सत्ता क्यों डरती है, युवाओं के प्रेम करने से? : शेषनाथ वर्णवाल

सत्ता क्यों डरती है, युवाओं के प्रेम करने से? : शेषनाथ वर्णवाल

14.02.2018

आखिर सत्ता क्यों डरती है, युवाओं के प्रेम करने से? यह सवाल एक ऐसा सवाल है जिसकी जड़ें आप खोजें, तो कई ऐसी चीजों से आपका साबका पड़ेगा जो आपने कभी सोचा नहीं होगा कि प्रेम का सम्बन्ध इनसे भी हो सकता है. प्रेम से सत्ता को डरने के कारणों की पीछे जायें, उससे पहले प्रेम और सत्ता को समझना-जानना ज़रूरी है.

 

प्रेम क्या है? प्रेम इंसानियत की स्वतः प्रेरित एक ऐसी भावना है जो प्राकृतिक रूप से किसी जोडती है, एक दुसरे के करीब लाती है, कृत्रिम भेदों को मिटाकर दो इंसानों को एक पथ का साथी बनाती है. साथ ही उसके बारे में बिना किसी पूर्वाग्रह, बिना किसी लोभ लालच, बिना किसी डर के उसे मन में बसा लेती है. प्रेम की बाह्य अभिव्यक्ति तो बाद में आती है, जो आगे चलकर विवाह, सेक्स या संतानोत्पत्ति के रूप में परिलक्षित होती है. प्रेम उतना ही प्राकृतिक है जितना आपका खतरनाक पशु को देखकर डर जाना. आपका बारिस होने पर किस पेड़ के नीचे बचने की कोशिश करना अथवा बारिस में उन्मुक्त भींगकर उसका आनंद लेना.

 

जब आप प्रेम की भावना में होते हैं, तो आप यह नहीं सोचते कि आपकी सामाजिक हैसियत क्या है, जेब में पैसे हैं या नहीं, आपकी जाति क्या है, आपका धर्म क्या है, आप किस विचारधारा से सम्बन्ध रखते हैं, आप किसे वोट देते हैं, आपके माँ-बाप प्रेम के बारे में क्या सोच रखते हैं, आपका समाज प्रेम के बारे में और आपके बारे में क्या सोच रखता है. आप जब प्रेम में होते हैं, तो ये चीजें और व्यवस्थायें जिसको समाज ने कृत्रिम रूप से बनाया है, उसको याद नहीं रख पाते.

अब सत्ता पर आते हैं. सत्ता क्या है? किसी व्यक्ति, समाज, वर्ग, समुदाय पर स्वैच्छिक अथवा जबरदस्ती शासन करना सत्ता है. जानकर-बुझकर अथवा अनजाने ही अपने पूर्वजों से प्राप्त सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सुविधा के कारण भी हमारे पास सत्ता हो सकती है.

 

सत्ता के उदाहरण है राजनैतिक पद पर होना और विशेष सुविधा और अधिकार को पाना तथा उपभोग करना. राजनैतिक पद पर होना चुनाव के माध्यम से भी हो सकता है और विरासत के माध्यम से भी, अथवा दोनों के संयोग से भी, यह संभव हो सकता है.

उदाहरण के लिए भारत में एक प्रत्याशी अपनी मेहनत और काम से विधायक या सांसद बन सकता है अथवा उसे विरासत में मिली आर्थिक सम्पदा की मदद से अथवा परिवार में किसी राजनैतिक पद वाले व्यक्ति की मदद से. इसके अतिरिक्त उसकी जाति, उसका धर्म, उसका वर्ण, उसकी सामाजिक हैसियत, सामाजिक व्यवस्थायें आदि भी मदद कर सकती हैं. भारत में, राजनीति में धर्म, जाति, राजनैतिक सम्बन्ध और आर्थिक स्थिति ही ज्यादा मायने रखती है, योग्यता तुलनात्मक रूप से कम. इसकी पड़ताल आप राजनेताओं के उनके भ्रष्टाचार के मामलों और आपराधिक कृत्यों के बारे में गूगल में खोज कर आसानी से जान सकते हैं.

