कॉलेज के बच्चों के पूरे भविष्य को भी खतरे में डालने की यह पहल है। हमारा ख्याल है कि देश की अदालतों ने कई मामलों में जनहित याचिका लगाने वाले लोगों या संगठनों पर समय-समय पर जुर्माना भी लगाया है कि उन्होंने अदालत का समय खराब किया। देखना है कि इस याचिका का निपटारा करते हुए अदालत क्या तय करता है।

सुनील कुमार 

संपादक, दैनिक  छतीसगढ 

Sunil Kumar

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