? गोवा – 7 : 17 वीं शताब्दी का ब्रगेन्ज़ा हाउस , पुर्तगाली रईसी का जीवंत इतिहास : 11वीं पीढी संजोये हैं सब कुछ , चित्र कह रहे हैं खुद अपनी कहानी .

? गोवा – 7

8.02.2018

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दक्षिण गोवा से करीब 30 किलोमीटर दूर है चंन्द्रपुर गांव जो 11वीं शताब्दी के कादम्बा राज्य की राजधानी हुआ करती थी जो अब चांदोर कहलाता हैं . गांव के ठीक बीचो बीच एक बड़े चर्च ,क्रूस के स्तम्भ और सन्त की समाधि के ठीक बगल में हैं 17 वीं शताब्दी का ब्रजेन्जा हाउस और इस ऐतिहासिक बिल्डिंग में रह रही ब्रगेन्ज़ा कि ग्यारहवीं पीढ़ी ,इसपीढ़ी को रिप्रजेंटे करती हैं एक 75 साल की बुजुर्ग महिला जो बड़े इत्मिनाम से अपनी सँजोयी यादों को साधरण अंग्रेजी में बताती हैं .

इस परिवार का सरकार से आग्रह था की इस बिल्डिंग को टूटिस्ट प्लेस के रूप में प्रचारित नहीं करें इसलिए कोई ज़्यादा आवाजाही नहीं है .यह वाकई मेँ कोई महल नहीं हैं लेकिन पुर्तगाल के बहुत बड़े रईस का छोटा मोटा महल जैसा ही हैं .इस भवन के एक हिस्से में उनका परिवार रहता हैं ,जो आज के किसी निम्न मध्यमवर्ग परिवार की तरह ही है .

भवन का कॉमन प्रवेश द्वार है ,सीढ़ी से चढते ही पूर्वी हिस्से किसी संग्रहालय की तर्ज़ पर बडे हाल में से बुजर्ग महिला स्वागत करती हैं , कुल जमा तीन लोग हैं ,मेरे बड़े भाई राम सिंह और पुरातत्व ,इतिहास ,कला में गहन रूचि रखने वाला भतीजा विश्व विजय सिंह .

बबताती हैं कि हमारे पास सन्त ज़ेवियर के नाखून का टुकड़ा उनके अपने चैपल ( प्रार्थना स्थल ) में रखा हैं जो उनके पूर्वजों ने बहुत साल पहले प्राप्त किया था .इनकी उम्र काफी है लेकिन इकहरी बदन की प्रभावशाली महिला है ,दूर दूर तक कहीं भी इस आलीशान भवन के स्वामी होने का गर्व नहीं है ,बेहद विनम्र और गम्भीर वाणी में सामान्य अँग्रेजी में बताते चलती हैं .

वे एक फोटो भी दिखाती हैं जिसमे 50 साल पहले अपने पति के साथ बैठी हैं .इस भवन मर उनके परिवार का सैलून भी हैं ,बडा आलीशान बालरूम है जिसमें कभी परिजन डांस किया करते होंगें . कहती हैं कि इसका फर्श इटालियन टाइल्स का है औऱ सुंदर छत में योरोपियन झूमर लगे हैं. हर कमरे में रोजवुड का कार्विंग किये सुंदर फर्नीचर का जमावाड़ा है .

 


कॉन्फ्रेंस हाल में दो महत्वपूर्ण कुर्सियाँ रखी हैं जिसे उनके परिवार को पुर्तगाल के किंग डान लुईस ने उपहार में दी थी ,जिसे वह रायल चेयर कह रहीं हैं ,उनका यह भी आग्रह था कि इस कुर्सी के फोटो नहीं ल़े और कोई बैठ भी नह़ी सकता , बाद में उन्होंने फोटो लेने की अनुमति भी देदी ,और किसी की रुचि उस रॉयल चेयर पर बैठने की थी भी नहीं .

 

ज्यादातर फर्नीचर 18 वीं सदी का औऱ स्थानीय शीशम का हैं ,इसे बनाने वाले कारीगर कोटूरियम गांव से आये थे. क्रॉकरी का सामान चीन का और काफी फर्नीचर मकाऊ से है. इनके पास शुरू सेअभी तक के फोटो का बड़ा कलेक्शन भी है .भारत का पहला मर्फी रेड़ियो ,मिट्टी के तेल से चलने वाला फ्रिज ,300 साल पुराना पियानो , लकडी के वेस्टर्न कमोड से लेकर तरह तरह के काँच रखे हैं.

 

इसी में एक बहुत बडी़ लाइब्रेरी भी हैं ,कहा जाता है की यह गोवा की पहली लाइब्रेरी हैं इसमें 5000 पुस्तकें है जो चमड़े की जिल्द से मढ़ी हुई हैं .इन पुस्तकों का संग्रह लुई ब्रगेन्ज़ा ने की थी (1878-1938 ) लुई नामचीन पत्रकार भी थी और गोवा के स्वतन्त्रता में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी .

निश्चित ही हमारे इतिहास की बडी धरोहर हैं इसका सरंक्षण किया जाना चाहिए. गोवा या केन्द्र सरकार को इसे अधिग्रहण कTर सरंक्षण करना ही चाहिये ,लेकिन इनके परिवार की सहमति लेकर और उनके रहने की व्यवस्था की जाए साथ ही आज के बाजार कीमत पर उनके परिवार को मुआवजा भी दिया जाये .
गोवा की अपनी सँस्कृति ,आर्केटेक्ट ,भाषा और शिल्प है इसे कायम रखा ही जाना चाहीये.
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इस चैपल मे ही संत जैवियर के नाखून रखे हैं .

 

 

 

 

 

एतिहासिक परिवार की ग्यारवी पीढ़ी की मेडम के साथ बड़े भाई  रामसिंह सिकरवार और में डा. लाखन सिंह ,फोटो ले रहे  हैं इस यात्रा के सूत्रधार विश्व विजय सिंह .

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6.02.2018 गोवा के चन्द्रपुर गाँव .

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