 

अब हम आते हैं अपने मूल सवाल पर. वो यह कि सत्ता प्रेम करने वाले युवाओं से क्यों डरती है? हम जानते हैं कि सत्ता की एक प्रवृति होती है, उसे बनाये रखने की कोशिश करना. बार बार किसी भी प्रकार चुनाव जीतना, या जन्म के आधार पर वही सुविधायें और सहूलियत परत करना. इस कोशिश में, वह किसी भी हद तक जाने से भी नहीं चुकती.

जब आप प्यार में होते हैं, तो आप धर्म के सत्ता के समीकरण को तोड़ते हैं. आप यदि हिन्दू हैं और मुसलमान से प्रेम करते हैं, तो उनके (सत्तासीनों के) धार्मिक आधार पर राजनीति को धक्का पहुंचता है. वो इसलिए कि आप अब वोट धर्म के आधार पर नहीं, धर्मनिरपेक्ष होकर, उम्मीदवार के कार्यों का मूल्यांकन कर वोट देने की सोच रख सकते हैं. यह मान सकते हैं कि इनसान और इनसान में भेद नहीं है. इनसान की समता, बन्धुत्व और प्रेम के हिमायती हो सकते हैं. ऐसा होने पर, उनके हिन्दू-मुसलमान वाली राजनीति को धक्का लगता है. भारत और पाकिस्तान वाली राजनीति को धक्का लगता है. इसी प्रकार जब आप निम्न जाति के युवा हैं और उच्च जाति के सवर्ण युवा (युवा/युवती) से प्रेम करते हैं, मेल-जोल करते हैं और शादी करते हैं, तो उनका जाति और वर्ण-आधारित राजनीति को धक्का लगता है. आज भारत में ज्यादातर लोग जो राजनीति में हैं, वो सवर्ण समुदायों से ज्यादा हैं और वंचित और तथाकथित शुद्र, पिछड़े, अल्पसंख्यक समुदायों से कम.

 

जब प्रेम में आप जाति और वर्ण की दीवारें तोड़ते हैं और इंसानियत की समानता की भावना में यकीन करते हैं, तो जाति आधारित राजनीति को आप धक्का पहुंचाते हैं. धर्म और जाति के आधार पर पुरोहितवाद और ब्राह्मणवाद को चुनौती देते हैं. तब आप सवाल कर सकते हैं कि राजनीति और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों में से अधिकांश लोग किन्हीं चंद जाति और धर्म विशेष से ही क्यों हैं. आप सवाल कर सकते हैं कि सुप्रीम-कोर्ट और हाई-कोर्ट में चंद समुदायों से ही न्यायाधीश क्यों भरे पड़े हैं, जबकि उनकी संख्या अनुपातिक दृष्टि से इतनी कम है. आप यह सवाल कर सकते हैं कि सरकारी महकमों के ऊँचे पदों पर चंद जाति तथा वर्णों से ही क्यों अधिक लोग हैं और बहुजनों की संख्या कम क्यों है.

इसी तरह आप कह सकते हैं कि ज्यादातर पदों पर पुरुष क्यों हैं? महिलायें आधी आबादी होने के बावजूद सत्ता के प्रतिष्ठानों में ईक्का-दुक्का क्यों हैं? नौकरी में, सामाजिक संगठनों में, शैक्षिक संस्थानों में महिलायें इतनी कम क्यों हैं, जबकि खेतों और घरेलू कार्यों तथा रसोईघर में इनको क्यों ज्यादातर काम करने पड़ते हैं? ये सवाल आप करते हैं क्योंकि आप पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर नहीं सोचते हैं. आप समता और इंसानी नैसर्गिक भावनाओं से प्रेरित होकर सोचते हैं. यदि आप लिंग, जाति, धर्म, वर्ण, सामाजिक हैसियत, आर्थिक हैसियत और राजनैतिक पहुँच तथा स्वार्थों के बस होकर सोचेंगे, तो आपका ऐसा सोचना आपको नहीं सूझेगा.

 

जब आप प्रेम में होते हैं, आप खुले होते हैं. किसी चीज को आप ठीक समझते हैं, तो आप उसे अपनाने की चेष्टा करते हैं. उसका महत्व समझते हैं. जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर फ़िल्टर करके नहीं सोचते. आर्थिक और राजनैतिक चश्में से चीजों को नहीं देखते. आपका मानव-सुलभ तर्क, अनुभव, और इंसानी-भावना के आधार पर आप सोचते हैं. ऐसे में आप चीजों को समता और व्यक्ति के नैसर्गिक अधिकारों के अनुसार भी सोच सकते हैं. तब आप लैंगिक-भेद को नहीं मान सक्रते हैं, धार्मिक-भेद से आप किनारा कर सकते हैं, जाति-विहीन इंसानियत की बात कर सकते हैं. आप महिलाओं के दोयम दर्जे को देखकर महिलाओं के अधिकार के हिमायती हो सकते हैं, धर्म-निरपेक्षता के पैरोकार हो सकते हैं, जाति-विहीन समाज कि स्थापना के लिए एक क्रन्तिकारी सोच रख सकते हैं.

सत्ता इन्हीं चीजों से डरती है. सत्ता इन्हीं चीजों से भयभीत होती है. इसलिए लखनऊ विश्वविद्यालय अपने छात्रों को निर्देश देता है कि वे ‘वेलेंटाइन डे’ पर विश्वविद्यालय के परिसर में घूमने न जाए। यह हिदायत देता है कि जो भी निर्देश का उल्लंघन करते हुए पाया जायेगा, उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

कई राज्य वैलेंटाइन डे को माता-पिता पूजन दिवस के रूप में मनाये जाने की घोषणा करते हैं. कुछ लोग इस दिन को भगत सिंह की शहादत का दुष्प्रचार करते हैं. और चूँकि उनकों पता है कि प्रेम को रोकना मुश्किल है, वो इसलिए बजरंग दल, आरएसएस, विहिप आदि के गुंडों को पार्कों, विश्वविद्यालय में भेजते हैं. कहीं कोई प्रेमी-युगल गले मिलते दिखें, साथ बैठे दिखें, गुलाब का फुल देते दिखें, चुम्बन लेता दिखें, तो उनकी डंडे से पिटाई करो. कहीं कोई प्रेमी युगल अथवा लडके लड़की हंसते, ठहाके लगाते मिलें, तो उनकी तस्वीर लेकर जलील करते हुए उनके परिवारों को भेजना उनके सामने जलील करना. उनकी उठक-बैठक करवाकर उनके आत्मसम्मान को चूरचूर कर देना. जबरदस्ती शादी करवाने, सिंदूर लगवाने की कोशिश करना. अर्थात कानून हाथ में लेकर संस्कृति की दुहाई देते हुए कई प्रकार के अपराध करना.

 

सत्ता डरती है. और तरह तरह से युवाओं के मन में भय पैदा करती है कि प्रेम किये तो तुम्हारी खैर नहीं. नैतिक रूप से भी वह प्रयास करती है, पर उन्हें पता है कि वे सफल नहीं होंगे, संस्कृति और सामाजिक नैतिकता की झूठी पाठ करने से. प्रेम करना, इस प्रकार सत्ता के इन कृत्रिम प्रतिमानों को तोडना है और बराबरी तथा शोषण-विहीन समाज की स्थापना करना है. इसलिए सत्ता डरती है.

सत्ता प्रेम करने वालों से इसलिए भी और डरती है कि ज्यादातर प्रेम करने वाले युवा होते हैं, जो उर्जा और साहस से लबरेज होते हैं. नए अनुभव हासिल करने के लिए वो जोखिम लेने से नहीं हिंचकते. वो बस नदी कि तरह बह चलते हैं, सभी पर्वत, चट्टानों, जंगलों आदि की रुकावटों की परवाह किये बगैर अपने सागर से मिलने. इसलिए प्रेम करना शोषण-विहीन समाज की रचना करना है. बराबरी और प्रेम वाले समाज की रचना करना है. गुलामी और कृत्रिम नियंत्रण-विहीन समाज की रचना करना है. सत्ता इसिलए युवाओं के प्रेम करने से भय खाती है. और युवा हैं, मानते ही नहीं और बार बार प्रेम करने की जोखिम लेते हैं, तमाम हिंसा, पाबन्दी, संस्कृति और नैतिकता की दुहाई के बावजूद.

 

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शेषनाथ वर्णवाल

http://www.ulgulan.in/2018/02/satta-kyon-darti-hai-yuwaon-ke-prem-karne-se.html

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